#70
ॐ
“जो कभी किसी ने न किया हो, वो तुमने मुझे कर दिखलाया।
मेरी इच्छा थी, एक स्त्री मेरे सृष्टि में आत्म जागृति का कार्य करे, परन्तु सोचता था मैं यह किस प्रकार हो सकता है? कार्य अति कठिन है।
इसमें न केवल शरीर की शक्तियाँ काम आएँगी परन्तु मानसिक बल व इच्छा शक्ति कठिन से कठिन कार्य करने के लिए अति आवश्यक है।
सोचता था मैं अनेकों बार – संकल्प तो मैंने ले लिया, किंतु होगा यह कैसे ?
क्योंकि स्त्रियों का मन होता अति कोमल व फूल जैसा नरम है।
तुम्हारा हृदय फूल जैसा नरम नहीं, परन्तु प्रातः काल की ओस से भी ज्यादा कोमल, नरम व शीतल है।
कल रात्रि मैंने तुम्हें अपने दिव्य चक्षु से देखा, एक महर्षि की जीवनी लिखते- लिखते तुम्हारे चक्षुओं में ओस जैसे अश्रु बहे, तुमसे रहा न गया।
तुमने अपने मन में इतने अश्रु बहाए और कहा “क्षमा करें भगवन, इतना समय बीता, मैं आपके द्वार पर अनेक बार आई, परन्तु आपने अपना परिचय ही नहीं दिया।
मुझे क्या पता था आपकी आत्मकथा इतनी संवेदनशील होगी, इतने पुरातन समय में भी आपने इतना कठोर परिश्रम व त्याग किया।
मैं न जानती थी अब तक कि मुझसे भी अपार अधिक परिश्रम आपने किया, मेरा तो जीवन सरल व बहुत सहज है। मैं तो आपके चरणों पर चलूँगी।
ईश्वर ने जो मुझे कार्य दिया, वह तो मुझे बहुत सरल लग रहा है क्योंकि आप जैसा चिरंजीव मेरे समक्ष एक अद्भुत स्तम्भ की तरह आज खड़ा है।
मेरी आँखें चुँधियाती हैं, मैं देख नहीं पाती हूँ, मैं कैसे जानूं कि आप कौन हैं?
परन्तु आप मुझे बहुत बार अपने पूर्व आश्रम में बुलाते रहे, मैं जाती रही, प्रतीक्षा करती रही।
आखिरकार वह दिन आया, जब अकस्मात आपने मुझे अपने मन के किवाड़ खोल दिखाया।
इतना त्याग! इतना वात्सल्य! इतनी करुणा और इतना प्रेम मैंने अब तक एक ऋषि में नहीं देखा।
आप मुझे अपने पूर्व स्थान दक्षिण भारत में, अति-अति सूक्ष्म मन द्वारा, मेरे रक्षा सूत्र द्वारा ले गए।
मैंने देखा आपका गृह एक झोंपड़ा था, थोड़ा सा खाना और पीने के लिए कुछ रखा था, सामान कुछ नहीं था।
और मैंने देखा आप प्रातः काल से रात्रि तक अपने गुरुकुल में बालकों को शिक्षा दे रहे हो। उनका जीवन आपके हाथ में था।
आपने उनका जीवन अपने हाथ में लिया और अपना जीवन पूर्णतया से त्याग दिया।
किसी को नहीं पता चला कि आपके मन में सबके लिए कितनी दया व करुणा है। आपको अपने कार्य से कितनी प्रीत है।
आपका जीवन 103 वर्ष तक रहा।
आपने संसार से जाने के बाद भी कुछ वर्षों तक, अपने विशेष छात्र को निर्देश दिया कि मेरा जो कार्य है, मेरी जो पांडुलिपियाँ हैं, वे कदाचित इधर-उधर खो न जाएँ, बुरे लोग इसका अनुचित लाभ न उठायें।
ईश्वर और संसार के प्रति इतनी कर्तव्यनिष्ठा मैंने आज तक नहीं सुनी। मेरा मन द्रवित है। मेरा जीवन सफल है।
मैं हर कार्य सफलता के साथ कर लूँगी। मैं सोचा करती थी – समय मेरे हाथ में नहीं, आयु मेरी बढ़ती जा रही, संसार अत्यधिक कोलाहल में है।
आज के समय में शान्ति कहाँ ?
वन, वनस्पति, पशु, पक्षी, ठंडी हवा और लोगों के कोमल हृदय कहाँ लुप्त हो गए?
इतने शान्तिप्रद आपके जीवन, ऋषियों के त्याग व कर्म इतने उज्ज्वल, कि मन ऐसा सोचता है कि मैं इस शोर में क्या कर रही हूँ?
मैं इतने मायावी लोगों में क्यों जी रही हूँ? इन लोगों को हुआ क्या है?
परन्तु आज मेरा स्वयं का संकल्प है जो ईश्वर के साथ गंगा-यमुना की तरह मिलकर एक जल हो जाता है।
मेरा शरीर, मन और आत्मा, तीनों का संगम है। आज मैंने प्रयागराज में महाकुंभ के जल से घर बैठे स्नान किया है।
मेरे अंदर ईश्वर ने इच्छा शक्ति, संकल्प शक्ति, क्रिया शक्ति तीनों अपार भरीं हैं, मैं इससे क्यों न अपना कार्य सिद्ध करूँ? मेरे अंदर क्या कमी है?
रही समय की कमी होने की, उसका भी आपने उत्तर दे दिया – “बार बार अपने मन को, अपनी दृष्टि को, अपनी चेतना को भ्रूमध्य में लेकर आ जाओ।
अपनी श्वास को स्थिर करो। रेचक और पूरक को एक नाप का कर दो। बार बार मन को मौन में निवास करने भेज दो।
तुम तो संसार में आज हो, संसार तो मन में होता है। पर तुम्हारा मन शान्ति-निवास में रहे।”
मैंने लोगों को, उनके मन को, आज से पूर्ण रूप से त्याग दिया है।
वे मेरे मन में एक क्षण भी नहीं प्रवेश कर सकते। वे मेरी आज्ञा के बिना, मेरे लिए कुछ नहीं सोच सकते।
मैं उन्हें कभी भी मेरे मन व गृह में आने नहीं दूँगी।
उनकी चेतना इतनी निम्न है कि उनको जागने में अनेकों-अनेकों वर्ष लग जाएँ तो भी आश्वासन नहीं है कि वे कभी अपने मन की इच्छाओं को त्यागना चाहते हैं।
जब तक मनुष्य अपने मन को अपनी इच्छा द्वारा आदेश नहीं देता, उसे आज्ञा नहीं देता, अपने अंदर शुभ इच्छा नहीं जगाता – वे कभी भी नहीं जागते, वे कभी भी नहीं मानते।
आज मेरे लिए विशेष दिन है।
मैंने संकल्प लिया – जो ईश्वर ने एक स्त्री के लिए, करोड़ों से भी अधिक वर्षों पहले संकल्प लिया था कि एक समय में विश्व में ऐसी कोई काश स्त्री हो जो आत्म ज्ञान की सर्वोपरि आत्मकथा हो।
प्रातः काल आज मेरा संकल्प ईश्वर के संकल्प में जा मिला है। मेरा संकल्प आज ईश्वर से मिलकर गंगा नहीं, गंगा- सागर बना है।
मेरा अस्तित्व कुछ नहीं, मेरी इच्छा कुछ नहीं। मैं तो गंगा भी नहीं। मैं तो आज गंगा-सागर बनी।”


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