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17-07-26 || 5:00PM
भाग – 1
अत्यधिक लोग केवल स्वप्न या निद्रा अवस्था में जी रहे हैं। मनुष्य को अपनी आध्यात्मिक शक्ति जगानी चाहिए तभी पूर्ण सुख व आनंद मिलेगा –
प्रातः काल जैसे उषा की किरणें नीले नभ को अपने कोमल किरणों से ओत-प्रोत कर देतीं हैं, ऐसे ही मैंने तुम्हें सबसे पहले जन्म में निर्मल, शान्त व पवित्र बनाया था। तुम्हें सब जीवधारियों में सर्वश्रेष्ठ बनाया था।
जैसे ही तुम्हारे अंदर प्राण, पंच महाभूत का मेल होते ही श्वास चलने लगे तो मैंने तुम्हारे लिए मन भी बना दिया। उसमें ॐ का गुंजन किया। वह शंख-नाद था, वह ब्रह्म-नाद था। मन में मैंने इस सुघटना की स्मृति डाली।
पूर्ण रूप से तुम्हें मैंने तैयार करके मेरे अति सुन्दर संसार का भ्रमण करने भेजा। तुम्हारी नाभि में तीन प्रकार की शक्तियाँ भर दीं – इच्छा शक्ति, संकल्प शक्ति, क्रिया शक्ति। इन्हें कोई नहीं जानता, न जगाता है।
तुम्हारे विचार व कर्म उल्लेखनीय हों इसलिए तुम्हें तीन शक्तियाँ नाभि में भर दीं। इन शक्तियों से तुम मेरे संसार में उसे और भी उत्कृष्ट व अद्वितीय बनाओ। सन्तोषजनक जीवन तब होता है जब हम इन्हें पहचानें।
आध्यात्मिक शक्तियाँ जगाने के लिए पहले मन में इच्छा को जगाओ। सत्कर्म करने के लिए इच्छा को जगाओ। मन को आलोकित करने के लिए उज्जवल विचार मन में लाओ। मन का तमस मिटाने के लिए क्रिया शक्ति जगाओ।
मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु उसका अहंकार है। अहंकार का जन्म मन में तब होता है जब मनुष्य स्वयं को सबसे बड़ी शक्ति मानता है। उसे विस्मृति हो जाती है कि सबसे शक्तिशाली अस्तित्व परमात्मा का है।
अहंकार में मनुष्य अंधा हो जाता है, अनेक बुरे कर्म और अनैतिक सम्बन्ध रखता है। मर्यादा पार करता है और लोगों के लाख समझाने पर भी उसे अपने मन का अंधकार पकड़ में नहीं आता, वह अविवेकी बन जाता है।
अहंकार समाप्त करने के लिए मनुष्य को विनम्रता, धैर्य, प्रायश्चित और विचारों को रोकने के लिए प्रतिदिन कुछ समय चुप रहना चाहिए। ध्यान करना सर्वोत्तम साधना है। ध्यान में कदापि ईश्वर से भौतिक सुख या पदार्थ नहीं माँगो, क्षमा याचना करो।
भाग – 2
अपने जीवन को प्रफुल्लित बनाने के लिए एक सरल और शक्तिशाली रास्ता है, उसे आज से अपनाओ। सदा मन में याद रहे कि जो-जो तुम करोगे, उसका फल तुम स्वयं भोगोगे। केवल शुभ कर्म करो –
मनुष्य के कर्म करने की प्रेरणा उनके विचार देते हैं। विचार उत्पन्न इच्छाओं में से होते हैं। इच्छाएँ सुख की प्राप्ति की ही होतीं हैं। निजी इच्छाओं को त्यागो और ईश्वर इच्छा पर जीवन जियो ।
एक इच्छा धीरे- धीरे बढ़ते बढ़ते बहुत प्रबल हो जाती है। जब तक वह पूरी नहीं होगी , मन का उद्वेग शांत नहीं होगा। यही मन का स्वभाव है। इच्छा में एक अपनी शक्ति अंदर छुपी पड़ी होती है। वह अंत तक स्वयं को जीवित रखती है।
ऐसी इच्छा का अंत तब तक नहीं होगा जब तक तुम उसके समक्ष उससे अधिक प्रभावशाली इच्छा को जन्म नहीं दोगे। वह यह है कि पहली नकारात्मक इच्छा को एक नई सकारात्मक इच्छा से काटो और उस पर जीत पाओ।
अशुभ इच्छा को शुभ इच्छा से जीतो। इस में समय लगता है परन्तु मन में शान्ति का निवास हो जाता है। मन का उद्वेग मनुष्य को सदा विचलित करता रहता है। एक-एक करके अपनी इच्छाओं और पुरानी वासनाओं को नष्ट करो।
यह तब संभव हो सकता है जब अपनी नाभि में बसी इच्छा शक्ति को तीव्र इच्छा से जगाओगे। ध्यान लगाओ प्रतिदिन। अंत में गहरी शान्ति में परमात्मा से प्रार्थना करो कि अशुभ इच्छाएँ तुम्हारे मन से मुक्त होकर नष्ट हो जाएँ – ऐसा होगा।
ध्यान, प्रार्थना, शान्ति, मौन, एकाग्र चित्त और अति शुभ संकल्प मुझ परमात्मा को परम प्रिय हैं। इससे मेरी सृष्टि स्वच्छ और सुखदाई रहती है। वायुमण्डल में कण -कण में दिव्य शान्ति का प्रकाश फैलता है – मैं वह आभा-मण्डल देखता हूँ।
वह आभा-मण्डल बहुत कम लोगों का होता है परन्तु उनके धरती पर या सत्य लोक में वास करने से भी मेरी धरती सुरक्षित है। ऐसे तपस्वी अपने ध्यान, शुभ संकल्प, इच्छा शक्ति से पृथ्वी का आभा-मण्डल बढ़ाते हैं।
तुम उनमें से एक ऐसी ही तपस्विनी हो। तुम प्रतिदिन ध्यान करती हो; पृथ्वी, ब्रह्माण्ड व सभी जीव प्राणियों में ॐ का गुंजन करती हो। ऋषि, मुनियों, गुरुओं, पुण्यात्माओं और पितरों को नमस्कार करके आशीष माँगती हो – तुम्हारा सदा कल्याण हो !
भाग – 3
अत्यधिक भोग-विलास नरक है। इस नरक के द्वार को अपने हाथ से तुमने खोला था, अब सदा के लिए इसे बंद करो।
मनुष्य का भ्रम है कि वह जितने प्रकार के साधनों से अपने मन को सुख देगा, वह तभी सच्चा सुख पाएगा। परन्तु मन का स्वभाव यह नहीं है। मन का स्वभाव है एकाग्र रहना, शान्ति में लिप्त रहना और स्थिर रहना।
मन की बनावट ही ऐसी है कि वह केवल शान्ति, शुभ विचार व संकल्पों की खुराक पर जीने के लिए बना है। समाज में बने मनुष्यों के द्वारा मन बहलाने के साधन उसका भोजन या खुराक नहीं हैं।
मन को यदि लगातार कम से कम 28 दिनों तक कोई भी विषय भोग का सेवन न दिया जाए तो वह दोबारा नहीं जन्मेगा। 28 दिनों के बाद अगर साथ-साथ में ध्यान लगाना और शाकाहारी भोजन का सेवन हो तो वह विकार मिट जाएगा।
ऐसे करने से 56 दिनों में प्रभु कृपा से गहरे सतह में मन के विकार नाश हो जाएँगे।मनुष्य की अपनी मर्ज़ी होनी चाहिए। तुम्हारे शुभ संकल्प, प्रत्याहार, प्रायश्चित, प्रार्थना और पुरुषार्थ तुम्हारी इच्छा से मैं नष्ट कर दूँगा ।
इसके बाद मन में ईश्वर, गुरु, महान आत्माओं का मन से पूजन, हरि नाम जाप , व्रत, मौन धारण, भजन -कीर्तन, वेद की ऋचाएँ, श्लोक मंत्रों और ऋषियों के तप की अगन से तुम्हारी अंदर छुपी इच्छाएँ-वासनाएँ नष्ट होंगी।
इस संसार में योगियों, तपस्वियों और सच्चे साधकों और भक्तों की बहुत कमी है। सबके मन में पैसे का पूजन, चिंतन- मनन हो रहा है। मन के चित्त में ईश्वर की स्मृति को भुलाकर सांसारिक कामनाएँ भरी हैं।
ऐसे बुरे समय में कोई एक बिड़ला है जो सामाजिक, सासांरिक लोभ, मोह, माया से बचा है। यद्यपि यह सत्य है परन्तु यह ज्ञात रहे ऐसे कठिन समय में मैंने ऋषियों को संसार में लाने की ठान ली है। तुम उन से सीखो।
तुमको आज मैंने ऋषियों और मेरे बीच में सूत्रधार बनाकर संसार के समक्ष रखा है। तुम मेरे कहने पर प्रत्येक कर्म, संकल्प और पहल कर रही हो। तुम लोगों के जीवन में आनन्द भरो, उन्हें प्रभु का सच्चा रास्ता दिखाओ।”
सारांश –
1 .अत्यधिक लोग केवल स्वप्ना या निद्रा अवस्था में जी रहे हैं। मनुष्य को अपनी आध्यात्मिक शक्ति जगानी चाहिए।
2 .आध्यात्मिक शक्ति जागती है जब मनुष्य अपने मन को प्रशिक्षित करे। अनियंत्रित मन सागर में आये तूफ़ान जैसा होता है। मन को गंगा सागर बनाओ।
3 .मनुष्य की आध्यात्मिक शक्ति उसकी नाभि में बसती है। वह तपस्या से प्राप्त होती है। तपस्या वे करते हैं जो अपने मन को पहले अंकुश बाद में वश में करते हैं।
4 .संसार के सारे सुख क्षणिक व अधूरे हैं। वे केवल कुछ क्षणों के लिए इन्द्रियों और मन को रंजित करते हैं, परन्तु वे इच्छा और वासना बनकर धीरे-धीरे साँप की भाँति डसते हैं।
5 .जो अपने मन में ईश्वर की भुलाई हुई स्मृति को जगाकर उसे घनिष्ठ कर देता है, उसे माया नहीं भरमाती। वह स्मृति ध्यान, पुण्याई, सत्कर्म, गुरु सेवा और मौन-शांति से जागृत होती है।
6 .संसार में सदा द्वन्द रहेंगे; प्रकृति में जन्म-मृत्यु, घटना-बढ़ना, सुख-दुःख और बदलाव निरन्तर आते रहेंगे। आध्यात्मिक शक्ति मनुष्य को प्रकृति के स्वरुप के रहस्य खोल देती है। उसका मन विचलित नहीं होता।

