#46
ॐ
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सबसे पहले तुमने किया आत्म साक्षात्कार, फिर आरंभ हुआ तुम्हारा एक जीवन का पृष्ठ
“घोर तप व परिश्रम द्वारा तुमने किया है इस जीवन में आत्म साक्षात्कार अनेकों बार।
परन्तु याद रहे, आगामी जीवनों का यह केवल एक पृष्ठ है, तुमसे मैं फिर करवाऊँगा महान काम।
कभी नहीं तुम मुझ से कहती हो ये कठिन कार्य कैसे होगा सम्पूर्ण, अटूट विश्वास है तुम्हारा मुझमें
दीर्घ काल तक चलने वाले मैंने तुम्हें दिए हैं कार्य और परियोजनाएँ, साथ में दी हैं अनेक शक्तियाँ।
हर कार्य में सफलता पाओगी और होगा हर कार्य हर्ष सहित; उत्साह से तुम भरी हो, कभी न तुमने हार मानी है।
किसी भी प्रकार का नहीं करता है मन तुम्हारा भय, यह एक उद्यमी व पुण्य आत्मा की है निशानी
जब आत्मा करती पुण्य ऐसे जिसमे अभयदान मिलता दरिद्र व शक्तिहीन को, वो आत्मा होती है निर्भय।
अपनी निर्भयता का तुमने कभी दुरुपयोग नहीं किया, स्त्रियों को शत्क्ति दी, निर्धन को धन व कमज़ोर को सहारा।
जटिल से जटिल, कठिन से कठिन तुमने किए है बाल्यावस्था से कार्य, तुम्हे मैंने आज के दिन के लिए किया तैयार
तुम्हारी रक्षा मैं पहले दिन से करता आ रहा हूँ, मैंने तुम्हें आग में झोंका था परीक्षा देने के लिए, रक्षा भी मैं करता रहा हूँ।
ऐसी कठिन परीक्षा आज के युग में कोई नहीं दे सकेगा, ऐसा मैं ऐलान करता हूँ; मुझे कलियुग में चाहिए था एक अनोखा पात्र – वह तुम हो।
तुम्हारी ज्ञान की पिपासा मैंने पूर्ण की है, तुम्हारे अंदर है ज्ञान का सागर
तुम्हारी वेदना मैंने तुम्हारे सबसे पहले जन्म में ऋषिकेश में ही सुन ली थी, तुम्हें मेरी माया एक रत्ती भर भी नहीं भाई थी।
तुमने अंदर जगाई तीव्र इच्छा ईश्वर को पाने की, ज्ञान आत्मा को पाने की – “मैं सर्वोच्च ऋषि के पास जाकर ज्ञान प्राप्त करूँगी,” संकल्प लिया था तुमने।
तुम मेरा कार्य युग परिवर्तन के हेतु करती रहो, यह लक्ष्य सम्पूर्ण इस जीवन में तुम्हारे कर कमलों से अवश्य होगा, यह कार्य हेतु हम फिर मिलेंगे
मैं पहली बार संसार के समक्ष इतनी बार आया हूँ, मुझे सदा छुपकर रहना प्रिय लगता है; मैं इतना मौन व गंभीर हूँ, मुझ तक पहुँचना असंभव है।
मैं केवल तुम्हारे लिए आया हूँ, इतना प्रेम व आत्मीयता पहले कभी अनुभव नहीं की, इसलिए हम फिर मिलेंगे!”
