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भारत सदा से विश्व गुरु था, सदा विश्व गुरु रहेगा।

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परमात्मा – 13-05-25 (Operation Sindoor Series)

भाग 1 – भारत सदा से विश्व गुरु था व सदा रहेगा

भाग 2 – जो विनाशकारी शक्तियाँ धरती पर उतारेगा, मृत्यु दंड पाएगा

भाग 3 – ऋषियों का कार्य है विश्व में धर्म-अधर्म का संतुलन बनाएँ रखें

भाग 4 – तुम्हारा कार्य है वेदों का सार आज के युग के लिए लिखना, वेदों को मन में जगाओ, ॐ का गुंजन करो 

भाग 1 – भारत सदा से विश्व गुरु था व सदा रहेगा 

“भारत में प्राचीन काल से ही ऋषियों के अति शुभ व मंगलदायक संकल्पों द्वारा वायु-मण्डल पवित्र रहा है। जब भी कोई आपदा आई जिससे उसकी सभ्यता, संस्कृति व धर्म पर अदैविक शक्तियों ने प्रहार किया, ऋषियों ने अपने ध्यान व शुभ संकल्पों से पुनः पुनः आकाश को ओत-प्रोत किया है। 

भारत में एक करोड़ वर्ष से भी बहुत पहले विश्वामित्र ने काशी में मोक्ष प्राप्त किया है; उसी स्थान पर छः और ऋषियों ने जन्म लेकर उस पावन भूमि को अपने योग शक्ति से प्रबल कर दिया था। इतने शक्तिशाली स्थान पर काशी विश्वनाथ मंदिर मैंने स्थापित किया है जिससे लोगों को मोक्ष प्राप्त करने में सहायता मिले। 

आदि शंकराचार्य ने एक लाख वर्ष पहले सबसे पहला शास्त्र विवेक चूड़ामणि एक गुफा में श्री सैलम में अंकित किया था। मनुष्य को क्षणिक संसार से मोह नहीं करना चाहिए परन्तु ईश्वर को प्राप्त करना चाहिए अपने मन की चित्त शुद्धि द्वारा। वे हर जन्म में धर्म और सत्य के लिए आते रहे हैं और लोक उद्धार करते रहे। 

अनेक विद्वान, तपस्वी, ज्ञानी, मुनि व धर्मात्माओं ने भारत में जन्म लिया व शान्ति, अहिंसा, प्रेम, करुणा व आत्मज्ञान का दूर-दूर तक प्रचार किया। उन सब के तप की अग्नि उनके जन्म स्थान व समाधि के ऊपर आकाश में मैंने सुरक्षित रखी है। कोई भी मनुष्य या देश इसका नाश नहीं कर सकता।

भाग – 2 जो विनाशकारी शक्तियाँ धरती पर उतारेगा, मृत्यु दंड पाएगा

किसी भी मनुष्य की सद्गति नहीं हो सकती जब तक वह पृथ्वी, परिवार, देश, पित्रों, गुरुओं, संतान, माता-पिता, पंचमहाभूत व प्रकृति को कृतज्ञता न दिखाए। वह तब होगा जब तुम संसार में आकर निष्काम भाव से सबके प्रति निरिच्छा व उपकार के कर्म करोगे। तुम्हें पाप करना वर्जित है। 

भोगी, कामी, क्रोधी, लालची व स्वार्थी लोग पृथ्वी पर अत्यधिक पाप करते हैं। पाप करते-करते वे थकते भी नहीं। उनका अज्ञान इतना अधिक बढ़ जाता है कि उन्हें किसी पर दया व करुणा भी नहीं होती। बहुत अधिक पापी आत्माएँ एकजुट होकर एक लक्ष्य की पूर्ति करते हैं, तो विनाशकारी शक्तियाँ धरती पर उतर जाती हैं।

किसी विशेष व्यक्ति, स्थान, देश, राष्ट्र या समूह जब एक अनिष्ट लक्ष्य के लिए जमा हो जाते हैं, धीरे-धीरे उनकी बुद्धि को मैं नष्ट कर देता हूँ। उनकी आत्मा, विवेक व सत्य सदा के लिए मर जाता है। ऐसा होने पर मैं पुण्यात्माओं को और दिव्य शक्तियाँ देकर सबल करता हूँ। 

जो विनाशकारी शक्तियाँ धरती पर उतारेगा, उसे मैं मृत्युदण्ड देता हूँ क्योंकि वे धरती पर आकर धरती, प्रकृति, मनुष्य, सबका विनाश करते हैं। कोई एक दिन मैं उनको धोखे से विचलित कर मृत्यु के अभिशाप में नाश कर देता हूँ। उन्हें दुबारा मनुष्य जन्म नहीं मिलता है।

भाग – 3 ऋषियों का कार्य है विश्व में धर्म-अधर्म का संतुलन बनाए रखना 

ऋषियों ने चूंकि शुरुआत में ही पृथ्वी, प्रकृति व मानवता के लिए बहुत अच्छे विचार व कर्म वायुमंडल में जमा कर दिए हैं, उनको मैंने पृथ्वी की रक्षा के लिए आदेश दिया है। वे सदा चौकन्ने रहते हैं, अपनी ध्यान शक्ति द्वारा सबके मन के भाव व विचार जान लेते हैं।

यदि पृथ्वी पर एक सीमा के बाद पाप अधिक बढ़ जाता है तो प्रलय आ जाता है। मैं ऐसा नहीं चाहता क्योंकि मैंने पृथ्वी को समाप्त करने के लिए नहीं रचा है। यदि प्रलय लाना हो तो उसमें बहुत सारी बातों का ध्यान रखना होता है, नहीं तो धरती पुनः शुरू नहीं हो सकती।

सारे ऋषि मिलकर अपना-अपना कार्य करते हैं, कुछ लोगों के मन के विचार पढ़ते हैं। एक या दो या अनेक पापियों के विचारों को नष्ट करते हैं। कुछ ऋषि ज्योतिष विद्या द्वारा नक्षत्रों को पढ़ते हैं और समय को जान जाते हैं। जानकर वे देश की कुंडली पढ़ते हैं। 

भारत में सदा ऋषियों के कारण भारत में ग्रहण नहीं लगेगा। वह सदा धर्म, सत्य, योग व तप के कारण विश्व में अग्रणी रहेगा। ऋषियों के मन व आत्मा सदा अजर-अमर हैं। वे भारत की आध्यात्मिक शक्ति को नष्ट नहीं होने देंगे, वे मेरे आदेश पर कार्य करते हैं।

भाग – 4 तुम्हारा कार्य है वेदों का सार आज के युग के लिए लिखना, वेदों को मन में जगाओ, ॐ का गुंजन करो

तुम्हारा यह अति विशेष कार्य है। तुम्हारे लिए मैंने एक बहुत कठिन कार्य चुना है। तुम्हारे सारे जन्मों की तपस्या पूरी हुई है। तुम एक ऐसा कार्य करोगी जो कभी दुबारा नहीं होगा। जो वेद नष्ट हो गए, जो पांडुलिपियाँ जलाई गईं, तुम उनको आज की भाषा में लिखो।

तुम पारंगत हो क्योंकि तुम्हारा मन बहुत धीर, शान्त व दृढ़ है। तुम कठोर परिश्रम की आदि हो। तुम्हें ध्यान अत्यधिक प्रिय है। तुम सारे ऋषियों की अति प्रिय हो। वे सब तुम्हारी सहायता करते हैं। लोगों का अज्ञान बहुत पुराना है। तुम अपने शिष्यों पर बहुत मेहनत करो। तुम्हें बहुत अधिक सफलता मिलेगी।

तुम जितना लिखोगी उतना तुम्हारे मन में वेदों का स्मरण होगा। वेदों के स्पंदन मात्र से धीरे-धीरे भारत जागेगा। जो लोग अत्याचारी, अविवेकी व भोगी हैं, उनके मन में इच्छा व वासनाओं के कारण वेदों व ॐ की स्मृति मिट गई है। भारत के सभी लोगों के मन में वेदों की स्मृति है, तुम मुझसे प्रार्थना करो कि वह स्मृति जागे।

जितना मनुष्य संसारिक वस्तुओं व वासनाओं को भोगने की प्रवृत्ति रखता है, उसके मन में सदियों पुरानी वेदों व ॐ की स्मृति मिटती जाती है। भारत में, सारे विश्व में तुम अपने मन द्वारा ध्यान के समय मुझसे प्रार्थना करो कि जो-जो लोग आज धर्म व सत्य के मार्ग पर चलेंगे, मैं उनके मन में वेदों के मंत्रों का व ॐ का गुंजन अवश्य करूँगा।”

 

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