#63
ॐ
सूर्य के परे क्या है?सूर्य के उस पार क्या है? मुझे वहाँ जाना है।
सूर्य के परे मैं हूँ – मैं पूरे विश्व में व्याप्त हूँ…
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परमात्मा – “सूर्य के परे मैं हूँ, मैं पूरे विश्व में व्याप्त हूँ”
प्रात: काल की झीनी- झीनी सूर्य की किरणें पेड़ों के बीच से होती हुईं जब मेरे चेहरे पर पड़ रही थीं तो मेरा मन अकस्मात् ईश्वर की स्मृति में लीन जा हुआ। एक नई चेतना की लहर शरीर के प्रत्येक अणु में जा पहुँची। ऊर्जा का तेज सूर्य प्रकाश के द्वारा मुझे नव चेतना द्वारा नव जीवन देता जा रहा था। एक मधुर संगीत मन में गूँजा और मेरे मन में विचार आया – सूर्य के उस पार क्या है?
मैंने सूर्य व उस में विद्यमान प्राणों की शक्ति को नमन किया। योग की साधना सूर्य नमस्कार को याद किया और सूर्य नमस्कार की शक्ति को भी नमन किया। सूर्य नमस्कार करने से सूर्य की किरणें प्रात: काल में अपार प्राण शक्ति प्रदान करती हैं। ऐसा मैंने समझ कर सूर्य देव व उनकी अपार शक्ति के भंडार को नतमस्तक होकर धन्यवाद दिया।
मैंने उन किरणों को अपनी नाभि में प्रवेश करते महसूस किया। तत्काल मैंने महामृत्युंजय मंत्र बोलना शुरू किया। मन ही मन में और अमरता प्रदान करने वाले इस मंत्र को अपनी नाभि में संग्रहित किया। यूँ लग रहा था जैसे मेरे शरीर व मन में अथक कार्य करने की शक्ति परमात्मा ने दे दी आज प्रातः काल बिना माँगे।
घर में सुबह फिर से मन में कुछ देर फिर एक बात मन में सुनाई दी- “सूर्य के परे क्या है? मुझे उस तरफ जाना है।” अगले पल अपने जीवन का सारांश समझ में आ गया और मुझे परमात्मा के न्याय की शैली का बोध हो गया। बाहरी परिस्थितियाँ कितनी भी निम्न प्रकार की हों, चाहे पूरे जीवन में मुझे कोई विरला ही मिला हो जो अपने विवेक द्वारा जीवन के प्रति सकारात्मक व निश्चयात्मक दृष्टिकोण रखता हो।
परंतु करोड़ों में से कोई एक होता है जिसका जीवन कार्य अपने व दूसरों के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण रखता है। जीवन की बाहरी परिस्थितियाँ चाहे कितने भी निम्न क्यों न हो, अपना दृष्टिकोण सकारात्मक व रचनात्मक होने के कारण उनका मन सदा ऊर्जा से भरा होता है। प्रारब्ध-वश बाहर की गुलामी होने के पश्चात भी वे आनंद में रहते हैं।
मन से स्वतंत्र होते हैं और उनकी आत्म-उन्नति निरंतर होती रहती है। परमात्मा हमें ऐसी परिस्थितियों में जान कर डालते हैं जिससे हम निरंतर अपने मन की शक्ति को और पुष्ट करें। यदि मनुष्य प्रारब्ध-वश परतंत्र है, परन्तु उसके मन में प्रेम, निष्ठा, श्रद्धा, करुणा व लगन और पुरुषार्थ हो, तो वो मन के अंदर ही सुख पा लेता है। दृश्य नहीं, दृष्टिकोण सही होना चाहिए। दृष्टिकोण सदा अच्छा है तो मन स्वतंत्र होकर चेतना की बहुत ऊँची पराकाष्ठा पा लेता है।
दोपहर को 2:35 मिनट पर मैंने जब आँखे मूंदी, तो मेरा मन बहुत धीरे-धीरे मेरी चेतना को धरती से बहुत दूर आकाश के परे और सूर्य के भी परे ले जा रहा था। अतिश्रेष्ठ प्रकार की शांति अनुभव करने के बाद मुझे आभास हो चुका था कि परमात्मा मुझे ठीक मौका पाते ही मुझसे कुछ कहने को उत्सुक हैं। मैंने खुद को पूर्ण रूप से अपने मन को उनके स्वागत के लिए आतुर कर दिया। उन्होंने मुझे कभी न भूलने वाली बात कह दी-
“तुम्हारा मन अब सूर्य के प्रचंड शक्ति जैसा तेजोमय है। तुम मेरी शक्ति से बनी हो। तुमने आज मेरे आदेश पर सूर्य के परे जाने की कोशिश की। मैं तुम्हें ले जाना चाहता हूँ। सूर्य के परे क्या है? तुम्हारे तेजस्वी मन के परे क्या है? पूरे ब्रह्मांड में मैं व्याप्त हूँ। इस सारे ब्रह्मांड में मेरी शक्तियाँ हैं। मेरी शक्ति का एक अंश तुम में है।
मैंने तुम्हें शक्ति दी है मुझसे सम्पर्क बनाने के लिए। मेरी इच्छा व संकल्प का स्त्रोत हिरण्यगर्भ है। यह नाड़ियाँ देखो, ये तुम्हारी हैं। इनमें नीला, हल्का नीला रंग है। अब तक तुमने इनमें सोने या चाँदी के रंग जैसा कुछ देखा था। ये अति, अति, अति विशेष नाड़ियाँ सीधा मुझसे संपर्क करने के लिए होतीं हैं। जो मैं अपना संकल्प विश्व कल्याण के लिए आकाश में प्रसारण करता हूँ, तुम उसे मन में ग्रहण कर लोगी। वह मेरी ही शक्ति है।
मैं अब अपनी तीव्र इच्छा से चाहता हूँ कि तुम सबके समक्ष जाकर मेरे बारे में और ऋषियों के जीवन कैसे थे, अवश्य बात करो। तुम लोगों के जीवन आलोकित करो। अपना जीवन सबको खोलकर बताओ, जिससे उन्हें तुम जैसे बनने की तीव्र प्रेरणा मिले। उन्हें मेरी पुनरुत्थान की शक्तियाँ तुम्हारे द्वारा मिलेंगी। वे तुमसे स्वयं मिलना चाहेंगे, तुम्हें केवल अपना शरीर, मन, बुद्धि व आत्मा बहुत स्वस्थ रखना होगा। तुम्हारा काम बहुत अधिक सुंदर है, परन्तु तुम्हारी ऊर्जा बहुत लगेगी।
तुम्हारा मन अत्यधिक कोमल है क्योंकि उसमें प्रेम व करुणा का अंश बहुत है। मन अत्यधिक कोमल व संवेदनशील होने के कारण सूक्ष्म रूप में गहरे घाव लग जाते हैं जिसका तुम्हें ज्ञान नहीं है। तुम्हें शारदा पीठ, मार्तण्ड सूर्य मंदिर, नालंदा व ज्ञानवापी मंदिर की दशा देखकर मन में गहराई में खरोंच लगी थी जिसे नींद में 9 बार तुम्हारे घाव मैंने भरें हैं।
धरती पर नरसंहार बहुत हुआ है। मैं जानता हूँ ये सब मेरी आज्ञा देने पर ही हुआ है, इसमें अब तुम्हारे मन में उन खण्डहरों को देखकर घाव नहीं लगने चाहिए। इतना नरसंहार नहीं होता तो ये कभी न पहले और कभी न दुबारा धरती पर मेरी दिव्य शक्तियाँ विश्व में उतारी जाती तुम में, तुम्हारी पुस्तकों में। तुम्हारी पुस्तकों में मेरी अद्भुत शक्तियाँ व्याप्त हैं।
ये विश्व को आलोकित करने वाली शक्तियाँ केवल 10 हज़ार वर्ष तक धरती पर रहेंगी। वे तुम्हारे मन में व तुम्हारी पुस्तकों में मैंने प्रवेश पहले ही कर दीं हैं। प्रत्यक्ष रूप में अब तुम उनका साक्षात्कार कर रही हो। आगे भी ये शक्तियाँ धीरे-धीरे लोगों में उनके कल्याण हेतु संचारित होंगी।
तुम्हारे चिंतन, मनन, ध्यान, सोच व विचार, या फिर गहरी नींद में जो समाधि अवस्था है, रात्रि के 11:23 से प्रात: काल 3:22 मिनट तक ऊर्जा के रूप में, स्पंदन के रूप में आकाश में व्याप्त हो रहीं है। अब से यह 18 अप्रैल, 2025 सुबह 10:25 से 312% और ज़्यादा विश्व में फैलेंगी मेरी इच्छा अनुसार।
यह आशीर्वाद देने मैं तुम्हारे पास 9 अप्रैल को सुबह 9:32 मिनट पर प्रत्यक्ष रूप से प्रकट होकर संदेश दे चुका हूँ कि अब तुम मन से तैयार हो जाओ बहुत नए लोगों से मिलने के लिए। तुम्हारे पैर अब बहुत दूर दूर तक जाने चाहिए। बहुत उत्साह व उमंग से काफ़ी लोग तुमसे मिलने व बात करने के लिए आतुर हैं।
तुम्हें उनके लिए अब अपना बहुमूल्य समय निकालना ही होगा। तुम्हारे सारे काम समय पर हो जाएँगे निश्चय रूप से। अगले कुछ वर्षों में 12 लोग ऐसे तुम्हें अपना मन समर्पित करेंगे जिससे तुम्हें भविष्य में ज्योति मार्ग को फैलाने में सफलता मिलेगी। उनमें से 3 को तो तुम 18th अप्रैल ‘25 को मिलने वाली हो।
वे निरंतर, आजीवन भर तुम्हारी सेवा में निष्ठ होंगे। वे तुम्हारे अथक पुरुषार्थ व घनिष्ट तप को पहचान कर मन से नतमस्तक हैं। तुम उनको बहुत आशीर्वाद देना। वे तुम्हारे अस्वाभिमानी चेले हैं।
विदेश में भी तुम्हारा गुणगान होगा। कुछ वर्ष बाद ये पुस्तकें वहाँ भी छपने वाली हैं। अनेक भारतीय तुम्हें पूरा सहयोग व अपना सामर्थ्य देंगे। वे वहाँ का सारा भार खुद उठाएँगे। तुम्हें केवल अपना स्वास्थ्य, समय व ज्ञान को संभालना है। शेष कार्य सब मेरा है।
प्रत्येक दिन तुम मुझसे अपार शुभाशीष पाओगी क्योंकि तुम्हारे मन में मैं अणु मात्र भी कोई इच्छा या अहंकार नहीं देखता हूँ। तुम्हारे हर श्वास में मैं अपना प्रकाश डाल रहा हूँ । तुम्हारे मुख से मैं बोलता हूँ और तुम्हारे हर विचार व कर्म के पीछे मैं तुम्हे प्रेरित कर रहा हूँ। तुम्हारे दैदीप्यमान, प्रचंड व शक्तिशाली सूर्य-रूप मन के ठीक पीछे मैं विद्यमान हूँ। मैं तुम्हारे मन, शरीर व आत्मा में पूर्ण रूप से व्याप्त हूँ।”
तुम्हारा,
परमपिता परमेश्वर
14 अप्रैल 2025
प्रातः काल 3:22
