#45
ॐ
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अग्नि परीक्षा समाप्त, एक नए युग का आवाहन
“अग्नि न केवल जलाती है, वह एक नया जीवन भी देती है। राख के बहुत नीचे पड़े हैं तुम्हारे अति उत्तम शुभ संकल्प।
अति पवित्र मन में मैंने कई बार देखा है उनको; कोमल बीज देखकर मैं हुआ था अति विस्मित।
तुमने राख बनकर भी मुझसे कहा – “मेरी इच्छा है आपकी पृथ्वी सदा रहे हरी भरी, विश्व में सदा शांति बनी रहे।”
अग्नि में समाना व प्रज्वलित होना, अग्नि तुम्हारे विशुद्ध मन का साक्षी
“अग्नि में तुम अनेक बार समाई हो, परीक्षा कई बार उत्तीर्ण की है, परन्तु प्रत्येक बार पहले से अधिक उज्जवल बनी हो।
विनाश में भी तुमने सदा मुझे पुकारा और माँगा सृजन का वरदान – “विश्व की संतान सदा आपकी कृपा से सुरक्षित रहे,” ऐसा तुमने चाहा था।
सृजन के संकल्प निकले थे तुम्हारी मातृत्व की भूमि से -“यदि मेरी संतान न बच पायी तो क्या, विश्व में सभी बच्चे जियें।”
अग्नि इच्छा शक्ति नाभि में अपार उत्थान की शक्ति, तुम अग्निपुत्री हो
“इच्छा शक्ति का स्थान नाभि है, उसमे सृजन व उत्थान शक्ति विद्यमान है, शुभ संकल्पों से तुमने उसे पूर्ण रूप से जगा लिया।
निःस्वार्थ भाव से तुमने युद्ध के बाद विश्व शांति व विश्व कल्याण की इच्छा की।
इसलिए मैंने तुम्हे आशीष विशेष दिया था – “जब भी शुभ संकल्प करोगी, पूर्ण अवश्य होगा।”
इच्छा शक्ति से मन जीता, इन्द्रियों को सदा अंकुश में रखा, आत्मा हुई जागृत
“जागृत पूर्ण हुई तुम्हारी नाभि, इच्छा शक्ति का भरपूर उपयोग किया, एक-एक पग रखकर कठिन पर्वतों को पार किया।
इन्द्रियों को सदा सदुपयोग व योग में लगाया, योग शक्ति प्रतिदिन विकसित करी और मन व इन्द्रियों पर राज किया।
मन तुम्हारा कभी न हुआ बेकाबू, सदा तुमने अपने ध्येय को सर्वोपरि रखा, प्रचंड अग्नि जली मन में, आत्मा हुई जागृत।”
एक बार फिर उसी इच्छा शक्ति का समर्थन लेकर विश्व में करो जन जागृति
“तुम एक विशेष स्त्री हो जिसे कभी न लगा भय। हर आपत्ति में तुमने कहा स्वयं को – “इसमें कोई ईश्वर का रहस्य है।”
अति कष्ट के समय तुमने कहा मुझसे – “आखिर ऐसा क्या कर रहे हो, जो मुझे नहीं आ रहा समझ? कृपा कर मुझे समझा दो।”
तुम जैसी महान आत्मा का मैं करोड़ों वर्षों तक आने की प्रतीक्षा करता हूँ। ऐसी एक प्रज्वलित आत्मा बहुत है विश्व में जनजागृति करने के लिए!”


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