#48
ॐ
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“तुम्हारी अनेक जन्मों की दीर्घ काल पर्यंत तपस्या का फल अब मैं विश्व को दे रहा हूँ – जान लो समय ने एक करवट ली, हमें इसे पहचानना है।
अत्यधिक सरल शब्दों में दूँगा अपना परिचय, कदाचित तुम अपेक्षा कर बैठो गूढ़ शब्दों से ही होता है मेरा वर्णन – नहीं मैं अत्यधिक सरल हूँ।
अनन्त काल से मौन हूँ, नहीं पसन्द मुझे किसी भी प्रकार का कोलाहल, नहीं चाहता हूँ मैं समीक्षा। मैं तो शांति प्रिय हूँ – मुझे तुम मन की शांति से प्राप्त करोगे।
वर्णन नहीं कर सका कोई भी मेरा आज तक, वे तो केवल कर रहे थे शब्दों का नाप तोल – मुझे मन में देखो। मन जब तुम्हारा दूर करेगा अज्ञान का अंधकार, मैं स्वयं प्रकट हो जाऊँगा।
किसी भी सोई हुई आत्मा को जगाना असम्भव है क्योंकि उसकी नाभि में उसने नहीं जगाई इच्छा शक्ति है। जब भी तुम प्रण करोगे, तभी तुम्हारी इच्छा से होगी तुम्हारी जागृति।
सरोवर में कमल के पुष्प मनोहर खिलते हैं, वे ईश्वर को मंदिर में भावनाओं द्वारा अर्पित किए जाते हैं। तुम्हारे मन मन्दिर में मैं प्रेम, दया, करुणा व त्याग वैराग्य के पुष्प देखना चाहता हूँ।
कभी न दुखाना किसी का मन, मैं तुमसे हो जाऊँगा कोसों दूर, मन मंदिर है उसमें सबका हित चाहना। मैं सबके मन के भाव तत्क्षण पढ़ लेता हूँ, मुझसे चूक कभी नहीं होती है।
तुम चाहो तो अनेक बार मेरा दरवाज़ा खटखटाना, परन्तु मैं नहीं खोलूँगा द्वार जब तक मन नहीं किया साफ़। प्रतीक्षा तुम करते रहना, लाखों करोड़ों वर्षों तक, मैं अपनी आँखें नहीं खोलूँगा अपनी शान्ति को भंग कर।
समीक्षा मेरी करते रहो, विवेचन हज़ार परन्तु मन अपना नहीं करते हो निश्चल; निरिच्छा व त्याग करने को तत्पर जितनी गाँठे अपनी खोलोगे, होंगे तुम मुझे पाने के अधिकारी।
सुनता हूँ मैं सूक्ष्म से भी सूक्ष्म तुम्हारे मन के भाव, छुपा न पाओगे मुझसे एक भी संकल्प ढका मन के अंदर। गति तुम्हारी मुझसे ही है, मेरे बिना कभी न तुम पाओगे आनंद स्थिर।
तुम में से बिड़ला कोई एक है जो करता है मुझसे सच्चा प्रेम, तुम सबको तो लुभा रही है मेरी परछाई, संसार की माया कब से। मृग तृष्णा में भटक रहे हो, अनन्त काल से गहरी नींद में सो रहे हो।
जब करोगे अनेक सतकर्म इस जगत में निष्कामी बनकर, नहीं होगी कोई तरंग लालच, स्वार्थ व मोह की, तभी मेरे पास आओगे। अंधकार तुम्हारा तिमिर बन मन में सदियों से तुम्हें जकड़ा है।
मैं स्वयं तुम्हें अपने समीप कर लूँगा जब तुम बन जाओगे निर्दोष। आना मेरे पास मैं तुम्हें दूँगा ऐसी शान्ति व प्रेम जिससे मिटेंगे तुम्हारे सारे पाप। फिर कभी न होंगे चक्षु तुम्हारे धूमिल, न होंगे तुमसे कोई कर्म बेकार।
मैं अचल हूँ, मैं अव्यय हूँ, मैं हूँ अगोचर, अदृश्य व बिना किसी आकार के। मैं साकार हो जाता हूँ निर्दोष, पवित्र व निष्पाप के मन के भीतर स्वयं चलकर। मैंने तुम्हें अपना माना है, तुम दोगी मेरा परिचय विश्व में – जो कोई नहीं कर सकता, वो तुम करोगी।”
