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इतना आलोकित, आनन्दित जीवन भला कौन तुम से छीन सकता है?

परमात्मा

#62


13-01-25 | सोमवार | मकर संक्रान्ति
पूर्ण महाकुंभ की प्रथम तिथि

“महाप्राण द्वारा नाभि से यह आशीष, शब्दों द्वारा तुम्हें दे रहा हूँ, इतने कष्ट से तुमने अपना जीवन आनन्दित व आलोकित किया है,भला तुमसे कौन छीन सकता है?

हिरण्यगर्भ से प्रेम पूर्वक मैं तुम्हें तुम्हारी नाभि में महाप्राण द्वारा ये स्वर्णिम वचन कह रहा हूँ, कोई नहीं जानता तुम्हारे मन की अवस्था मेरे सिवा,तुम्हारे भीतर मैं पूर्ण रूप से बसा हूँ।

अन्धकार मन में लोगों का आदिकाल से भरा हुआ, कभी नहीं चाहते थोड़ा भी नींद से जागना, वे तुम्हें क्या समझेंगे? आदर तो दूर, वे तो तुम्हें अपने रास्ते का रोड़ा समझते हैं। मन की आँखें उनकी बंद हैं।

माया में लिप्त, वासनाओं से ग्रस्त, सदा इच्छाओं में डूबे वे क्या जाने तुम्हारे मन की अवस्था? तुम तो दिन में अनेकों बार ब्रह्म में लीन होती हो।

तुम्हारे मन की झनकार मैं सुनता हूँ, सबके लिए वेदना व करुणा मैं तुम्हारे मन में पढ़ कर महसूस करता हूँ; सभी के लिए क्षमा देने के लिए तत्पर रहती हो, परन्तु वे लोग तो धन व माया के लोभी हैं।

उनके विकार इतने हैं मन में कि वे अपनी काल कोठरी में रहें वह ही उनके लिए सार्थक होगा, उन्हें तो प्रतिदिन मिथ्या संसार को पकड़कर जीना है।

तुम नहीं चाहती कोई भी तुम्हारी उच्चतम आध्यात्मिक अवस्था को जाने या उसमें कोलाहल करे परन्तु मन सबका उनके विचारों से बहुत कोलाहल करता है, उन्हें शान्ति प्राप्त नहीं है।

तुम्हें मैंने अथक पुरुषार्थ वाले अनगिनत कार्य दिए हैं, तुम उन्हें पूर्ण मन की शान्ति से करती जाओ, तुम्हारी अभंग शान्ति स्थिर रहेगी – इस आशीर्वाद के साथ ही मैंने तुम्हें आदेश दिया है।

जब मन की चरम सीमा पर कोई मेरा बालक पहुँच जाता है, यह कार्य मेरा है किस प्रकार दुष्ट, दुर्जन या कष्ट देने वालों को उनसे दूर किया जाए; तुम्हारा काम है जन कल्याण, उनको मैं देखूँगा।

मन की आखिरी सतह पर जब ओम् का गुंजन हो, मस्तिष्क में ब्रह्म कमल पूर्ण रूप से खिला रहता हो, हृदय प्रेम, दया, करुणा व सहानुभूति से भीगा रहता हो, उनकी मैं सदा दिन-रात रक्षा करता हूँ।

शरीर की कोटि कोटि नसों में, एक एक अंश में जब तुमने मेरा प्रकाश भर ही लिया है, कैसे मैं तुम्हें नहीं दिन-रात अपनी आँखों के समक्ष रखुँ?तुम सदा मेरी हो और सदा मेरी छत्रछाया में रहोगी।

मेरे मुख से निकले वचन, मेरी नाभि से निकला महाप्राण जब तुम्हारी नाभि को छूते हैं, तब एक अद्भुत घटना होती है, तुम्हारा हाथ कलम पकड़ कर लिखता है; कलम यूँ सहज चलती है जैसे छोटा बालक पानी पीता है।

विश्व में कोई ऐसी शक्ति नहीं है जो तुम्हारा काम रोके या अन्त करे, जो जो कार्य मैं तुम्हें प्रतिदिन दूँ वो अवश्य होगा ही, मेरा संकल्प व आदेश अटल है, जो मुझे तुमसे कार्य कराना है होगा ही, सारी प्रकृति तुम्हारे आगे झुकेगी।

विश्व में कोई वस्तु, मनुष्य, शक्ति या तत्त्व ऐसा नहीं है जो तुम्हारा आनन्द व आलोक को चुरा ले या उन्हें भंग कर दे, जो मैंने तुम्हें दिया है वो तुम्हारे अति शुभ संकल्प, कर्म व अथक पुरुषार्थ का परिणाम है।

धीरे धीरे करके सारी विरोधी शक्तियाँ पराजित हो जाएँगी तुम्हारे बिना कुछ किए, ढ़हती ईमारत को क्यों कोई हाथ लगाना चाहेगा? उनके दुष्कर्म व झूठ उन्हें अपने साथ बाढ़ की भाँति ले डूबेगा। सबको उनके भाग्य पर छोड़ दो।

मनुष्य जब भोगी, आलसी, क्रोधी, लालची व धोखेबाज़ होता है, उसे पता ही नहीं चलता उसके घर में कब चोर पीछे से घुस आता है। दुर्भाग्य वह चोर है जो बिना बताए पीछे के दरवाज़े से अन्धेरे में आता है।

जिन जिन लोगों ने तुम्हारे साथ धोखाधड़ी या षड्यन्त्र किए हैं, उनके भविष्य मैंने काली स्याही से लिख दिए हैं। समय आने पर उनकी धरती पैरों तले खिसक जाएगी, उन्हें कोई सहायता करने नहीं आने दूँगा मैं।

तुम अपना आत्मबल, मनोबल, इच्छा शक्ति, संकल्प शक्ति और बढ़ाओ, इनकी कोई सीमा नहीं होती। तुम जितना बढ़ाओगी, मैं उन्हें आठ से सोलह गुना और वृद्धि कर दूँगा। तुम केवल अपने लक्ष्य पर चलती रहो।

तुम्हारा आनन्द, आलोक न कभी कम होगा या कोई चुरा सकेगा, तुमने इतने शुभ संकल्प और शुभ-शुभ कर्म किए हैं। वे सब मिलाकर मैं तुम्हें तुम्हारे कार्य के लिये प्रसिद्धि, धन, यश व अनेक शक्तियाँ दूँगा।

जब कोई तुम्हारा नुकसान करे तुम मेरा स्मरण करो, ये मेरे वचन को मन में फिर याद करो, तुरंत तुम्हारी नाभि में एक नए जीवन का संचार होगा, तुम्हारे चारों ओर प्रकाश पुंज होगा – तुम्हारा आलोक व आनंद सदा के लिए सुरक्षित है।”

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