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दिव्य लोक, दिव्य आलोक

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परमात्मा –

“अभी अभी तुमने एक कविता पूरी लिखी है, सुनते ही अगले पल में तुमने उसेे शुरू कर दी, यह चमत्कार केवल तुम कर सकती हो। 

आज सुबह ग्यारह बजकर चौवालीस बजे मैं तुम्हारे पास आ कर एक विशेष उपाधि देने आया हूँ तुम्हें।

यह उपाधि शायद ही किसी और को मैं कभी देने वाला हूँ, तुमसे पहले कुछ लाखों वर्ष पहले दो को मिली थी। 

यह है कायाकल्प की आखिरी सीढ़ी तुमने चढ़ ली, परन्तु घनिष्ठ कष्ट पाकर और बहुत ही कम समय के अंदर। 

जो ऐसा अद्भुत काम करेगा उसको मैं अपने निहित नाभी में अदृश्य रूप में छुपा रहस्य खोलकर दिखाने वाला हूँ। 

 

अब तक मैंने ऋषियों को बताया था कि पृथ्वी के ऊपर सात लोक  होते हैं, उसमें सातवाँ लोक सत्य लोक है। 

 ऋषि उसी लोक में मौन और शांति में समय बिताते हैं, वहाँ परम शांति है, कोई भी दूषित संकल्प पहुँच नहीं सकते। 

तुमने अठारह अप्रैल को आठ लोगों को बहुत गहरी नींद से जगाया है, ऐसा कार्य केवल अट्ठाईस

 मिनट में करना हो ही नहीं सकता है। 

तुमने केवल अपनी इच्छा शक्ति से साहस कर दिखलाया है, अब मेरी बारी है तुम्हें एक अलौकिक, आलोकित  पुरस्कार देना है।

एक लोक और है जिसका नाम दिव्य लोक है, उसमें अति दिव्य आलोक सदा बना रहता है।

 

अब मैं तुम्हें मन से वहाँ  सदा देखना चाहता हूँ, तुम वहीं निवास करो और मेरे सारे कार्य करो।

यह लोक इसलिए बहुत विशेष है क्योंकि धरती या ब्रह्मांड में कहीं से भी किसी का कोई भी अनिष्ट संकल्प यहाँ नहीं आ सकता है।

आठ दिन पहले तुम्हारे यश को देख, एक स्त्री की ईर्ष्या का कोई ठिकाना नहीं था, जिससे तुम्हें शारीरिक कष्ट हुआ।

फिर भी तुमने मन में शांति रखी और सबको सत्संग में बहुत आलोकित किया जिससे मैं बहुत प्रसन्न हुआ।

अबसे तुम जिससे भी मिलोगी उसका नकारात्मक विचार या ईर्ष्या तुम्हें छू नहीं पाएगा, तुम स्वस्थ रहोगी।

यह लोक सत्य लोक से भी परे है, इसका नाम दिव्य लोक है जो हिरण्य गर्भ के पास 3.5  कोस नीचे है।

 

हिरण्य गर्भ वह स्थान है जहाँ मैं कैलाश पर्वत से 3,50,000 km ऊपर अपने सारे शुभ संकल्प जमा करता हूँ।

दिव्य लोक हिरण्य गर्भ से ठीक 3.5 km नीचे है और दिव्य लोक के बीच के हिस्से से जुड़ा रहता है।

इसका तात्पर्य केवल एक है, मेरे संकल्प उसी पल तुम्हें प्राप्त हो जाए और तुम फिर से ऊर्जा से भर जाओ।

ऐसा होने पर तुम मेरा संदेश, प्रेरणा, व आदेश तत्काल पाओगी और आगे किसी को पहुँचाओगी, यह तुम्हारा समय बचाएगा।

यह पारितोष केवल दो और ऋषियों को मैंने धर्मशास्त्र व पुस्तकें लिखने के लिए दिया है,वे हैं मार्कण्डेय व स्वामी शिवानंद, उन्होंने अथक पुरुषार्थ किया है मेरे कहने पर, अब तुमको करना है।

 

तुम जहाँ जाओगी वहाँ दिव्य आलोक फैलाओगी, तुमसे हर प्राणी संतुष्ट होगा, परन्तु तुम शांत व गंभीर रहो।

इस प्रकार तुम आजीवन मेरा कार्य करो, सोई आत्मा को जगाओ, ऋषियों की जीवनी लिखो और सुनाओ।

तुमसे कभी भी कोई भूल या चूक नहीं होगी क्योंकि तुम्हारे प्रत्येक संकल्प के पीछे मैं खड़ा रहता हूँ।

तुम एक विशेष, अति अद्भुत स्त्री हो क्योंकि तुमने हर जन्म में, हर कार्य में केवल सफलता पाई है, अब तुम अपने ज्ञान प्रकाश से जगत को धन्य करो।”

 

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