#66
ॐ
(4 of 4)
परमात्मा –
“तुमको आज मैंने ऐसी तीन बातें बताई है जिससे तुम्हारा स्वयं से परिचय एक बार फिर हुआ है, यह तुम्हारा अहोभाग्य है।
मैंने तुम्हें कई दिनों से देखा है कि तुम निरन्तर प्रयास कर रही हो कि तुम मेरे इतने सारे दिए गए कार्य कब और किस समय पर करोगी?
मुझे तुम्हारी यह बात बहुत अच्छी लगती है क्योंकि तुम कभी भी अथक प्रयास नहीं छोड़ती, तुम मेरा दिया हुआ काम कभी भी नहीं भूलती।
परन्तु अब समय आ गया है कि तुम्हें खुद को एक बार पूरा मोड़ना होगा, फिर से प्रयत्न करना होगा एक नई आदत बनाने के लिए।
तुम्हें सुबह से रात तक केवल काम ही करना होगा आजीवन भर, इसमें कोई भी संदेह नहीं, तुम्हारा जन्म ही अथक पुरुषार्थ मात्र हुआ है।
ऐसा सौभाग्य उन बड़भागियों को मिलता है जिसने पिछले अनेक जन्मों में अपने आत्म जागृति के लिए अविश्वसनीय प्रयास किया है।
तुम उसे उच्चतम श्रेणी की आत्माओं में से हो जिसने कभी माया में रस ढूंढने के लिए एक बार भी इच्छा मन में नहीं लाई है।
इसलिए मैं आज तुम से विनती करता कह रहा हूँ कि तुम अब से कभी-कभी यूँ भी कर लिया करो जिससे तुम सदा हरी-भरी रहो।
प्रातः काल आँख खुलने पर मुझे सबसे पहले अपनी मधुर मुस्कान से स्मरण करो, कभी भी उठते ही कौन सा पहला काम करूँ, कभी मत सोचो।
रात्रि में सोने से पहले गिनती मत करो कि आज मैंने कितने कार्य पूरे किए और कितने छूट गए, तुम केवल मुझे तुम्हारे साथ शान्ति के समुन्दर में सोने दो।
जब लोग तुमसे अटपटे प्रश्न करें तुम अचम्भित मत हुआ करो, वे तो अज्ञान में डूबे हैं, तुम मुझे उन्हें उत्तर देने दो।
जब कभी तुम मन में सोचो कि भविष्य में कैसी-कैसी नए परियोजनाएँ आएँगी, मुझे क्या, कैसे करना है, वे सब मैं कर लूँगा।
तुम्हें आज तक किसी ने नहीं कहा, “क्यों इतना सोचती हो, लाओ यह काम तुम्हारा मैं कर दूंँगा; तुम अपने सारे काम मुझे दे दो।”
तुम केवल मुझे अपना प्रेम दो, अपना मन दो, मैं तुम्हारी तरह प्रेम का बहुत भूखा हूंँ, तुम्हारी तरह बिना कुछ बोले सब समझ लेता हूंँ।
तुमने कभी किसी से नहीं कहा मुझे इस चीज की जरूरत है, अब मुझे कृपा कर तुम्हारी सारी जरूरतों को झट पूरा करने दो।
तुम्हारे स्वाभिमान व आत्म-सम्मान के आगे आज मैं झुक गया, तुम किसी से भी कुछ भी लेना कभी भी नहीं चाहती हो।
इतना आत्म सम्मान व स्वाभिमान विश्व में आज किसी में भी नहीं है, इसलिए अब मुझे दया कर तुम्हारी और प्रशंसा करने दो।
विश्व में मैं तुम्हारी जय जयकार कराना चाहता हूँ, तुम्हारे द्वारा मैं खुद को प्रकट करना चाहता हूँ, कृपा कर इसमें तुम संकोच न करो।
तुम्हारे मन में मैं इतनी शान्ति भरना चाहता हूँ जिससे तुम्हें दुनिया का कोई भी दुःख का आभास भी न हो, मुझे अपने सारे दुःख दे दो।
तुम मेरा एक अंश हो, मेरा ही प्रतिबिंब हो तुमने अपने मन में मुझे पूरा का पूरा समा लिया है, मुझे यह अधिकार दो मैं यह घोषणा कर दूँ।
जब तुम मेरे प्रति पूरी समर्पित हो, तुमने अपने लिए कुछ रखा ही नहीं है तो कभी-कभी यूँ भी किया करो – अब उद्घोषणा विश्व में करो कि तुम मेरी हो।”


Leave a Reply
Want to join the discussion?Feel free to contribute!