#64
ॐ
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परमात्मा –
“आज तुमने यह कर दिखलाया जो तुमने न कभी चाहा ।
और न ही करने वाली थी परन्तु आज अनहोनी हो गई।
तुम्हारा मन पूर्णतः डूबा था अपनी अथाह शान्ति में परन्तु,
मैंने तुम्हें आदेश दे दिया कि तुम्हें अब सब को बोध कराना है।
कई लोग तुम्हारे समक्ष थे जिन्होंने अपने अनेक जीवन यूँ ही गवाए।
वे आज पहली बार अपने समक्ष एक परम ज्ञानी व विदुषी को सुन रहे थे।
उनका मन व हृदय इतना सिकुड़ चुका था संसार के थपेड़े खा खाकर।
कि उनके अन्दर कोई विशेष शक्ति नहीं थी जिससे वे तुम्हें समझ सकें।
फिर भी तुमने अपनी पूरी ताकत लगा दी उनके सोए मन को जगाने में।
तुम्हें लग रहा था कि और मैं क्या करूँ जिससे वे झट से नींद से जाग जाएँ?
मैं वहाँ उपस्थित था, देख रहा था कि तुम कितना प्रयत्न कर रही हो।
जिस प्रयोजन से आई थी वह प्रयोजन सफल हुआ कि नहीं।
जब जब तुमने अपनी याचिका आकाश में मन के विचारों से डाली।
तब तब मैं तुम्हें प्राणों की ऊर्जा से ओतप्रोत करता जा रहा था।
आज तुम्हें लग रहा है कि जैसे तुमने अपने हाथों से पहाड़ उठाया है।
उन सबके मन कितने भारी थे, वह तुम्हें आज अनुभव में आया है।
यह गति मनुष्य की हो जाती है जब वह बहुत देर करता है मन को अन्दर मोड़ने में।
मन उनका मुड़ने की बहुत बड़ी कीमत माँगता है वर्ना वह ऊपर उठ नहीं सकता।
मैं तुम्हें सन्न होकर चुपचाप देख रहा था कि क्या तुम यह कार्य करने को इंकार करोगी?
परन्तु मैंने देखा कि जिस व्यक्ति का हृदय पारदर्शी था तुमने उनको अपनी पूर्ण शक्ति दी।
जैसे ही यह हुआ वहाँ की प्राण शक्ति वायुमंडल में घनिष्ठ होकर तुम्हारे अंदर प्रवेश कर गई।
तुम्हें आराम आया, राहत मिली और तुमने कुछ क्षणों बाद खुद को फिर से सशक्त पाया।
तुम्हारे मन में शान्ति, प्राण शक्ति व ऊर्जा फिर से पूर्ण रूप से चल पड़ी।
ऐसा होने पर लोगों को नई ऊर्जा का स्रोत मिला और वे चिंतन करने लगे।
मैंने जब यह चलचित्र देखा, मैंने तुम्हें झट आराम दिया अपनी ऊर्जा देकर।
तुमने अपनी नाभि में एक सिरहन महसूस की और तुम अपने को फिर से खड़ा कर सकी।
सारे ऋषिगण अत्यधिक प्रसन्न हुए; तुमने पहले भी कभी नहीं हार मानी थी भविष्य में नहीं ऐसा होगा।
तुमने आज तक मेरी एक भी बात नहीं टाली है; मुझे पहले से ही ज्ञात था कि तुम कमाल कर दिखलाओगी।
यह तो सिर्फ शुरुआत है आगे-आगे देखो कितने करिश्मे होते हैं।
लोगों को तुम अपनी दिव्य शक्तियाँ अदृश्य रूप में दिखाओगी।
यह तभी होता है जब मेरा कोई अत्यधिक प्यारा बालक मुझे सारा का सारा मन देता है और मुझसे जुड़ता है।
उसका मन 100% मुझमें समाया होता है, प्रत्येक पल वह केवल चमत्कार देखता है और चमत्कार कर दिखलाता है।
तुम्हारे समक्ष विभिन्न प्रकार के लोग आएँगे। तुम भयभीत न होना, तुम उन्हें केवल अपनी समझ देना।
वे तुम्हारे उच्च कोटि का ब्रह्म ज्ञान सुनकर अचंभे में पड़ जाएँगे क्योंकि इसमें कोई भी मिलावट नहीं है।
तुम उनको आशीष देना जिससे वे अपने नए मार्ग पर सफलता पाएँ
और वे तुम्हें एक महान गुरु व योद्धा देख पाएँ।
उनकी इच्छा अब बस इतनी है कि तुम उन्हें सत्य का मार्ग दिखाकर
उनके जीवन को आलोकित करो।
जिस काम को मैं ठान लेता हूँ वह अवश्य होकर ही रहता है।
ऐसी ही लगन तुम्हारी है, लोग इसके कारण तुम्हें नतमस्तक होंगे।
देश-विदेश में दूर-दूर जाओ, चारों तरफ सत्य का प्रकाश फैलाओ।
पूर्ण रूप से आज सत्य केवल तुम्हारे पास ही है……..”
