#57
ॐ
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परमात्मा –
तुमने आज मुझसे पूछा था, “क्यों ये सारे गहरी नींद में सोए हैं? क्यों ये लोग केवल सांसारिक वस्तुएं पाकर इतने खुश हैं? मुझे तो यह लगता है कि यह सब लोग बेवजह ही जी रहे हैं। क्यों नहीं इन्हें समझ आता कि केवल समय रोज़ बेवजह यूँ ही बिताने में सुख प्राप्त नहीं होता। एक जन्म से दूसरे जन्म में भी प्रवेश करने पर मन में कोई अंतर नहीं आता है। एक के बाद दूसरा, फिर तीसरा, यूँ ही जन्मों की श्रृंखला बनती जाती है, परन्तु इनके मन में कभी भी प्रश्न नहीं उठता। अपने आप से यह कभी क्यों नहीं पूछते कि जीवन का सुख किसमें है? जीवन का अर्थ क्या है? एक जीवन का मूल्य क्या है?
एक दिन में कितनी श्वासें होती हैं, वर्ष में कितनी और पूरे जीवन में कितनी? ईश्वर ने आज भी हमें एक और दिन दिया है जीने को जिसमें श्वास चल रही है। श्वासों का सदुपयोग मैं कैसे करूँ?”
तुमको देखकर लगता है कि तुमने एक श्वास में मुझे अनेकों बार इतनी सच्चाई और आभार से पुकारा कि मैं विवश होकर तुम्हारे समक्ष झट आ जाता हूँ। इतने प्रेम से तो मुझे कोई नहीं याद करता? तुम से तो मेरी कोई बात नहीं छुपी, तुम जो मुझसे पूछना चाहोगी, मैं तत्काल तुम्हारे पास आऊंगा।
तुमने मुझे इस जन्म में कितनी बार पुकारा है तुम्हें याद नहीं। तुमने इस जन्म में कितनी बार रोकर मुझे बुलाया, तुम क्यों नहीं मुझे कहती? तुमने दिल में कितने घाव लिए मुझसे कभी शिकायत नहीं की। तुम्हें कितनों ने बेवजह अपमानित किया, तुमने मुझे कुछ नहीं कहा। जहाँ तुम्हें अत्यधिक यश मिलना चाहिए था, उन्होंने तुम्हारा तिरस्कार किया। तुम मुझसे क्यों नहीं कभी कहती कि तुम्हारे साथ इतना अन्याय क्यों हुआ? तुम्हें यह भी पूरी तरह पता है कि तुम्हें मैंने वरदान दिया है, तुम जो चाहोगी वह तुम्हें मिलेगा। तुम्हारे संकल्प में आज इतनी शक्ति है कि यदि तुम कहोगी यह धरती फट जाए तो फट जाएगी। तुम्हारी संकल्प शक्ति मेरा तुम्हें आशीर्वाद है। लेकिन तुम मुझसे संसारी वस्तु कभी नहीं माँगती।
तुम कितनी अदभुत और निराली स्त्री हो जो किसी ने कभी नहीं देखी होगी। तुम सबसे अलग हो, इसलिए मेरी बहुत विशेष हो।
तुमने कुछ हजारों वर्ष पहले मुझसे कहा था – “मेरे बच्चे नहीं बचे तो क्या, विश्व में सारे बच्चे जीवित रहें। ये धरती सदा हरी-भरी रहे, नदियों में सदा पानी बहे और धरती पर खूब वृक्ष उगें।”
तुम आज भी शून्य अवस्था में मन में धरती माँ के लिए, विश्व के शांति की प्रार्थना करती हो। ध्यान में वृक्षों को अपने श्वासों द्वारा लंबे जीवन देने की कामना करती हो। कोई वृक्ष काटता है तो उसका दर्द अपने शरीर में महसूस करती हो। किसी बच्चे का चेहरा देखकर उसकी लम्बी आयु की प्रार्थना करती हो। “इस संसार में कभी प्रलय न आए” – यह मुझसे प्रार्थना करती हो। इसलिए मैंने 10.09.2021 को तुम्हें कहा था – This world is safe with one person like you. Such is the Power of Wisdom, Truth and Penance.
मैं तुम्हें लम्बी आयु व स्वास्थ्य क्यों न दूँ? तुम्हारी श्वासों में सदा मैं ही तो हूं।
तुमने यह जन्म मुझसे रो रो कर माँगा है। कोई भी ऋषि, संत और महात्मा ने स्वीकृति नहीं दी थी। सबने कहा एक जीवन में चार जीवनों का भार कैसे ढोएगी? तुमने यह जन्म लेने से पहले बहुत रो कर मुझसे कहा था कि, “किसे पता चार जन्मों बाद आरक्षित मोक्ष मिले या न मिले? माया का क्या भरोसा? मन का क्या भरोसा? मुझे केवल आप चाहिए, मुझे यह जन्म दो, मैं सब कष्ट सह लूंँगी पर आपके मुझे दर्शन होने ही चाहिए।”
मुझे तुम्हारे मन में ली प्रतिज्ञा पता थी। तुमने पिछले जन्म में ही जान लिया था जब तुम महल में रानी थी कि संसार में जन्म लेकर सच्चा सुख वैभव, धन, मान-सम्मान में नहीं होता है। वह तो क्षणभंगुर है। मन का सच्चा सुख ईश्वर-प्राप्ति में है और वह मन की शांति से प्राप्त होगा।
जब मनुष्य अपना लक्ष्य मन में दृढ़ धारण कर लेता है तो वह अवश्य पूर्ण होता है। जो जैसा लक्ष्य रखता है, वह वैसा ही फल पाता है। यदि मनुष्य अपने जीवन का लक्ष्य केवल सुख भोगना ही मान लेता है, तो वो जितने भी आगे जन्म ले ले, वह लक्ष्य कभी पूरा नहीं होगा। संसार का सुख बहुत क्षणिक होता है और ईश्वर का सुख अति आनन्दमय और शांतिप्रद, जिसे मिलने के बाद संसार की कोई वस्तु प्राप्त करने की इच्छा ही नहीं होती। वही पूर्ण सुख है। वही परम सुख है।
जो मनुष्य अपने जीवन से सीखता है, जो भी संसार में होता है उससे सबक लेता है और सुख व दुख दोनों में आसक्त नहीं होता, वह सदा स्थाई शांति का भोगी होता है। उसे मैं अपने संपर्क में बुलाता हूँ और विशेष स्थान और मान देता हूँ। ऐसा स्थान और मान जो कोई छीन नहीं सकता, उसे चुरा नहीं सकता है। तुमने मुझसे वही पाया है। तुम उसकी हर तरह से अधिकारी हो।
सुमंत्र – तुम ॐ का जाप करती हो, ॐ ही मंत्र है। जब कोई मंत्र 11,128 (ग्यारह हज़ार एक सौ अट्ठाईस) बार जप जाता है, उसे सुमंत्र कहते हैं।
तुम्हारे हर श्वास का लक्ष्य मैं हूँ। तुम्हारा जन्म व कर्म दोनों सार्थक हुए। तुम्हारी आत्मा संसारी बन्धनों व माया से मुक्त है। तुम्हारा जन्म धन्य हुआ, पूर्ण सार्थक हुआ। तुमने शुरू से ही, बचपन में ही, लक्ष्य प्राप्ति की चेष्टा की थी। जो ईश्वर प्राप्ति का लक्ष्य था वह तुमने अपने दृढ़ संकल्प व पुरुषार्थ से पाया है। लोगों को तुम्हें जानकर, पहचानकर अपने जीवन का लक्ष्य तय करना चाहिए, तभी उनका जीवन सार्थक बनेगा। उन्हें मेरी सहायता पहुँचाई जाएगी।”
