#59
ॐ
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परमात्मा –
“मन एक अद्भुत शक्ति है। इसमें अपार संभावनाएँ छुपी पड़ीं होतीं हैं। मन की सबसे बड़ी शक्ति है इच्छा-शक्ति।
आदिकाल में ही जब मैंने मनुष्य की पहले-पहल रचना की थी, मैंने उसे इच्छा-शक्ति का नाभि में स्पंदन द्वारा प्रवेश किया।
इच्छा-शक्ति मैंने सबसे पहले दी क्योंकि मैं चाहता हूँ कि तुम मेरे पास आओ परंतु जब तुम चाहो, वरना मेरी माया से खेलो।
जब तक मनुष्य मन में दृढ़ इच्छा को नहीं जगाता अपनी सहमति से, तब तक उसके अंदर कभी भी मुझे जानने की इच्छा नहीं होगी।
पौराणिक काल में मैंने सबसे पहले धरती के पहले पुरुष को, जिसका नाम बाद में ‘मनु’ पड़ा, उसमें इच्छा-शक्ति दान में दी थी।
मैं चाहता था कि वह जल्द से जल्द प्रकृति और पुरुष को अलग कर, पुरुष-पुरुषोत्तम को स्वीकार करे जिससे आने वाली पीढ़ी स्वर्ग धरती पर बनाएँ।
मनु का मन बहुत शांत और पवित्र था, उसने प्रकृति से थोड़ी भी छेड़-छाड़ नहीं की; इसके बनिस्बत उसने प्रकृति से बहुत प्रेम किया व उसे पूजा।
उसने कहा कितनी मनोहर है यह प्रकृति जो हम सबको जीवन व आनंद देती है। मैं सदा इसकी उपासना व सेवा करूंँगा – यही मेरी पूजा होगी।
उसका मन मुझ प्रकृति में प्रतिबिंबित हो आनंद की लहरों में डूब जाता था चाहे वह झरना, फूल या पक्षी, बादल या वर्षा की बूँदे ही क्यों न हो।
मैंने अनेकों बार उसे मेरी छवि उसके मन में दिखाई जिसके कारण उसके आगे की तेईस पीढ़ियाँ विश्व में प्रकृति के संरक्षण में संलग्न थीं।
वहीं से शुरू हुआ एक नया दौर जब मनुष्यों के मन में प्रकृति में भगवान को ढूंँढने की इच्छा जागी। उन्होंने प्रकृति को पूजा इसलिए उनके मन में उन्माद ने जन्म नहीं लिया।
बहुत वर्ष बीतने पर आगे की पीढ़ी ने धीरे-धीरे अहंकार को जन्म दिया अपने मन में क्योंकि उनका मन प्रकृति के प्रेम से टूट चुका था। अब उनके मन में माया को भोगने की इच्छा आ गई।
धीरे-धीरे उन्हें प्रकृति या ईश्वर के बनिस्पत भोगने वाली वस्तुओं से अधिक प्रेम हो गया। संतोष व शांति के स्थान पर अब भोग मन में आ गया।
वह इच्छा-शक्ति जो मैंने पौराणिक काल में ‘मनु’ के मन में संचारित की थी, वह शक्ति धीरे-धीरे विकृत से विस्मृति के रूप में परिवर्तित हो गई।
मनुष्य परमात्मा की स्मृति को भुलाता चला गया और उसके स्थान पर संसार के लोग, उनकी बनाई संपत्ति और भोग विलास प्रवृत्ति की इच्छाओं को बढ़ाता गया।
मनुष्य की ढलान मन में तब रची जाती है जब वह अंतर्मुख से बहिर्मुख बन जाता है। मन को सदा अंतर्मुख रखने में ही भलाई है।
जैसे ही मन तुम्हारा बहिर्मुख होता है, उसे अपनी इच्छा-शक्ति से फिर से अंदर ले आओ, मेरी दी हुई इच्छा-शक्ति को प्रयोग में लाओ।
जब तक तुम अपनी इच्छा से कोई कर्म नहीं करोगे, वह कभी भी नहीं होने वाला, मेरी सहायता तुम्हें इच्छा जगाने के उपरांत ही मिलेगी।
इसी इच्छा-शक्ति द्वारा अब तुम अपनी सोई हुई आत्मा को जगाओ अपने मन को अंतर्मुख करके, इच्छा-शक्ति तुम्हें वह बल देगी जिससे असंभव कार्य होंगे।
मनुष्य ही असंभव कार्य कर सकता है क्योंकि इच्छा-शक्ति में मेरा एक अंश प्रकाश के रूप में छुपा है। उस शक्ति को तुम जगाओ।
वह शक्ति तुम्हारी नाभी में बंद पड़ी है, जन्म जन्मांतर से रूठी पड़ी है, वह एक ऐसी शक्ति है जिसके द्वारा तुम मुझ तक शीघ्र आ सकते हो, वह पहली सीढ़ी है।
नाभी में ॐ का उच्चारण करो, वह जागेगी, ध्यान ईश्वर का लगाओ। ईश्वर प्रकाश पुंज है। ॐ प्रकाशपुंज से भरा है। जीवन भर ॐ की उपासना करो।
जो मैं चाहता हूँ तुम करो, मेरी इच्छा तुम्हारी नाभी में सूर्य प्रकाश की भांति प्रवेश करेगी, वे किरणें तुम्हारे मस्तिष्क में ऊर्ध्व दिशा में चढ़ेंगी।
सहस्रार मेरा भवन है, निकेतन है, त्रिनेत्र निवास है, वहीं मैं तुम्हें अपना दर्शन दूँगा जो त्रिनेत्र पर चमकेगा। वहाँ से तुम प्रेरणा पाकर वह करो जो मैं चाहता हूँ, जो कभी न जो सोचा था वह तुम अब अवश्य करो।”


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