#58
ॐ
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परमात्मा –
“यदि तुम यह जीवन ईश्वर को समर्पित कर दो, मन तुम्हारा कभी भी विचलित नहीं होगा। जीवन का सच्चा सुख मन में ध्यान द्वारा उतारी गई शान्ति है। जिन मन में सदा किसी न किसी वस्तु, संसारी इच्छा या इन्द्रिय सुख प्राप्त करने की चेष्टा रहती है, वे अपने जीवन में कभी शान्ति नहीं प्राप्त कर पाते हैं।
भौतिक सुख किसी भी मनुष्य को स्थायी खुशी दे ही नहीं सकता। कारण यह है कि प्रसन्नता-वश मनुष्य संसार में प्रवेश तो कर लेता है, परन्तु उसे माया का ज्ञान नहीं होता। ईश्वर का ज्ञान तो कोई विरले को ही हो पाता है।
जब मन की गहराई में स्थिर शान्ति का निवास होता है तब मनुष्य किसी भी वस्तु, व्यक्ति या भोग का विचार नहीं कर सकता। मैंने मनुष्य के मन की रचना ऐसी ही की है।
मन के तीन हिस्से होते हैं। ऊपरी, मध्यम व निचला। ऊपरी मन में विश्व में होने वाले दृश्य, ध्वनि, गतिविधियाँ या शोर संचालित होता है। इन में स्मृति नहीं होती, केवल स्पन्दन होता है। दूसरी सतह जो मध्यम है, उसमें पिछले 108 जन्मों की स्मृतियाँ होती हैं। यदि यहाँ से कोई कर्म करता है तो उसमें काफी ताकत होती है क्योंकि इसमें थोड़ा ब्रह्म प्रकाश भी होता है। 108 जन्मों की स्मृतियाँ तुम्हारे नए कर्मों को प्रेरित करतीं हैं, इन्हे ही संस्कार कहते हैं। ध्यान करने से नकारात्मक स्मृतियाँ मिटाईं जा सकती हैं। इसलिए मनुष्य को ध्यान की उपासना करनी चाहिए। ध्यान मनुष्य का सबसे सर्वोत्तम कर्म है। ध्यान मन में परमात्मा की स्मृति को जगाता है। अधिकतर लोगों में यह स्मृति लुप्त हो चुकी होती है।
जो मन का निचला हिस्सा है उसमें मनुष्य के पहले जन्म से लेकर 107 जन्म तक, एक सौ सातवे जन्म तक की स्मृतियाँ जमा होतीं हैं।
अधिकतर मनुष्य 300 से 500 या 600 जन्मों तक बिना किसी उत्तम व श्रेयस लक्ष्य के जन्मते व मरते हैं। मन के निचले हिस्से में सबसे अधिक शक्ति व ब्रह्म प्रकाश होता है। परन्तु दुनिया में सबसे ज्यादा लोग केवल मन के ऊपरी हिस्से की शक्ति पर चलते हैं। वे ध्यान की साधना नहीं करते।
मन के मध्यम हिस्से को चित्त भी कहते हैं। वहीं पर वासनाएँ जमा होतीं हैं। वासनाएँ मनुष्य को विवश करती हैं। परन्तु जो सत्पुरुष ध्यान का बहुत अभ्यास कर लेते हैं, उनके इस मन में पिछले जन्मों की जगत भोगने की स्मृतियाँ धुँधलाकार नष्ट हो जाती हैं। उस स्थान में ईश्वर की, ब्रह्म प्रकाश की किरणें स्थान ले लेती हैं। उनके नए कर्म ईश्वर की प्रेरणा से होते हैं । यह गति व स्थिति केवल उसे प्राप्त हो सकती है जो ईश्वर को अपना मन समर्पित करता है और मन के वश होकर अज्ञान के कर्म नहीं करता। साधक, योगी व ज्ञानी को अपने को इस विषय में सर्वाधिक सावधान होना चाहिए। नहीं तो उनका पतन होता है, वे अपने मार्ग से भटक कर पुण्य नहीं, बहुत पाप जमा कर लेते हैं। उन्हें भविष्य में बहुत दुःख भोगने पड़ते हैं।
मन के आखरी सबसे निचले हिस्से तक तो कोई करोड़ों-करोड़ो में से एक मनुष्य पहुँच पाता है। यह इसलिए कि इसमें अत्यधिक त्याग, तप, मौन, शान्ति व परिश्रम लगता है। अनेक परिक्षाएँ देनी होती हैं।
परमात्मा को इस अवस्था के योगी सर्वाधिक प्रिय हैं चाहे वे बहुत कम ही क्यों न हों। कारण – उनके मन के हर एक कोने में पूर्ण रूप से केवल ब्रह्म प्रकाश होता है और शांति अथाह होती है। वे कभी भी सत्य का त्याग नहीं करते। उनसे केवल पुण्य ही होते हैं, वे पुण्यात्मा, चिरंजीवी होते हैं। उनका जीवन व मरणोपरान्त भी केवल ईश्वर की प्रसन्नता व सेवा करना ही होता है। संसार उनके लिए परमात्मा की छवि ही है। उनको सबके लिए प्रेम ही होता है।
तुम इसी श्रेणी की हो। तुमने महारत प्राप्त किया – केवल 108 जन्मों में पूरे मन में ब्रह्म प्रकाश भर लिया है। तुम्हारा पूरा जन्म मुझ परमात्मा को समर्पित है। तुमसे मैं अत्यधिक महान कार्य कराऊंँगा जिसमें लोगों की सोई आत्मा तुम्हारे दर्शन से ही जाग जाएगी। उसके बाद पुरुषार्थ उनका होगा।
जो भी सच्चे मन से मुझे समर्पित करता है उसका भाग्य बदल जाता है। मेरा आशिर्वाद पहले-पहल, मैं कठिनाइयाँ व कष्ट या अपमान के रूप में देता हूँ। मैं अच्छी तरह परखना चाहता हूँ कि वास्तव में उसे मैं ही चाहिए हूँ या यह एक-दो दिन की कोई सनक है? जब सारे संसार की वस्तुएँ मैं देकर भी देखता हूँ कि इसको तो केवल मैं ही चाहिए हूँ, तब मैं उसके मन में खूब सारा प्रकाश, शान्ति व धैर्ये भर देता हूँ। संसार में कोई भी दुःख या तूफ़ान आए, ये योगी कभी भी मन के कहने में नहीं आते। वे तो सिर्फ मेरी तरफ ही देखते रहते हैं। उनके हर श्वास में मेरी ही स्मृति रहती है। तब मैं उनको अपना सच्चा स्वरूप दिखाता हूँ, खूब वरदान देता हूँ और अनेक शक्तियाँ देता हूँ जिससे वे समाज की सेवा करते हैं। उनका पूरा जीवन ही ईश्वर-समर्पण होता है।


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