#31
ॐ
सदियों से मनुष्य ज्ञान की पिपासा हेतु ढूँढ़ता फिरता वन वन, जंगल व गुफाओं में।
परन्तु पी न सका वो ‘अमृत’ जब तक उसने न खोजा मन के भीतर।
इतिहास पुराना हम सबका, ढूँढा है सब जगह, जन्म जन्म, प्रत्येक युग व हर जीवन।
खोज हमारी कभी प्रगाढ़, कभी मन्दी, कभी धूमिल तो कभी हम सो गए गहरी नींद में।
इसी तरह चलता रहा यह काल चक्र, समय आया और गया, कभी हमने इसे सँजोया ?
परन्तु एक जीवन विशेष बना लिया जाए तो जीवन और समय हमारा होता सार्थक।
मन में आधार शिला दॄढ़ बन जाए तो हर जन्म, हर जीवन धीरे धीरे बन जाता है पूर्ण सफल।
आधार शिला बने ईश्वरीय प्रेम, करुणा, दया, धैर्य, त्याग, बलिदान व निःस्वार्थता की।
मन में प्रेम के कुसुम ईश्वर को करें अर्पण, मन निर्मल करें अपने स्वच्छ विचारों से।
माला फेरे उस स्मृति व स्पन्दन की, जिसमें हरि नाम क्षण क्षण, पल पल पिरोया हो।
इस विश्व में लीलाएँ अनेक होती रहेंगी, दुख सुख आएंगे और अपने समय पर चले जाएँगे।
परन्तु मन का साक्षी, ज्ञाता, जाननहार सदा मूक व मौन, कभी न छोड़ता हमारा हाथ।
मैंने उसे छुआ है, प्रतीत किया है उस अपार शान्ति को, अनेकों बार अनुभव किया है।
वह शान्ति ईश्वर ही तो है, हर दृश्य, घटना, दुख, सुख का साक्षी, भीतर ही तो है।
आधार शिला की एक एक ईंट बनती है, जप, तप, ध्यान, भजन, सेवा, प्रेम व शुभ कर्मों की ढ़ेरी से।
कभी न कभी हमारा मंदिर बन ही जाएगा, हमने यदि प्रयत्न किया पूर्ण आस्था, दारुण याचना व सच्ची निष्ठा से।
![]()
(२१-१२-२३ के दिन राम मंदिर, अयोध्या की आधारशिला से प्रेरणा पाकर मन के भाव जागृत हुए)


Leave a Reply
Want to join the discussion?Feel free to contribute!