#44
ॐ
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तुम्हारा जीवन एक संग्राम, परिणाम केवल उत्थान
पूर्ण जीवन में नहीं किया तुमने आराम क्योंकि आरंभ से था वह एक अथक संग्राम।
प्रारंभ से भी प्रारब्ध अत्यधिक जटिल व कठिन, परन्तु तुमने मुझसे कभी न एक शिकायत की।
मैंने तुमसे कहा था कि तुम सोना नहीं, पर पारस हो, अभी भट्टी में झुलस रही हो, पर पारस तुम हो।
जब तुम अंगार में जल रही थी, तुमने मुझसे कहा था – मुझे पता है कि आप सब देख रहे हो।
पूर्वजों का आशीष, गुरुओं की अपार कृपा
मैंने तुम्हें कहा था कि पारस तुम हो ही क्योंकि अपने पुण्यों के बहुत बड़े पर्वत पर आज तुम बैठी हो।
पुण्य तुम्हारे संग्रहित इतने कि मनुष्यों में मैंने कभी नहीं देखे; परन्तु संचित कर्म इतने जटिल मेरे हृदय में आँसु बहें।
वर्ष पर वर्ष बीतते गए तुम्हारी वेदना बढ़ती गई, लेकिन तुमने मुझे कभी नहीं कहा कि मुझसे न होगा यह सहन।
समय ने करवट ली है, तुम्हारा जीवन अब शिखर पर आखिरकर आ पहुँचा, जो कोई न कर सका, तुमने कर दिखाया है।
आत्मा की उन्नति की शिखर पर, सदा के लिए विश्राम-गृह तुमने बनाया
अथक परिश्रम द्वारा तुमने अपना एक गौरवशाली नया जीवन बनाया है, आत्म साक्षात्कार पाया है।
कोई दिन ऐसा नहीं है जिसमें तुमने समय गवाँया है, न ही कभी विश्राम किया केवल परिश्रम किया है।
अब मैंने तुम्हें कहा है कि तुम सदा के लिए उस सुखदाई शान्ति में जीयो जिसके लिए तुम इतनी थकी हो।
थकान तुम्हारी मैंने आज सारी नष्ट की है, तुम शरीर, मन और आत्मा से निरन्तर आत्म शान्ति में जीयो।
मैंने तुम्हें पूर्ण आशीष दिया, सदा चिरंजीवी भव, परम शान्ति को प्राप्त करो
तुमने मुझसे आज तक कुछ माँगा नहीं, इच्छा तुम्हारी केवल एक रही कि आपकी कृपा मुझ पर सदा बनी रहे।
तुम्हारे मन की विशुद्धता देख कर अनेकों अवसरों पर मेरा हृदय द्रवित व हर्षित हुआ है, मैंने तुम्हें कई आशीष दिए हैं।
तुम सदा निर्भय, संकल्प रहित, अति शान्त व सौम्य रहोगी, मैंने तुम्हें पूर्ण आशीष दिया चिरंजीवी भव।
मैंने तुम्हें कहा था कि संसार में ऐसी कोई वस्तु नहीं जिसे प्राप्त न कर सको माँगो; तुमने कहा था कि मुझे केवल आप चाहिये!


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