#47
ॐ
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“तुमसे अधिक से अधिक कार्य करवाने की प्रेरणा मुझे प्राचीन काल में ही मिली थी – अपने मन की शक्ति तुमने अपने कर्म में समेटी थी
जब भी तुमने अन्याय, अहित व दु:ख देखा पहले के कुछ जन्मों से ही, तुमने अपने मन को अन्दर मोड़ा और उसमें दुखों को समा लिया।
हृदय की टीस व वेदना को भुलाने के लिए तुमने अपने मन को कार्य में रत किया; शुरु से ही मन की शक्ति को बहिर्मुख न होने दिया, मन की शक्ति बढ़ी।
दया व ममता से भरा तुम्हारा आँचल मैंने पहले ही दिव्य चक्षु से देख लिया था – तुम से मैं नई पीढ़ी की आत्म जागृति कराऊंगा, सोच लिया था मैंने
विशेष मातृत्व भाव तुमने अन्दर जगाया क्योंकि संसार में माँ भी स्वार्थी होती है देख लिया था तुमने; वात्सल्य भाव नवजात व संतान को अवश्य मिलना चाहिये।
माँ का स्वार्थ बालक का भविष्य नष्ट करता है, छोटी आयु में तुम्हारी आत्मा ने अपनी माँ को परख लिया था – मैं ऐसा कभी नहीं करुँगी ठान लिया था तुमने।
तीक्ष्ण बुद्धि, हर कार्य में निपुण, मन में सबके लिये हित और प्रेम कदा-कदा ही देखने को मिलता है मनुष्य में – कलियुग में करोगी उद्धार निर्णय लिया था मैंने
तीक्ष्ण बुद्धि को बनाया प्रखर अपने सुविचार व सुआचरण से, सबसे सीखा केवल सीखा, कभी न दिया मन को सुख कि कहीं स्वार्थ न जाग जाये।
मन की तीव्र इच्छा को जगाया जिस में मन किसी से कोई इच्छा ही न करे, धीरे धीरे मन में तुम जगाती रही सारे लक्षण ईश्वर-योग के।
प्रत्येक जन्म में किए अत्यधिक दान व दया के काम, विरक्त होकर भूमि बाँटी, मंदिर बनाए, ब्राह्मणों की थी की भरपूर सेवा व भक्ति
तुमने सुख खोज लिया सबका कल्याण करने में, सबकी आत्म शान्ति में छुपा है रहस्य स्वयं का परम सुख, सदा, सबका कल्याण करूँ मुझसे मांग लिया था तुमने।
अभी भी अपने ज्ञान के सागर में से सबको खूब लुटा रही हो, मन तुम्हारा विशाल है कभी न कोई रेखा खींचती हो।
त्याग भावना गहरी मन में इतनी किसी भी काल में सब कुछ त्याग कर संन्यास ले लोगी, इसलिए मैंने तुम्हारे लिए विशेष परियोजना ज्योति मार्ग की पुनर्स्थापना की रखी थी
ऋषियों ने जो अद्भुत ईश्वर मार्ग का किया था पालन, वह ‘ज्योति मार्ग’ लुप्त हो चुका है साढ़े तीन लाख वर्ष पहले, सुख की वासना ने उसे खो दिया।
लोगों ने उसे त्यागा और सांसारिक इच्छाओं को स्वीकारा, वही धूल में पड़ा एक अनमोल रतन, तुमने है फ़िर चमकाया कलियुग में।
संत महात्माओं, ऋषि मुनियों की अथक सेवा की थी इसलिए तुमने मुझसे पाया अनूठा वरदान – भारत के पुरातन ऋषियों को संसार में पुनर्जीवित करो
ऋषि मुनियों का न केवल राज महल में आव भगत व सत्कार किया, उनकी तपस्या का मूल्य समझा और उन्हें पूर्ण रूप से मन में पूजा।
स्वार्थहीन व निश्चल मन से जो कर्म करता है, वह मुझे तुरंत हिरण्यगर्भ में पहुँचता है; मुझसे किसी का भी मन का भाव नहीं छुपा है।
तुमने शरीर, मन, वचन व कर्म से कभी न लगाई किसी को भी एक बार ठेस है, इसलिए इतने कोमल मन में मैं शीघ्र हुआ अवतरित, व साक्षात हूँ विद्यमान मैं
मेरा स्थान एक पवित्र मन है, तुमने अपने मन में सदा के लिए निवास स्थान मुझे दिया है, मैं यहाँ पर सदा के लिए वास करूँगा।
बदले में मैंने तुम्हें दिया है ऐसा नव जीवन जिसमें सर्वथा ज्ञान, भक्ति, प्रेम, त्याग, उपासना, सेवा, व करुणा का वास होगा – इसे अमर प्रेम कहते हैं!”


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