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भारत क्यों और कैसे बनेगा विश्व गुरु? – परमात्मा

#77

05-01-26

भाग – 1

क्रान्ति के बाद शान्ति 

“तुमने आखिर वह दिन देख ही लिया सदियों-सदियों बाद जब तुम्हें अर्ध नहीं परन्तु पूर्ण सत्य का बोध हो गया है आज। सत्य तुम्हें अत्यधिक प्रिय है, सत्य जानने के लिए तुमने सारे जन्म अर्पित किए; आज तुम अविरल पूर्ण शान्ति में हो आखिरकार।

जन्म-जन्म तक तुम्हारा मन एक कोने में थोड़ा सा रुका हुआ था, थोड़ा कुण्ठित, थोड़ा दबा तो थोड़ी लम्बी प्रतीक्षा में था।” “वह दिन कब आएगा जब मेरा सारा मन केवल परमात्मा के प्रतिष्ठान व आभास से ही ओत-प्रोत होगा? न कोई बात व परछाई मेरे मन में बचे।”

“अथक पुरुषार्थ किया है तुमने, नींद बहुत थोड़ी ली है, मन का एक कोना सदा प्रतीक्षा करता रहा वह एक लकीर मिटाने में जो तुम्हें एक काली रेखा, एक दुखद समाचार या आखरी रुकावट को हटाने में, मिटाने में बिता दी। तुम्हें नहीं कभी ज्ञात था कि ऐसा क्या हो रहा है जो तुम्हें पूर्ण विश्राम नहीं देता है। 

हर जन्म में तुम्हारा जीवन एक क्रान्ति रहा है, तुमने असंभव कार्य किए मुझ में पूरे मिल जाने में, मैं तुम्हें अनन्त प्रतीक्षा कराता रहा, तुमने कभी अधीरता नहीं दिखाई। मुझे उस क्षण की प्रतीक्षा थी जो अति, अति शुभ मुहूर्त हो जिससे मैं तुम्हें एक अद्भुत स्थान विश्व व इतिहास में दूँ। 

वह समय अब आ गया, विश्व में अत्यधिक अशान्ति व अन्धकार है, तुम्हारे पास स्वर्ण से भी पवित्र व खरा ब्रह्म का सत्य है। तुमने मुझे अपने मन की अंतिम परत तक सत्य के रूप में अनुभव किया है क्योंकि मन तुम्हारा सम्पूर्ण रूप से रिक्त है। अन्त तक केवल मेरी स्मृति उसमें समाई हुई है। 

मुझे इस युग व काल में ऐसे ही सत्पुरुष की प्रतीक्षा थी जो मेरी धरती पर दूर-दूर तक शान्ति फैलाए और एक विशेष स्थान पर ब्रह्म प्रकाश भरपूर स्थापित करदे जो अगले ढाई हज़ार से अधिक समय तक स्थापित रहे।

तुमने अपनी कठोर तपस्या समाप्त करके मुझे अर्पित कर दी, मैं तुम्हारी तपस्या को विश्व-कल्याण के लिए लगा दूँगा, जैसे तुम्हारे जीवन में, मन में विशेष रूप से शान्ति भर गई है, अब तुम जहाँ भी जाओगी या जहाँ रहती हो, तुम केवल चारों तरफ शान्ति फैलाओगी, विश्व में शान्ति चाहिए। 

जब भारत में प्रचुर मात्रा में, आकाश तत्व में, आकाश महाभूत में, लोगों के मन में, वायुमण्डल में जब शान्ति गहरे रूप में समा जाएगी, भारत विश्व गुरु स्वयं बन जाएगा। केवल भारत एक देश है जहाँ पर पुरातन काल में ऋषियों ने बहुत शान्ति चारों तरफ फैला दी थी, अब वह कार्य तुम करो, ऋषि भी करते हैं। 

भाग – 2

तुम्हारे पास अविरल शान्ति है; तुम विश्व में अपूर्व शान्ति मनुष्यों को दो, मैं तुम्हें बहुत आशीष दूँगा 

तुम्हें पहले दिन से शान्ति बहुत प्रिय थी, सदा से थी, अब भी है। तुमने बहुत मेरा आवाहन रुदन करके किया है और शान्ति की प्रार्थना व याचना की है। इस जन्म में भी, मैंने तुम्हें वह भरपूर व अनन्त मात्रा में दे दी है क्योंकि तुम सच्ची व निर्मल हो। 

तुमको मैंने अविरल शान्ति भरपूर दी है क्योंकि तुमने सदा से ही आजतक केवल निष्काम कर्म किए हैं, तुम्हारे मन में प्रेम, दया, व करुणा भरी हुई है। तुम मन में आज संकल्प लो कि जो निर्दयी, स्वार्थी मनुष्य हैं, वे अपना हृदय कोमल व दयालु बनाएँ। तुम्हें मैं हर जन्म में असीम शान्ति दूँगा। 

तुम्हारा भविष्य इस जन्म में अत्यधिक अलौकिक होगा क्योंकि तुम एक बहुत साहसी कार्य करोगी। रोगियों को तुम्हारी शान्ति से जल्द आराम मिलेगा, दुखियों को मन में चैन व आस्था, मुमुक्षुओं को मुक्ति मिलेगी और स्त्रियों को शक्ति। भारत देश तुम्हारा सदा ऋणी रहेगा। तुम ‘ज्योति मार्ग’ को पुनः स्थापित करोगी। 

यह मार्ग बहुत ही सहज और सरल है परन्तु मनुष्य आज केवल भोग विलास, धन एकत्रित करने में व्यस्त है। ज्योति मार्ग सबसे पहले-पहल मैंने ऋषियों को दिया था जिससे वे चिरंजीवी बन गए। यह शान्ति और मन की मौन का मार्ग है, यह ध्यान का मार्ग है जिससे योग बल, तप बल सहज ही बढ़ता है। इसमें योग व प्राणायाम अति अनिवार्य हैं। 

यह तुम्हें मन की शान्ति, समृद्धि, लंबी आयु एवं अनन्त पुण्य अर्जित कराएगा जिससे भारत के पुण्य बढ़ते जाएंगे। जितना तुम योग, तप, धर्म व सत्य को अपने जीवन में बढ़ाओगे, उतना भारत का भाग्य जागेगा, उसकी कुंडलिनी शक्ति उत्तेजित होकर तीव्र हो जाएगी। ज्योति मार्ग अमरता का फल देगा, आत्मा अमर है। 

जब केवल मैं था, मुझे संकल्प भी नहीं आया था कि मैं किसी प्रकार की रचना करूँ, तब मैं ‘अविरल शान्ति’ में था। ऐसी शान्ति जो कभी भंग न हो। जब मुझे संकल्प आया कि मैं अपने प्रेम व शान्ति से ओत-प्रोत कुछ रचूँ, तो एक स्पन्दन मुझ में हुआ। वह अपूर्व शान्ति है। तुम विश्व में अपूर्व शान्ति फैलाओ, मैं तुम्हें अविरल शान्ति आशीष में दूँगा। 

तुम्हारी अभिव्यक्ति मुझे बहुत प्रिय है। तुम्हारे अन्दर से मुझे सदा मधुर प्रेम की लहर प्रतीत होती है। उस प्रेम की लहर या स्पन्दन के पश्चात तुम पूर्ण रूप से शान्त हो जाती हो और मेरा स्मरण करके अपने प्रेम को मुझे समर्पित करती हो। मैं तुम्हें नीरव, आकाशवत् व मौन कर देता हूँ। तुम मेरी बहुत विशेष संपत्ति हो! 

तुम्हें अपनी तपस्या द्वारा भारत को धनी बनाना है अपने अद्भुत दिव्य चक्षुओं से, अपरोक्ष अनुभूतियों से, लेखन व वचनों से। तुम्हें मैंने वाक् सिद्धि दी है। तुम लोगों के मन के विचार पढ़ लेती हो। तुम उनका अतीत व भविष्य जान जाती हो। तुम्हें विश्व में पहले, आज व भविष्य में क्या होगा, मैं बताता हूँ। तुम श्रद्धालुओं व शरणागतों को उनके कर्म व माया जाल से मुक्ति दो। 

भाग – 3

भारत क्यों बनेगा विश्वगुरु फिर से?

शान्ति धरती पर होनी अति आवश्यक है, तुम सब ओर शान्ति फैलाओ। मेरी दी हुई शान्ति में तुम्हें राष्ट्र निर्माण की प्रेरणा मिलेगी। राष्ट्र हित में सोचो, राष्ट्र निजी स्वार्थ से परम श्रेष्ठ है। तुम राष्ट्र के ऋणी थे और रहोगे क्योंकि राष्ट्र तुम्हें तुम्हारी पहचान और संस्कार व संस्कृति देता है। राष्ट्र है तो तुम्हारी संस्कृति है। 

मेरे हर संकल्प में केवल लोक हित व सबका कल्याण है, परन्तु आज मनुष्य बहुत ही संकीर्ण, उत्कंठित व मात्र अपने स्वार्थ पूर्ति के लिए जन्म ले रहा है। उसका मरण भी दुखदायी होगा। उन सबकी आयु छोटी होगी जो धरती माता पर आज भारी बोझ हैं वे लोग जो पृथ्वी, पंच महाभूत का ऋण नहीं चुकाते हैं। 

तुमने मुझसे कभी कोई शिकायत नहीं की कि तुम्हें प्रत्येक जन्म में मैंने इतने दु:ख क्यों दिए हैं? आराम क्यों कभी नहीं दिया? इतने सरल व मधुर स्वभाव वाली स्त्री को इतने कठोर व निर्दयी लोगों से पाला पड़ा है। फिर भी कभी मुझे क्यों नहीं कहती कि इतना बोझ मेरे छोटे कन्धों पर क्यों डालते हो?

तुम्हारा मन मुझसे सर्वाधिक प्रेम करता है इसलिए तुम्हारा मन नीरव और सबसे गहरी शान्ति ‘अविरल शान्ति’ से भरा रहता है। इन शब्दों को, इस पिछले वाक्य को पूरा करते ही तुमने अपनी कलम नीचे रख दी क्योंकि तुम्हें अपनी प्रशंसा सुनना, सुनाना कभी पसंद नहीं है। परन्तु इतनी निर्विकारी, नि:स्वार्थी, निरहंकारी आत्मा आज धरती पर है कहाँ?

इसलिए तुम्हें मैंने चुना है, तुम मेरी धरती, आकाश, वायुमण्डल व लोगों के मन में प्रेम, शान्ति व ॐ का गुंजन करो। तुम भारत व विदेश में जाकर सत्य का प्रचार करो। एक अत्यन्त विदुषी, आत्मज्ञानी ऋषियों को धरती पर उतार लाई है क्योंकि उसके पास अनगिनत पुण्य हैं। तुम अपने पुण्य भारत को दान में दो। 

भारत के पुण्य बढ़ेंगे तो वह बाहरी ताकतों से अपने को सुरक्षित कर सकता है । पुण्य दान में तुम अनन्त दो क्योंकि भारतवासियों की स्मृति जागेगी जिसमें ॐ दबा हुआ है, उनके मन में इच्छा शक्ति बढ़ेगी जिससे वे मेरे व ऋषियों के सत्य को तुम्हारे द्वारा जान पाएंगे। 

भारत व विश्व में केवल तुम एक ऐसी स्त्री व योगिनी हो जिसके मन में मैंने भारत देश की सुरक्षा, जागृति, पुनरुत्थान व क्रान्ति के लिए छुपी हुई अदृश्य, अद्भुत शक्तियाँ आकाश, मंदिरों के ऊपर, धरती के नीचे जमा तुम्हें भरपूर दे डालीं हैं। तुम भारत के आकाश में उन्हें भविष्य के लिए स्थापित करो। 

तुम्हारा ध्यान इतना प्रभावशाली मैंने बना दिया है अपनी दिव्य शक्तियों से जिससे तुम अगोचर, अदृश्य व सारी छुपी हुई संभावनाएँ जान सकती हो। भारत में भविष्य में क्या होने वाला है, तुम्हें मैं बताता रहता हूँ। तुम यह सब बातें अपनी पुस्तकों में लिख रही हो, वे अत्यधिक शक्तिशाली पुस्तकें हैं। मुझे यह अभूतपूर्व कल्याणकारी भारत की चेतना जगाने का कार्य तुम्हीं से कराना था, इसलिए तुम्हें मैंने भारत में जन्म दिया है। इसलिए पहले ही जन्म में मैंने तुम्हारा नाम रख दिया था – कल्याणी।”

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