#61
ॐ
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परमात्मा –
“मैं कभी भी किसी के लिए नहीं कुछ कहता, न ही मैं उनसे कोई शिकायत करता हूँ, मैं तो केवल दृष्टा बन कर सबको देखता रहता हूँ। मैं साक्षी रूप हूँ।
मेरी धरती मैंने अत्यंत प्रेम से धीरे-धीरे गढ़ी, साल दो करोड़ से भी अधिक लगे। मैंने तो उसमें अविनाशी तत्व पाँच डालें, वे प्रकृति रचते हैं। मैं सबका संचालक हूँ।
पंच महाभूत में आकाश सबसे निराला है, मैंने उसे गुण ऐसा दिया जिस में वह महाभूत अलग है। मनुष्य के मन में विचार आकाश में रुक जाते हैं। मैं आकाशवत हूँ।
महा आकाश में परम शांति है, तुम्हारा मन भी महाआकाश में समा सकता है। तुम अपने विचारों को सदा के लिए पवित्र रखो। तुम्हारे पवित्र मन के संकल्प मैं पूर्ण करूँगा।
अधिकांश मनुष्य मन के विचार संकीर्ण व कुंठित रखते हैं। सबके विचार आकाश में अनन्त काल तक रहते हैं। आकाश ऊर्जा व संकल्पों की ध्वनि,तुम्हारी, अपने अंदर समा लेता है।
समय आने पर वे संकल्पों की ऊर्जा विग्रह होकर संसार में प्रकट हो जाती हैं। जो तुमने अपने मन, कर्म व वचन के बीज बोए थे, वैसी तुम्हारी सृष्टि बन जाती है।
आकाश कभी पक्षपात नहीं करता। वो तो ग्रहण करने की असीम शक्ति रखता है। यह विश्व एक दर्पण है, यह ब्रह्मांड एक कलश है। यहाँ गूँज हम सबकी मन के संकल्पों की हो रही है।
तुमने बहुत पहले हृदय में तीव्र वेदना के साथ मुझे पुकारा था और याचना की थी कि तुम्हें विश्व के सर्वोत्तम ऋषि के पास विद्या प्राप्त करने जाना है। तुम्हें मैंने आध्यात्मिक, भौतिक दोनों विद्याएँ दीं।
तुमने मेरे लिए मन से विरक्त होकर संसार छोड़ा, कभी नहीं माँग की धन, दौलत, आराम, सुख या यश पाने की। मैंने तुम्हें अपना स्वरूप खुलकर दिखाया है जैसे सूर्य या पूर्णिमा कार्तिक मास की।
तुमने मुझसे कहा मुझे आपको पाकर कभी भी संसार का नहीं होना है। मैंने तुम्हें इतना काम दे डाला कि तुम्हें हाथ में एक पल भी खाली नहीं मिलता है। तुम केवल मेरे लिए ही जी रही हो।
तुम्हारे मन में अटूट इच्छा थी मानव सेवा करने की। मैंने तुम्हें न केवल यह, परंतु आगे के सारे जीवनों में समाज सेवा करने की शक्ति, यथायोग्य धन व सारे साधन दिए हैं।
तुम चाहती हो तुम्हारे अंदर जो मैंने अमर ज्योति जगाई है वह कभी भी बुझे न। इसलिए मैंने तुम्हें अनेक पुस्तकें लिखने का काम दिया है। इतनी किताबें ईश्वर पर किसी ने नहीं लिखीं।
आज तुम जान लो मैं साक्षी हूँ, मौन हूँ, सदा निर्विकारी हूँ, मुझमें कभी भी बदलाव नहीं आता। मैंने सबको मन सहित संकल्प करने की शक्ति दी है। यह ब्रह्मांड हमारे संकल्पों से गूँज रहा है।
तुम्हारे मन में संकल्प उठने का कारण मैं जानता हूँ। तुम मन में अंदर क्या चाहते व सोचते हो, मैं जानता हूँ। मैं तो तुम्हें तुम्हारे मन में उठते संकल्पों द्वारा पहचानता हूँ।
जो जैसा कर्म करता है, उसके मन में वैसे ही संकल्प उठते हैं। जो जैसा संकल्प मन में रखता है, वैसा नया जन्म पाता है। आकाश में सबके मन के विचार व संकल्प अंकित है।
जब भी कोई संकल्प मन में पैदा करता है, मैं केवल उसका साक्षी हूँ। तुम जैसा मन में सोचोगे, मैं वैसा तुम्हें फल दूँगा। मैं क्या करूँ, जब मूढ़ मनुष्य मुझे नहीं, परंतु मुझसे मिट्टी के खिलौने माँगता है?”


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