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13-07-2026, Monday । 11:13 AM
भाग – 1
ईश्वर केवल तपस्या द्वारा मिलते हैं; तपस्या दृढ़ संकल्प व निश्चय द्वारा होती है –
“संसार में ईश्वर प्राप्ति के सिवाय पूर्ण सुख व आनन्द कदापि नहीं मिल सकता है। परम आनन्द मन को प्राप्त होता है जब मन बाहरी भौतिक सुख को तुच्छ जानकार त्याग दे।
ऐसा त्याग सहज होता है न कि दिखावा या विवशता। सहज त्याग सुखदायी होता है। तपस्या करने में सुख नहीं मिलता, परन्तु ईश्वर द्वारा तपस्या का फल सन्तोष, शान्ति व आनन्द देता है।
संकल्प शक्ति मनुष्य के निश्चय को दृढ़ करने में सहायक होती है, इच्छा शक्ति जन्म देती है तपस्या करने की इच्छा को और क्रिया शक्ति दृढ़ निश्चय को साकार करने में सहायता करती है। ये शक्तियाँ नाभि में होतीं हैं।
मनुष्य की इच्छाएँ ईश्वर-प्राप्ति में बाधा डालतीं हैं। अहंकार आग में घी का काम करता है। काम वासनाएँ मनुष्य को अन्दर से पूर्ण रूप से सड़ा देतीं है –
इच्छाएँ, अहंकार व काम वासनाएँ मनुष्य को किसी भी जन्म में सुख व आनन्द नहीं देतीं हैं। वे मनुष्यों को बहुत अन्धकार में धकेल देतीं हैं जैसे बहुत गहरे कुएँ में किसी का गिरना।
किसी भी मनुष्य को कदाचित रत्ती मात्र भी ज्ञान नहीं होता है जब वह अपने ही आप से अकेले ही रात्री को बहुत घनिष्ठ अरण्य में, बीहड़ जंगल में टहलने निकल जाए।
उसे केवल संकट, मृत्यु या भटकन ही भटकन मिलने वाली है क्योंकि उसने अपनी इच्छा द्वारा यह चयन किया था। यह संसार भी एक बीहड़ जंगल है।
ईश्वर को अपने मन में प्राप्त करना मनुष्य की इच्छा से ही हो सकता है। परमात्मा भी वहीं प्रकट होते हैं जिस मनुष्य के मन में उन्हें पाने की, जानने की अति तीव्र इच्छा होती है –
प्रज्वलित मन में, तपस्या की अग्नि में, मानव के मन में तुरंत ही ईश्वर का आगमन हो जाता है बिन बुलाए। तपस्वियों के मन में अति स्वच्छता को देखकर वे स्वयं आते हैं।
मन के विषय भोग त्याग कर, करुणा, प्रेम, शान्ति व निर्मलता का दीप जलाकर तपस्वी जब ध्यान में लीन होता है तो ईश्वर उसके मन की शान्ति में आ जाते हैं।
ईश्वर से पुनः एक होने की तीव्र इच्छा से ही मनुष्य ईश्वर को अपनी ओर आकर्षित कर लेता है। जब उससे रहा ही नहीं जाता तो वह तपस्या की अग्नि में स्वयं को पूर्ण समर्पित करता है।
भाग – 2
तपस्या वे लोग करते हैं जिनका मन एकाग्र होता है, जो ईश्वर-प्रेम, शान्ति व जीवन में ठहराव का सुख चाहता हो –
जिसने अपने मन को शुरू से ही वश में कर लिया हो, उसके मन में शान्ति को और लाने की इच्छा होना स्वाभाविक है। ईश्वर का साक्षात्कार व प्रमाण शान्ति में मिलता है।
बाहरी दृश्य, शब्द, आकार एवं कोलाहल से जब मन भर जाता है तो मनुष्य का मन शान्ति की इच्छा करता है। इन्द्रियाँ विषयों को भोग-भोग कर थक जातीं हैं।
विश्राम करने के लिए आँखें मूँदना, चुप रहना, दृश्य-शब्द इत्यादि का त्याग करना एवं इच्छा व अहंकार का त्याग करना होता है। असली विश्राम मन से संसार हटाना होता है।
निर्लज्ज, कामी, भोगी, स्वार्थी एवं राक्षस प्रवृत्ति के लोग समाज के लिए अभिशाप हैं। इच्छा-पूर्ति के लिए वे समाज का न केवल शोषण करते हैं, अपितु वे अधर्म फैलाते हैं –
भोगी, कामी, स्वार्थी मनुष्य समाज के धार्मिक, सज्जन, योगियों, तपस्वियों एवं सच्चे देश भक्तों के विपरीत ही चलते हैं। वे समाज को बनाते नहीं पर बिगाड़ते हैं, दूषित करते हैं।
ईश्वर ऐसे लोगों को कभी भी सुख-चैन, शान्ति, लम्बी आयु और सुविचार नहीं देते हैं क्योंकि ईश्वरीय आनन्द, शान्ति और दिव्यता उन्हें मिलती है जो त्याग भावना रखते हैं।
ईश्वर का सान्निध्य इन लोगों को तब तक नहीं प्राप्त होता है जब तक वे प्रायश्चित न करें। उन्हें प्रायश्चित के रूप में उनको पुण्य अर्जित करने के लिए भविष्य में, समाज सेवा ही मिलती है।
ईश्वर से प्रार्थना करो कि तुम्हारा जन्म दिव्य, कर्म दिव्य हों। उनसे इच्छा का वरदान माँगो जिससे तुम्हारे मन में निर्मलता, स्थिरता एवं प्रज्वलता आ जाए। मन को ईश्वर के प्रेम में ओत-प्रोत करो –
प्रत्येक जन्म तपस्या है। अपने जीवन में धैर्य, शान्ति, स्थिरता, सन्तोष, दया और निर्मोहिता का आवाहन करो। ऐसा करने से शुभ इच्छा जन्म लेगी। तुम धीरे-धीरे निष्पाप बन जाओगे।
तपस्या शुभ इच्छा, शुभ विचार, शुभ कर्म और शुभ चिन्तन कराती है। धीरे-धीरे मनुष्य मन का मोह, लोभ, कामुकता त्याग देता है। त्याग करने से मनुष्य निष्पाप बनता है। निष्पाप के मन में गहरी शान्ति होती है।
मैं सदियों-सदियों से प्रतीक्षा करता हूँ तब जाकर एक तपस्वी की तपस्या सफल होती है। संसार में सबसे कठिन कार्य आत्म-साक्षात्कार है। मैंने आज तुम्हें एक वरदान दिया है – जाओ, मेरी अति प्रिय बेटी, संसार को अपनी कठोर से कठोर तपस्या बताओ – तुम्हारा कोई बाल बाँका करके तो दिखाएय़!”
ॐ


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