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अशान्ति में शान्ति का संदेश, युद्ध में से निकलेगा अमृत-कलश; भारत फिर से देगा विश्व को शान्ति का संदेश, भारत फिर से बनेगा विश्व गुरु ।

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(India strikes in POK on 7th May 2025, Operation Sindoor )

परमात्मा07-05-25 

“मध्य रात्रि हो चुकी है। तुम्हें मैंने सुला दिया यह कहकर कि तुम विश्व को मेरी ओर से एक नया संदेश दो। पहले भी अनेकों बार यह कार्य तुम्हारे कर-कमलों से करा चुका हूँ। (1 of 3)

तुम रात्रि छः मई को छटपटा रही थी। समय को करवट लेते हुए तुम्हें उसकी भनक हो चुकी थी, तुमने भांप लिया था कि मैं संसार में पुनर्स्थापना करने जा रहा हूँ। तुमने ठान लिया था, तुम भी देश की सेवा करोगी। 

बहुत दिनों से मैं तुम्हें बोध करा रहा हूँ कि कैसे पूरे विश्व का संतुलन पूर्ण रूप से बिखर चुका है; अनादि काल से मेरी दिव्य शक्तियाँ धरती पर धीरे-धीरे नष्ट हो चुकीं हैं। वे अब अपना कार्य करने में असमर्थ हैं। 

वे दिव्य शक्तियाँ मेरी मैंने संजोई थीं धर्म, सत्य, योग व तप में, शास्त्रों के कुंभ में व सनातन धर्म के कलश में। कर्म-काण्ड के पात्र में भी मैंने उन्हें समाया था व शेष उपवास व निर्जला व्रत में अनुशासन के रूप में।

परन्तु कुछ प्राणियों को छोड़कर सभी का मन माया व भोग विलास में ही पूर्ण रूप से जा चुका है, उन्हें कभी भी कोई अनुशासन, व्रत व तप नहीं चाहिए। 

उन्हें न कोई सीमा चाहिए जो मर्यादा में मैंने अपनी शक्ति के रूप में डाल दी थी, न ही प्रत्याहार, मौन व मन में शान्ति लाने के लिए ध्यान करने की इच्छा रहती है। 

जब मनुष्य सभी सीमाएँ पार कर देता है अनुशासन, मर्यादा व मानवता की, तब मैं कुछ पुण्यात्माओं के द्वारा विश्व में अनेक अलौकिक कार्य धर्म व सत्य हेतु सिद्ध कराता हूँ।

तुम उसी श्रेणी की पुण्यात्मा हो जिसे मैंने विश्व को विशेष संदेश देने के लिए चुना है। यह आपातकालीन है, यह समय अत्यधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि पुण्यात्माओं को पुरस्कार व असुरों को दण्ड देने वाला हूँ। 

यह तभी होता है जब मैं काल का चक्र अपने संकल्प मात्र से ब्रह्माण्ड में चला देता हूँ; एक बार इसे मैंने चला दिया तो विश्व में कोई शक्ति इसे रोक नहीं पाएगी। यह तभी रुकेगा जब मैं संकल्प उठाऊँगा हिरण्यगर्भ में।

कल रात्रि 10:37 बजे मैंने तुम्हें इससे अवगत कराया था और तुमसे याचना की थी कि अब तुम विश्वगुरु बनो, छुपो मत। तुम्हें मैंने अपने प्रकाश से अनगिनत बार ओत-प्रोत किया है – तुम झरने की तरह गाते हुए बहो। 

तुम्हारे मन के कण-कण में प्रेम, दया, उत्साह, उमंग व दिव्य-ज्ञान का अपार भंडार है; तुम तो महासागर हो, कैसे अब फिर से सरिता बन पाओगी? सागर की कोई सीमा नहीं होती। तुम्हारे अंदर असीम दिव्य ज्ञान है मेरे बारे में, प्रकृति और ऋषियों की जीवनियों का।

यह सब तुम अब मुझे भेंट चढ़ा दो; मैंने तुम्हारी अति कठोर तपस्या के बदले इसी दिन के लिए आशीर्वाद रूप में दिया था। आज संसार को तुम्हारी बहुत ज़रूरत है; तुम अब अज्ञात स्त्री रहो या वनवास में और नहीं जी सकती। 

यह इसलिए तुमसे मैं आज खुलकर संसार के समक्ष कह रहा हूँ क्योंकि विश्व में इस समय पाप सीमा पार करके अत्यधिक बढ़ चुका है। पुण्यों की संचित की हुई अलमारी या गठरी तो शायद ही किसी के पास है। 

परन्तु तुम एक निराली ऐसी स्त्री हो जिस के पास 2019 दिसंबर से पुण्य इतने जमा हो रहें हैं कि उनमें से थोड़े ले लूँ तो आज धरती को प्रलय में डालने से रोक सकता हूँ। वही मैं 2020 में कर चुका हूँ। एक बार फिर से क्या तुम प्रलय रोकने में मेरी सहायता करोगी?

भारत को मुझे फिर से धर्म, तप, सत्य व योग के द्वारा उठाना है परन्तु वह तब होगा जब कोई अपना तप, योग व पुण्य को विश्व शान्ति के लिए मुझे दान में दे दे। यदि यह मैं नहीं करूँगा तो पापों से धरती विलय हो जाएगी। 

धरती का विलय होना, प्रलय आना अशुभ भविष्य का संकेत होता है। पंचमहाभूतों को मैं आदेश देता हूँ, वे एक-एक करके धरती, वनस्पति, मनुष्य के शरीर व मन को जल व आकाश से अलग कर देते हैं दण्ड रूप में। तभी कोविड आया था। 

बहुत लोग आँधी, तूफ़ान, बाढ़, महामारी व अज्ञात बिमारियों से मारे जाएँगे, नदी का जल घरों में भर जाएगा और जंगल की आग तुमको जलाकर सज़ा देगी। तुम्हारे अणु अस्वस्थ होंगे जिससे न तुम अच्छी तरह जी पाओगे न मृत्यु मिलेगी। 

तुमने अपना इतना अद्भुत जीवन अपनी मन की इच्छा शक्ति, कड़े अनुशासन व वैराग्य से बनाया है। तुमने कभी कोई अपनी इच्छा पूरी नहीं की; सदैव पूछती रही कि क्या यह आपको स्वीकार है? और मैं तो सदा तुम्हारे मन में जागृत होकर तुमसे प्रेम करता रहा।

तुम्हें तो धर्म युद्ध अति पसंद है, तुम्हें अपनी भूमि से बहुत प्रेम है और तुमने तो सारे कर्तव्य खूब पूरे किए। अब तुम्हें मेरे आदेश पर विश्व को मेरा संदेश देना होगा। तुम्हें अब विश्वगुरु बनना ही होगा; यह आज समय की माँग है।

प्रचंड रूप में सत्य का तुममें सदा वास है, मेरी स्मृति तुम नींद में मन के गहरे पटल पर भी नहीं भुला सकती। एक क्षण के लिए भी अहम् भाव व कोई भी इच्छा तुम्हारे मन के द्वार पर नहीं आते। तुमने तो सदा केवल मेरा प्रेम पाकर उसी खुशी में जीना चाहा है।

जिसका चित्त इतना धवल हो, लेशमात्र भी जिसके चित्त में माया का भान न हो, जिसे भूल जाता हो कि परमात्मा की वह बहुत प्रिय पुत्री है और जो दिन रात केवल अपने परम प्रिय ऋषियों की जीवनी लिखती हो, मुझे वैसे ही पात्र की साढ़े तीन लाख वर्ष से प्रतीक्षा थी।

यह विशेष कलियुग है मनुष्य अपने मन व देह की इच्छा या वासना हेतु सारी सीमाएँ पार कर चुका है। वह अत्यधिक भोगी, निर्लज्ज, स्वार्थी व अहंकारी है। वह धन, सत्ता व अपने अहंकार के बल पर जीना चाहता है।

परन्तु मेरा संसार टिका है वैराग्य, त्याग, ममता, बलिदान, तपस्या व ईश्वर में अटूट विश्वास पर। यह धरती को मैंने आदेश दिया था 43 करोड़ वर्ष पहले कि जब धरती पर अत्यधिक पाप, अज्ञान, स्वार्थ व सम्मोहन हो, तुम खुद से धीरे-धीरे विलय होकर प्रलय कर देना।

यदि कोई तुम जैसी विलक्षणा इसका विपरीत कर दे जिससे मेरी धरती सुरक्षित रहे और विश्व में प्रलय न आए तो यह मेरा संकल्प है कि तुम्हारे कर कमलों से मैं ऐसा कुछ लिखवाऊँगा जिससे विश्व अचंभित हो और तुम्हारी लेखनी से मेरी बात सुने।

यह मेरी भविष्यवाणी है अब समय आ गया है कि भारतवर्ष फिर से जागेगा, यह युद्ध उसी की घोषणा है; युद्ध में से अमृत कलश निकलेगा। भारत देश सदा से शान्ति प्रिय है, वह सदा अग्रणी रहेगा। ऋषियों के तप से यह भूमि जागी है, वे समस्त विश्व को तुम्हारे द्वारा जगा रहे हैं।

तुम्हारे प्रत्येक संकल्प शुभ हैं, तुम सबकी यूँ ही सेवा करती रहो, विश्व में ज्यों ही पुण्य अधिक बढ़ेगा पाप को घटाकर, भारत में फिर से योग, तप, धर्म व सत्य जागेंगे – यही मेरा संकल्प है। भारत में लोगों के मन में वेदों की स्मृति जगाओ, ॐ का स्मरण करो।

भारत में, फिर भारत से दूसरे देशों में ॐ का गुंजन करो। ॐ मेरा दिया हुआ तुमको महामंत्र है। वह तुम्हें पाप करने से बचाएगा। यह संसार को धीरे-धीरे बदलो, फिर से धरती पर शान्ति को बसाओ। मन में शान्ति आएगी, ध्यान करो।

ध्यान पुण्य है, ध्यान तुम्हें शालीन व वैरागी बनाएगा, लोभी मत बनो। ध्यान तुम्हारी श्वास को नियंत्रित करेगा। ध्यान से तुम्हें स्वप्नदोष नहीं होगा। ध्यान वासनाओं को कुछ दिनों में पूर्ण रुप से जला देगा।

जब अधिक लोग ध्यान करेंगे, तो लोगों की, पशु-पक्षियों की व पेड़ों की आयु लंबी होगी। नदियाँ भरी रहेंगी और लोगों के मस्तिष्क बहुत स्वस्थ व निरोगी बन जाएँगे। ध्यान से विश्व में ठण्डी हवा बहेगी, गर्मी कम होगी।

इच्छाओं से आज संसार जल रहा है, सब को ध्यान में संतोष का जल पीने को मिलेगा। ध्यान करने से तुम्हारी अगली पीढ़ियाँ संस्कारी व सज्जन होंगी। ध्यान लगाने से तुम्हारे परिवार में मुक्ति व निर्वाण की सद्गति मिलेगी।” 

 

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