#37
ॐ
जब जीवन की धारा तेज़ प्रवाह में हो जान लो ईश्वर ने तुम्हें एक अवसर दिया है अपनी शक्तियों का प्रदर्शन करने के लिए। (१)
वे शक्तियाँ अन्तःकरण के बीच में सिमटकर अविकसित रखी हुई होतीं हैं। तुम्हारे जन्म जन्मान्तर के पुण्य उदय होने के प्रतीक्षा में होते हैं। (२)
जैसे ही जीवात्मा मन में ध्यान व शुभ कर्मों की तप-अग्नि से प्रज्ज्वलित दीप शिखा को गुरु कृपा द्वारा जगाता है, उसका जीवन तेज़ गति को प्राप्त होता है। (३)
उस तेज़ गति में होते हैं निजी व जन कल्याण के उद्धार के नक़्शे व अनेक योजनाएँ। वे योजनाएँ ईश्वर इच्छा से जल्द साकार होतीं हैं। (४)
ईश्वर सदियों से प्रतीक्षा में होते हैं, आगामी युग के आने की आशंकाएँ आँकते हैं, आगे का युग कैसा होगा, समीक्षा करते हैं। (५)
हमारे संकल्प संसार में उस नक़्शे को एक आकार देतें हैं, जैसा मन में हम विचार व संकल्प करते हैं, हमारी सृष्टि का निर्माण वैसा हो जाता है। (६)
यदि वर्त्तमान काल में हमारा जीवन धीमा, रुका या दुखदाई हुआ पड़ा है, हमारे पापों का फल भोगना हमें ही होता है। (७)
परन्तु यदि कष्टदायी काल जीवन का ईश्वर से क्षमा याचना व प्रायश्चित में किया जाए, तो हमारी चेतना जागती है और हम शान्ति पाते हैं। (८)
पुण्यों का पहाड़ यदि तुम पर टूट पड़ा हो किसी बिरला पुरुष पर, ऐसे योगी पर ईश्वर विशेष कृपा-छाया अपनी डाल देते हैं। (९)
ऐसे सत्पुरुषों का जीवन सरल करके, योग शक्तियाँ प्रदान करके, उनके दुश्मनों का नाश करके ईश्वर उन्हें समाज में विशिष्ट स्थान देते हैं। (१०)
उन सत्पुरुषों को दुष्टों को झेलने की अद्भुत शक्तियाँ दी जाती हैं, विवेक प्रदान होता है और अभय दान पाकर वे जन कल्याण करते हैं। (११)
अनेकों का मार्गदर्शन होता है, ग्रन्थों को पुनः लिखा, समझाया जाता है, ऋषि मुनियों का उनसे गुण गान कराया जाता है। (१२)
सत्पुरुषों की अद्वितीय विचार शक्ति, क्रिया शक्ति व इच्छा शक्ति से सतयुग की सीढियाँ बनवाई जातीं हैं। (१३)
अधर्म व धर्म के अन्तर को प्रत्यक्ष उदाहरण देकर शास्त्रों को उनके द्वारा पुनः लिखवाया जाता है। उनसे समाज का कल्याण होता है। (१४)
ईश्वर क्या है? योग शक्ति क्या है? धर्म क्या है? जीवन कैसे जिया जाए उनके आचरण व लेखों द्वारा दर्शाया जाता है। (१५)
ऐसे सत्पुरुषों की जीवन धारा सदा प्रभु प्रसन्नता के लिए ही बहती रहती है। वे जहाँ भी जाते हैं उनसे केवल निष्कामी कर्म होते हैं। (१६)
जो ऐसे ईश्वर प्रेमियों से अपना मन लगाता है, धीरे धीरे उसका मन ईश्वर प्रेम व भक्ति से ओतप्रोत हो जाता है। (१७)
उनके जीवन की मंदी प्रवाह गति, शनैः शनैः, मध्यम से तीव्र हो जाती है। उनके और सतगुरु, ऋषियों के पुण्य एक होकर हृदयों में दीप प्रज्वलित होते हैं। (१८)


Very Nice–Could you provide english translated text also for a larger audience please–Best regards–Rajesh
Dear Rajesh ji, I just read your comment. Thank you for your suggestion. I already have a lot of work pending on my table. Translation work demands accuracy. Whenever I can do this task, I will do it in future. Thank you.