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यदि हम मिल पाए कभी…..

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“यदि हम मिल पाए कभी एक बार भी इस जन्म में,

मैंने यह आप से कहा था मेरे प्रभो, बस इतनी कृपा करना।

एक बार मैं तुम्हें जी भर के देख लूँ, तुम मेरे

हृदय में सदा के लिए बस जाना, मेरे पास सदा रहना।

यदि आ गए आप और यह रहस्य होगा हम दोनों

के बीच, हमारे बीच में कभी भी संसार को मत लाना।

मैं नहीं चाहती हूँ कि संसार में कोई भी जाने

कि हम कभी मिले भी थे, क्योंकि इसमें केवल हम दोनों ही हैं।

मेरा प्रेम अति निर्मल, निष्पाप है, मुझे केवल आप से

प्रेम है, मैं केवल आपके ह्रदय में स्थिर स्थान चाहती हूँ।”

आपने तुरंत शान्त स्वरूप में कहा, “ऐसा तो आज

तक मुझसे किसी ने नहीं माँगा या कहा !

तुमने मुझे यह भी कहा था मुझे सब याद है –

“भूल कर भी हे प्रभो, यदि मैं आप तक पहुँच पाऊँ और आपको देख लूँ।

तो यह बात आप किसी से भी न बताना।

मुझे कोई न जाने, न पहचाने बस इतना मैं चाहती हूँ।”

मैंने तुमसे कहा था, “ऐसा तो किसी ने पहले

न मुझसे कहा या न माँगा था, आज पहली बार यह हुआ है।

मैंने यह अभी अभी चाहा है और ऐसा होगा –

तुम मुझसे एक बार नहीं, अनेकों – अनेकों बार मिली हो, यह सबको ज्ञात होगा।

तुम्हारे और मेरे बीच अब कोई फासला नहीं,

हम एक नहीं अनेक – अनेक बार मिलते रहेंगे ही, अनन्त तक।

मेरा प्रेम इतना विशाल है, मेरा प्रेम इतना

घनिष्ठ है, वह इतना सीमाहीन व अनन्त है कि उसकी थाह नहीं।

तुम मुझसे अनन्त प्रेम करती हो, तुम्हारी भक्ति

अपार है, बदले में मैं तुम्हें मेरा प्रेम भी अक्षय व अन्तहीन ही दूँगा।

यह संसार आज जान ले ऐसी भक्ति मैंने

देखी नहीं जो कोई केवल गुमनाम रहना चाहता हो मुझे पाकर भी।

परन्तु अब यह मेरी इच्छा व संकल्प दृढ़ है –

तुम्हें मैं ऐसा कार्य दूँगा करने को जिससे तुम्हें अक्षय यश मिलेगा।

संसार तुम्हें मिटाना या भुलाना चाहे तो वे केवल

विफल होंगे, जितना वे तुम्हें छिपाना चाहेंगे, तुम उतनी दमकोगी।

तुम्हारी पहचान संसार मुझसे करेगा क्योंकि पुरातन

ऋषियों को धरती पर विशेष कलियुग में उतार लाने की।

तुम्हें मैंने अनन्त शक्तियाँ दी हैं; मेरी विशेष

कृपा दृष्टि तुम पर से एक क्षण भी कम नहीं होगी, यह संसार जान ले।

मैं तो तुम्हारा सारथी हूँ, तुम्हें अब संसार में

धर्म व सत्य के लिए उतरना है; धर्म युग ही सत्य युग होता है।

तुमसे मैं उस धर्मयुग की तैयारियाँ करवा

रहा हूँ जो आज से करीब ९९२६ वर्ष बाद आएगा।

तुम्हें मैं अनेक अस्त्र – शस्त्र व कार्य शक्ति

दूँगा जिससे तुम्हें पूर्ण सफलता मिलेगी; तुम सदा विजयी रहोगी।

धर्म व सत्य की स्थापना करो, पाप नाश

करो, सत्य के सब में चिराग जलाओ, अन्धेरे को मन से भगाओ।

इसी आशीष के साथ यह हमारी वार्ता ख़तम होती है,

परन्तु याद रहे, तुम्हारा ह्रदय  मेरा घर है, मैं किसी भी पल में आ सकता हूँ।”

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