#85
ॐ
15-07-2026 | Tuesday
भाग 1
इस पृथ्वी को बनाने में बहुत अधिक समय व यत्न लगा है – कृपा कर इस पृथ्वी की महानता को जानिए –
“यह पृथ्वी अति आश्चर्यजनक है परन्तु देखने में बहुत साधारण क्योंकि इसमें छिपी हुई हर्ष जनक और आश्चर्यजनक बातें कोई भी मनुष्य नहीं जानता। तुम मुझसे आज सुनो यह बात पहली बार क्योंकि तुमने असाधारण कार्य किया है।
सबसे पहले मैंने केवल एक संकल्प किया कि मैं शून्य में से एक नयी शक्ति को जन्म दूँ जिसमें एक से अनेक होने की क्षमता हो। परन्तु वह शक्ति कभी भी नाश न हो, कोई उसका कभी भी विनाश करने की क्षमता न रखे।
वह शक्ति कहाँ है? वह मेरे एक विशेष स्थान पर है जहाँ किसी की भी पहुँच नहीं है। वह स्थान ‘हिरण्यगर्भ’ है जो मैंने ही अपने संकल्प से एक विशेष स्थान बनाया है, वहाँ पर रखी है। मैंने अनगिनत प्रकार की शक्तियों को अपने संकल्प मात्र से बनाया है।
जिस प्रकार मैं अविनाशी हूँ, मैंने अपनी अविनाशी शक्तियों में से पृथ्वी को बहुत ही धीरे-धीरे बनाया है जिससे उसमें किसी भी प्रकार की कमी या दोष उत्पन्न न हो। ये सारी शक्तियाँ मेरे संकल्प व नियंत्रण से चलती हैं। इन शक्तियों का दुरुपयोग निषिद्ध है।
ये सारी शक्तियाँ भी अविनाशी हैं और जो इन शक्तियों से छेड़छाड़, खिलवाड़ व दुरुपयोग नहीं करेगा वह सुखी रहेगा। मुझ से उत्पन्न मेरी सारी दिव्य शक्तियाँ संसार में अनुशासित रूप से चलती हैं। वे कभी भी किसी को हानि नहीं पहुँचाती हैं।
जो इन को सम्मान देते हैं, उनको इनसे केवल लाभ मिलता है। ये शक्तियाँ विशेषकर तपस्वियों, ऋषियों, मुनियों एवं योगियों द्वारा प्राप्त होतीं हैं क्योंकि वे अनुशासन, संयम और नियोजित प्रकार से जीवन जीते हैं। उन्हें इनका आशीष भी मिलता है।
ये सारी शक्तियाँ अदृश्य हैं परंतु उनका प्रभाव सबको देखने को मिलता है। इनको विस्तार से समझने के लिए अनेक जन्म मनुष्य को लग जाते हैं। जब आत्म-साक्षात्कार हो जाता है तो ये दिव्य शक्तियाँ उस महान आत्मा को प्रणाम करती हैं।
यह पृथ्वी लोगों को एक बड़ा मिट्टी का ढेला ही दिखाई देती है। उसमें उसकी संजीवनी शक्ति, प्राण शक्ति और अमरता प्रदान करने की शक्ति कभी नहीं दिख पायेगी क्योंकि लोग कृतज्ञ नहीं हैं। वे सदा लोभ, स्वार्थ व अपनी मनमानी में जीते हैं।
भाग 2
कालांतर इस पृथ्वी का रूप धीरे-धीरे बदल जाएगा। मध्य काल में यह करीब-करीब नष्ट ही होती दिखाई देगी। अब यह मध्य काल की ओर जा रही है। उसके बाद यह फिर से तपस्वियों द्वारा विकसित होने वाली है –
वर्तमान काल में पृथ्वी की बहुत दुर्दशा है। उसका बहुत अपमान हुआ है, वह बोलती नहीं परंतु सुनती सब कुछ है। मनुष्य ने न केवल उसे लूटा है परंतु उसको बंजर बना दिया है। उसकी धन-संपत्ति सब कुछ लूट ली और बदले में उसे बंजर किया है।
शुरू में पृथ्वी की सारी शक्तियाँ चमत्कारी थीं, उनमें बसी प्राण-शक्ति, संजीवनी शक्ति 100% थीं। आज केवल 38% बची हैं। मैंने स्वार्थी, कामी, लोभी व्यक्तियों से उन्हें बचा लिया और उन्हें अपने अंदर फिर समा लिया है। वे मेरे पास सुरक्षित हैं।
यह पृथ्वी धीरे-धीरे मध्य काल की ओर अग्रसर हो रही है जिसमें ये शक्तियाँ 3-9% और घट जाएँगी क्योंकि धरती पर पाप बढ़ता ही जा रहा है। मनुष्य वैभवशाली, समृद्ध, सुखी बनना चाहता है, और वह आलसी बनता जा रहा है। मन उसका माया में लिप्त है।
ये सब उसकी अनगिनत इच्छाओं का परिणाम है। इच्छाओं का अंत नहीं है। आज यह पृथ्वी मनुष्यों के विचार, कर्म एवं वासनाओं से ग्रस्त और त्रस्त है। उसके विनाश का कारण मनुष्य बनता जा रहा है। मैं कुछ काल के लिए मौन रहूँगा।
उसके बाद पापियों को दंड, मृत्यु दूँगा। उन्हें ऐसी सज़ा मिलेगी जिसकी उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की है। उनका भविष्य अंधकार से भर जाएगा जिससे वे उन इच्छाओं को स्वयं त्याग देंगे। परन्तु ऐसा करने पर भी कुछ नहीं होगा।
न मैं उन्हें कभी माफ करूँगा, न उनको प्रायश्चित करने की अनुमति दूँगा, न कोई मन का सुख, न कोई शरीर का सुख उन्हें मिलेगा। उनके सारे पापों के बीज मैं तपस्वियों के तप से भस्म करवा दूँगा और पापियों को श्राप दूँगा।
पृथ्वी पर हिंसा, युद्ध, विनाश, सम्मोहन और तोड़-फोड़ करने की सज़ा मैंने पृथ्वी की रक्षा हेतु दी है। उन पापियों को कभी भी दुबारा इस पृथ्वी पर आने की अनुमति नहीं मिलने वाली है। यह उनका अंतिम जन्म है। उन्हें कभी माफी नहीं मिलेगी।
इस प्रकार धीरे-धीरे पृथ्वी फिर से विकसित होगी, लोगों को मन में पुनः शान्ति सबसे अधिक प्रिय होगी। उनकी रुचि स्वयं ध्यान करने में होगी। लोगों में पाप करने का भय पैदा होगा और उनकी आस्था सुकर्म करने में पुनः स्थापित होगी।
भाग 3
मध्यकाल के बाद क्या होगा? यह कितने वर्षों का होगा? मध्यकाल में कौन जन्म लेंगे? तपस्वी, ऋषि पृथ्वी के लिए क्या योगदान देंगे?
मध्यकाल 1600 वर्ष पहले शुरू हो चुका था, जब पृथ्वी को लूटने बहुत कामी स्त्री-पुरुष अपनी इच्छाएँ पूरी करने, सुख-भोगने, बहुत जटिल वासनाएँ पूरी करने पुनः पुनः जन्म ले रहे थे। वे पृथ्वी पर कम से कम 50 लाख या 1 करोड़ वर्ष से जी रहे हैं।
उनकी वासनाएंँ बढ़ रही हैं, वे सत्ता के भूखे हैं, वे कभी न मिटने वाली भूख को संसार के वैभव, पृथ्वी के भीतर या ऊपर जितनी भी वस्तुएँ हैं उनका अथाह रूप में सेवन, शोषण या चिन्तन मनन करते हैं। वे सबको लूटते हैं, सम्मोहन करते हैं।
उनके मन में दया, करुणा, क्षमा का कोई स्थान नहीं है, केवल स्वयं के मन को खुश करना है। वे इन्द्रियों को उत्तेजित रखते हैं और संसार का कोई मनुष्य उन्हें पूर्ण रूप से प्रसन्न नहीं कर सकता है क्योंकि उनके मन-रूपी मटके में बहुत सारे छेद हैं, वे सदा अशान्त हैं।
तुम से शुरू होकर मध्यकाल में अब से एक-एक करके, ऋषि आएंँगे । वे गुमनाम रहेंगे परन्तु असाधारण कार्य धरती व समाज के लिए करेंगे। मध्यकाल 626 वर्ष और रहेगा परन्तु ऋषियों ने ठान ली है कि वे वसुधा माता को फिर से ओजस देंगे।
वे तब तक आते रहेंगे जब तक पृथ्वी पर वृक्ष अधिक और मनुष्य कम न हों; पृथ्वी पर पुरातन से पुरातन वृक्ष, पशु-पक्षी, वनस्पति, जड़ी बूटियाँ एवं फल-फूल न हों। तब नदियों में फिर से भरपूर जल होगा और मनुष्य मन की शान्ति एवं आत्मा की उपलब्धि श्रेष्ठतम मानेगा।
स्त्रियाँ चरित्रवान बनेंगी। जब पुरुष अपने पौरुष का दुरुपयोग व अहंकार न करे, ऐसे काल में पृथ्वी जल्दी-जल्दी पुनर्जीवित होती है। समाज शान्तिप्रिय हो, बड़ों का आदर करे और अपने से छोटों को सुरक्षित रखें।
और पंच महाभूत की पूजा हो। नदियों, पर्वतों, आकाश में वायु ऑक्सीजन (O2) भरपूर हो और प्रत्येक जीवधारियों के लिए अहिंसा, सम्मान व सुरक्षा का भाव हो। ऐसे में धरती अपनी दिव्य शक्तियों को प्रदर्शित करती है और सत्पुरुषों को उनको दान में देती है।
तुम्हें ज्ञात नहीं है परन्तु आशीष रूप में मैं तुम्हें बताता हूँ। इस विशेष कलयुग के होते हुए भी मेरी आज्ञा से मेरी सारी दिव्य शक्तियाँ मैंने तुम्हें दी हैं। इनके कारण तुम्हें कायाकल्प मिला और परम शान्ति मिली है। आकाश में गूँजते संकल्प तुम्हें सुनते हैं। अब धरती पर से भी पूर्ण रूप से वे सुनाई देंगे !”
ॐ
सारांश
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भाग 1
1) इस पृथ्वी को बनाने में बहुत अधिक समय व यत्न लगा है। कृपा कर इस पृथ्वी की महानता को जानिए।
२) कालांतर इस पृथ्वी का रूप धीरे-धीरे बदलता जाएगा। मध्यकाल में यह करीब-करीब नष्ट ही होते दिखाई देगी। अब यह मध्यकाल में है। उसके बाद यह फिर से तपस्वियों द्वारा विकसित होने वाली है।
३) सोने चांदी की चमक को छोड़कर मनुष्य को अपने भीतर दमकती, अविनाशी आत्मा को सर्वश्रेष्ठ मानना चाहिए।
भाग 2
मध्यकाल में क्या होने वाला है? सृष्टि का अंत होते दिखाई देगा। लोगों को अपना भविष्य न समृद्ध दिखाई देगा और न ही उन्हें धन, पद व वैभवशाली जीवन में सुख मिलेगा। उनके मन में रत्ती मात्र शान्ति कतई नहीं होगी।
योगियों, संतों, तपस्वियों, सज्जनों और समाज सुधारकों के मन में शान्ति, सद्भावना, विश्वास और प्रभुत्व होगा। वे इस देश को अपने आदर्शी चरित्र द्वारा चलाएंँगे।
ऋषियों को पहली बार देवी देवताओं से ऊपर दर्ज़ा दिया जाएगा जिससे प्राचीन काल में तपस्वियों की तरह लोगों को सादगी, सज्जनता, शान्ति व मौन प्रिय होगा। उन्हें भी वही आर्थिक और आध्यात्मिक शक्तियाँ मुझे परमात्मा से प्राप्त होंगी। उन्हें मैं अमरता का फल सहज रूप में दूँगा।

