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ॐ
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परमात्मा – 11-05-25 (Operation Sindoor Series)
भाग 1 – भारत का गौरवशाली अतीत
“कृपा कर भारतवासी अपना अतीत जानें, भारत सदा से ही अग्रणी रहा है और सदा रहेगा; मैं आज तुम्हें अवगत कराना चाहता हूँ उस इतिहास की जो केवल अब तक ऋषिगण जानते थे।
उनमें छः ही ऐसे ऋषि हैं जिनको मैंने बहुत पहले उनके मन के विशेष तप करने पर आशीर्वाद रूप में दिया था; वे हैं – मार्कण्डेय, शिवानंद, अमरा, भृगु, पतंजलि व धन्वन्तरी ।
ये सारी आत्माएँ बहुत विशेष व प्रतिभाशाली हैं; उन्होंने अपने प्रिय विषय में अत्यधिक शोधन किया था; उनकी तुम पर अत्यधिक कृपा है क्योंकि तुमने कलयुग में अदम्य साहस के कारण उन्हें जाना है।
पहले मार्कण्डेय फिर उनके अति प्रतिभाशाली पुत्र दधीचि जिनको आज विश्व ऋषिकेश के स्वामी शिवानंद के नाम से परिचित हैं- वे दोनों को आशिष मिला अद्वितीय संकल्प शक्ति का, वे अमर हो गए।
अमरा एक बहुत पुरातन आत्मा है जिसे विश्व में शान्ति चाहिए; उन्होंने मुझसे ध्यान द्वारा असीम शान्ति को पाया है। उनका कार्य है विश्व में शान्ति का प्रसार व संदेश ध्यान द्वारा आकाश में संचालित करना।
भृगु ने जंगलों में अनेक जीवन कठिनाइयों से बिताएँ हैं शोधन करने हेतु; अपने छोटे भाई पतंजलि सहित उन्होंने मुझसे ध्यान द्वारा योगशास्त्र मन में उतार लिया। परंतु भृगु अभिन्न थे।
उन्होंने अपने भाई को यश दिलाना चाहा और मुझसे प्रार्थना की कि पतंजलि को विश्व में सब कोई जाने क्योंकि उनके मन में जगत कल्याण की इच्छा थी। योग, ध्यान व आसन के कारण वे प्रसिद्ध हुए।
भृगु का गणित अचूक था; जंगलों में भी वह नक्षत्र, तारे व अनेक लोकों को जानने की जिज्ञासा रखते थे। उनका एक बार किसी विषय पर मन केंद्रित हो गया तो हिलाना असंभव है। मैंने उन्हें ज्योतिष शास्त्र में श्रेष्ठ स्थान दिया।
धन्वन्तरि को लोमा की भांति वनस्पति, वन व औषधि में विशेष रुचि थी। मैंने धरती पर उनके द्वारा आयुर्वेद के सारे रहस्य उनके ध्यान में खोल दिए। भारत को धन्वन्तरि ने आयुर्वेद दिया रोग दूर करने के लिए।
भाग 2 – शान्ति ही परमात्मा है, ॐ दिव्य ध्वनि है, ॐ ईश्वर का प्रतीक है
भारत एक बहुत धनी देश है क्योंकि ऋषियों की तपस्या के कारण उन्होंने धरती पर अनेक विषयों पर शोधन किया और उसे जन कल्याण के लिए संकल्प किया – मैंने उनके संकल्प को धरती पर उतार दिया।
इस प्रकार ऐसे और सोलह ऋषि हैं जिन्होंने बाद में काशी में आकर भूगोल, अर्थशास्त्र, धर्मशास्त्र, गणित, आत्म ज्ञान, कर्म कांड, विज्ञान इत्यादि को पुस्तकों में संचित किया। ऐसा कार्य तपस्वी करते हैं।
इस धरती पर भारत देश में सबसे पहले मनु ने अति उत्तम मन में संकल्प उठाया; प्रकृति के प्रति उन्हें बहुत आभार और कृतज्ञता हुई और उनकी अगली तेईस पीढ़ियाँ प्रकृति को पूजने लगी और प्रकृति को भगवान माना।
मनु जैसा दोबारा कोई मनुष्य पैदा नहीं हुआ क्योंकि इतनी पुरानी आत्मा जब बहुत शुभ संकल्प मन में करती है तो धरती पर अत्यधिक कल्याणकारी प्रभाव पड़ता है। प्रकृति ने उन्हें आशीर्वाद दिया मेरे कहने पर।
आशीष अत्यधिक लाभकारी था पूर्ण मानवता के लिए – भारत अब से सदा आध्यात्मिक केंद्र बना रहेगा, भारत पहले से ही मनु द्वारा धरती पर अग्रणी बन गया केवल एक शुभ संकल्प द्वारा।
मैंने ही उन्हें आशीर्वाद दिया क्योंकि मनु धरती पर पहला मनुष्य था जिसने जन्म लिया; उनके मन में प्रकृति के प्रति अत्यधिक प्रेम, संरक्षण-भाव व आदर था। तभी मैंने संकल्प ले लिया।
भारत ही ऐसा देश सदा रहेगा जो आध्यात्मिक केंद्र रहेगा। जो संरक्षण करेगा, मेरा आशीर्वाद पाएगा । मनु ने अपनी अगली पीढ़ियों को भी यही सिखाया – प्रकृति ईश्वर की रचना है इसलिए उसे हमें पूजना है।
विश्वामित्र, अमरा, पुलस्त्य, अगस्त्य, वशिष्ठ, विश्वकर्मा, व धन्वन्तरी धरती पर बहुत शान्ति उतारना चाहते थे अपने योग बल से। मैंने उनकी तपस्या सफल की और धरती पर मेरी शान्ति उन्होंने नीचे उतार ली।
मार्कण्डेय, आदि शंकराचार्य, लोमा, कपिल, कश्यप, कार्तिक, बोगरनाथ, गोरखनाथ सबने ॐ द्वारा धरती पर बहुत शान्ति उतार ली। मातंग, परशुराम, वशिष्ठ व धन्वन्तरी ने भी ॐ की बहुत तपस्या की।
भाग 3 – ॐ और शान्ति भारत के वायुमण्डल पर सदा रहेंगे
जब धरती बनी नहीं थी, ॐ का गुंजन था, ब्रह्मांड में ॐ गूंज रहा था, ॐ में मेरी शान्ति व्याप्त है; वैसे ही अनन्य, अविरल, नीरव शान्ति करीब एक करोड़ वर्ष पहले मैंने धरती पर उतार दी जिससे मानवता का लाभ हो।
तीन ऋषियों ने इसे अपने घोर तप द्वारा अपने मन में सदा के लिए उतार लिया। सबसे पहले विश्वामित्र, फिर अमरा ने और तीसरे ऋषि विश्वकर्मा को मैंने उनके कठोर तप के लिए भेंट की, ऐसी शान्ति अब तुमने पाई।
जब कोई तपस्वी अनन्य, अविरल, अचूक शान्ति प्राप्त कर लेता है तो जहाँ उसने पहली बार अनुभव की और उसे प्राप्त किया है, वहाँ सदा-सदा के लिए ब्रह्म प्रकाश रहता है, ऐसे स्थान पर मेरी अमर ज्योत रहती है।
तुम्हारा निवास ‘तपोवन’ वह स्थान है जहाँ पर सबसे पहले 97 लाख से अधिक वर्ष पहले विश्वामित्र ने, फिर उनके प्रिय पुत्र अमरा ने तीन हज़ार बाईस वर्ष आज से पहले, अपने ध्यान में अविरल शान्ति पाई, तुमने 13 दिसंबर 2020 में पाई है।
उसके बाद तुमने अविरल शान्ति का अनुभव 1032 बार कुछ क्षणों या कुछ और लंबे समय के लिए अनुभव किया है। अमरा के बारे में हर लेख जो तुमने लिखा है या विश्वामित्र या विश्वकर्मा, उसकी पुनरावृत्ति हुई है।
जब तुमने विश्व की पुनर्स्थापना *वर्ल्ड रिफॉर्मेशन की चर्चा की है सत्संग में 26 दिसंबर 2024 बेंगलुरु में, तब भी तुम अविरल शान्ति में एक घंटा बाईस मिनट तक डूबी हुई थी। तुम्हें विश्व में बहुत शान्ति फैलानी थी।
अब तुम इस अभंग, अविरल व अपूर्व दिव्य शान्ति को अपनी चेतना द्वारा विश्व में अपने ध्यान, लेख, विचार, समाधि व सत्संग के माध्यम से जन मानस के लिए ॐ द्वारा, ॐ के गुंजन द्वारा धरती पर उतारो।
ऐसा करने पर भारत का वायुमण्डल युद्ध से, अज्ञान, हिंसा व नफरत से लिप्त नहीं होगा; भारत के वायुमण्डल को पुनः तुम स्वच्छ करो अपने शुभ संकल्पों से, ॐ के गुंजन से व अविरल शान्ति की समाधि अवस्था द्वारा।
ऐसा ही तुम आगे करोगी; जब-जब भारत का आकाश अपवित्र, हिंसक या द्वेष की आग से भरा होगा तब-तब तुम अद्वितीय, अपूर्व, अविरल शान्ति को ‘तपोवन’ में स्थापित कर दो। भारत का तुम कल्याण करोगी।
इस प्रकार जिन तीन ऋषियों ने अविरल शान्ति भारत पर करीब एक करोड़ वर्ष पहले धरती पर उतारी थी, तुम उसे मजबूती से पुनः स्थापित करती रहो; मुझे भारत को फिर से विश्व-गुरु बनाना है। तुम्हारे कर कमलों से मैंने ‘तपोवन’ में 13 दिसंबर 2020 को ॐ की ईंट रख दी!”
ॐ
(*World Reformation)
