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ओम् का गुंजन

#43

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“मेरी प्रीत तुम्हारे प्रति इतनी है मैं आज तुम्हें बताता हूँ। पहले कभी किसी ने मेरे अंदर इतना गहरा स्पंदन किया ही नहीं।

 

मुझमें इतने सारे रहस्य हैं मेरी सृजन प्रकृति को निरन्तर चलाने के। उन में से एक है शान्ति प्रदान करने वाले ओम् के बारे में।

 

ओम् ध्वनि अति पवित्र है, उसमें अनन्त शान्ति विद्यमान है। इसकी रचना मैंने मन को स्थिर बनाने के लिए योग की सीढ़ी दी थी।

 

ओम् तुम्हारी आत्मा को संजीवनी बूटी देगा, यह ध्वनि तुमको अमरता देगी। इसके स्पंदन द्वारा तुम्हारी आत्मा शान्ति प्राप्त करेगी।

 

जिस प्रकार एक वृक्ष सबको छाया देता है, उसी प्रकार ओम् का गुंजन सबको मन में अति शान्त होने की शक्ति प्रदान करता है।

 

तुम्हारे अंदर आज एक प्रश्न उठा है कि तुम किस प्रकार विश्व में दूर तक फैली अशान्ति को कम कर सको, मेरा तुमको उत्तर ध्यान में आया है।

 

सब से पहले जान लो वातावरण दूर-दूर तक बहुत दूषित है, लोगों के विचार अज्ञान से भरे हैं, वे तुम्हें ध्यान में रोकते हैं।

 

उनके विचारों द्वारा वे निम्न प्रकार की इच्छाएँ पूर्ति करना चाहते हैं। अनन्त काल से वे इच्छाओं को पूर्ण करने में संलग्न हैं

 

तुम्हें अपना ध्यान अचूक बनाना है, आज्ञा चक्र केंद्र बिन्दु है, वहाँ तुम्हें अडिग होकर मन में प्राण शक्ति को स्थित रखना है।

 

ऐसा करने से प्राण की बहुत तीव्र गति से मस्तिष्क में वृद्धि होती है। मन पुराने निरर्थक विचारों को तुरंत त्याग देता है।

 

जब तुम एक शक्तिशाली केंद्र में ध्यान लगाओगी, मेरी ऊर्जा तुम्हें प्राप्त होगी। मन को पूरी तरह मुझ में केंद्रित करो और अडिग रहो।

 

कुछ समय बाद ओम् का स्मरण करो, एक दैदिप्यमान प्रकाश, ज्योति का स्मरण करो, उस प्रकाश को अपने शीर्ष में प्रवेश करो।

 

अनेकों बार मन ही मन में ओम् को बोलो, उसकी ऊर्जा को अपने चारों ओर फैलने दो। ओम् का मन में गुंजन – गान करो।

 

ओम् की तरंगें आकाश द्वारा विश्व में फैलेंगी, वे उन लोगों के मन में एक स्वर्णिम किरण अवश्य प्रदान करेंगी।

 

कभी न कभी एक मेरी ज्योति की किरण उस मनुष्य को मेरे पास आने की प्रेरणा अवश्य देगी। उसे ध्यान करने की इच्छा होगी।

 

विश्व में अशान्ति अशान्त मन द्वारा है। मन संसार भोग में लिप्त है। जितनी संसारिक इच्छाएँ बढ़ेंगी, उतनी मन में अशान्ति होगी।

 

ओम् का गुंजन आकाश में फैलाओ, उसकी ध्वनि धीरे-धीरे लोगों में परिवर्तन अवश्य लाएगी। ओम् का गुंजन तुम्हारे मन में सदा होता रहेगा, यह आज मेरा तुम्हें आशीर्वाद है !”

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