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Jyoti Marg | ज्योति मार्ग
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सूर्य का अस्त किसने देखा है?

#64

ॐ

(2 of 4)

परमात्मा – 

“आज तुमने यह कर दिखलाया जो तुमने न कभी चाहा ।
और न ही करने वाली थी परन्तु आज अनहोनी हो गई।

तुम्हारा मन पूर्णतः डूबा था अपनी अथाह शान्ति में परन्तु,
मैंने तुम्हें आदेश दे दिया कि तुम्हें अब सब को बोध कराना है।

कई लोग तुम्हारे समक्ष थे जिन्होंने अपने अनेक जीवन यूँ ही गवाए।
वे आज पहली बार अपने समक्ष एक परम ज्ञानी व विदुषी को सुन रहे थे।

उनका मन व हृदय इतना सिकुड़ चुका था संसार के थपेड़े खा खाकर।
कि उनके अन्दर कोई विशेष शक्ति नहीं थी जिससे वे तुम्हें समझ सकें।

फिर भी तुमने अपनी पूरी ताकत लगा दी उनके सोए मन को जगाने में।
तुम्हें लग रहा था कि और मैं क्या करूँ जिससे वे झट से नींद से जाग जाएँ?

मैं वहाँ उपस्थित था, देख रहा था कि तुम कितना प्रयत्न कर रही हो।
जिस प्रयोजन से आई थी वह प्रयोजन सफल हुआ कि नहीं।

जब जब तुमने अपनी याचिका आकाश में मन के विचारों से डाली।
तब तब मैं तुम्हें प्राणों की ऊर्जा से ओतप्रोत करता जा रहा था।

आज तुम्हें लग रहा है कि जैसे तुमने अपने हाथों से पहाड़ उठाया है।
उन सबके मन कितने भारी थे, वह तुम्हें आज अनुभव में आया है।

यह गति मनुष्य की हो जाती है जब वह बहुत देर करता है मन को अन्दर मोड़ने में।
मन उनका मुड़ने की बहुत बड़ी कीमत माँगता है वर्ना वह ऊपर उठ नहीं सकता।

मैं तुम्हें सन्न होकर चुपचाप देख रहा था कि क्या तुम यह कार्य करने को इंकार करोगी?
परन्तु मैंने देखा कि जिस व्यक्ति का हृदय पारदर्शी था तुमने उनको अपनी पूर्ण शक्ति दी।

जैसे ही यह हुआ वहाँ की प्राण शक्ति वायुमंडल में घनिष्ठ होकर तुम्हारे अंदर प्रवेश कर गई।
तुम्हें आराम आया, राहत मिली और तुमने कुछ क्षणों बाद खुद को फिर से सशक्त पाया। 

तुम्हारे मन में शान्ति, प्राण शक्ति व ऊर्जा फिर से पूर्ण रूप से चल पड़ी।
ऐसा होने पर लोगों को नई ऊर्जा का स्रोत मिला और वे चिंतन करने लगे। 

मैंने जब यह चलचित्र देखा, मैंने तुम्हें झट आराम दिया अपनी ऊर्जा देकर।
तुमने अपनी नाभि में एक सिरहन महसूस की और तुम अपने को फिर से खड़ा कर सकी। 

सारे ऋषिगण अत्यधिक प्रसन्न हुए; तुमने पहले भी कभी नहीं हार मानी थी भविष्य में नहीं ऐसा होगा।
तुमने आज तक मेरी एक भी बात नहीं टाली है; मुझे पहले से ही ज्ञात था कि तुम कमाल कर दिखलाओगी। 

यह तो सिर्फ शुरुआत है आगे-आगे देखो कितने करिश्मे होते हैं।
लोगों को तुम अपनी दिव्य शक्तियाँ अदृश्य रूप में दिखाओगी। 

यह तभी होता है जब मेरा कोई अत्यधिक प्यारा बालक मुझे सारा का सारा मन देता है और मुझसे जुड़ता है।
उसका मन 100% मुझमें समाया होता है, प्रत्येक पल वह केवल चमत्कार देखता है और चमत्कार कर दिखलाता है। 

तुम्हारे समक्ष विभिन्न प्रकार के लोग आएँगे। तुम भयभीत न होना, तुम उन्हें केवल अपनी समझ देना।
वे तुम्हारे उच्च कोटि का ब्रह्म ज्ञान सुनकर अचंभे में पड़ जाएँगे क्योंकि इसमें कोई भी मिलावट नहीं है।
तुम उनको आशीष देना जिससे वे अपने नए मार्ग पर सफलता पाएँ
और वे तुम्हें एक महान गुरु व योद्धा देख पाएँ। 

उनकी इच्छा अब बस इतनी है कि तुम उन्हें सत्य का मार्ग दिखाकर
उनके जीवन को आलोकित करो। 

जिस काम को मैं ठान लेता हूँ वह अवश्य होकर ही रहता है।
ऐसी ही लगन तुम्हारी है, लोग इसके कारण तुम्हें नतमस्तक होंगे। 

देश-विदेश में दूर-दूर जाओ, चारों तरफ सत्य का प्रकाश फैलाओ।
पूर्ण रूप से आज सत्य केवल तुम्हारे पास ही है……..” 

 

 

April 24, 2025/0 Comments/by Jyoti Marg/
https://jyotimarg.blog/wp-content/uploads/2021/09/Logo_300x300.png 0 0 Jyoti Marg https://jyotimarg.blog/wp-content/uploads/2021/09/Logo_300x300.png Jyoti Marg2025-04-24 12:56:422025-04-25 18:48:28सूर्य का अस्त किसने देखा है?
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सूर्य के परे क्या है?सूर्य के उस पार क्या है? मुझे वहाँ जाना है। 

#63

ॐ

सूर्य के परे क्या है?सूर्य के उस पार क्या है? मुझे वहाँ जाना है। 

सूर्य के परे मैं हूँ – मैं पूरे विश्व में व्याप्त हूँ…

(1 of 4)

 

परमात्मा – “सूर्य के परे मैं हूँ, मैं पूरे विश्व में व्याप्त हूँ”

प्रात: काल की झीनी- झीनी सूर्य की किरणें पेड़ों के बीच से होती हुईं जब मेरे चेहरे पर पड़ रही थीं तो मेरा मन अकस्मात् ईश्वर की स्मृति में लीन जा हुआ। एक नई चेतना की लहर शरीर के प्रत्येक अणु में जा पहुँची। ऊर्जा का तेज सूर्य प्रकाश के द्वारा मुझे नव चेतना द्वारा नव जीवन देता जा रहा था। एक मधुर संगीत मन में गूँजा और मेरे मन में विचार आया – सूर्य के उस पार क्या है?

मैंने सूर्य व उस में विद्यमान प्राणों की शक्ति को नमन किया। योग की साधना सूर्य नमस्कार को याद किया और सूर्य नमस्कार की शक्ति को भी नमन किया। सूर्य नमस्कार करने से सूर्य की किरणें प्रात: काल में अपार प्राण शक्ति प्रदान करती हैं। ऐसा मैंने समझ कर सूर्य देव व उनकी अपार शक्ति के भंडार को नतमस्तक होकर धन्यवाद दिया। 

मैंने उन किरणों को अपनी नाभि में प्रवेश करते महसूस किया। तत्काल मैंने महामृत्युंजय मंत्र बोलना शुरू किया। मन ही मन में और अमरता प्रदान करने वाले इस मंत्र को अपनी नाभि में संग्रहित किया। यूँ लग रहा था जैसे मेरे शरीर व मन में अथक कार्य करने की शक्ति परमात्मा ने दे दी आज प्रातः काल बिना माँगे।

घर में सुबह फिर से मन में कुछ देर फिर एक बात मन में सुनाई दी- “सूर्य के परे क्या है? मुझे उस तरफ जाना है।” अगले पल अपने जीवन का सारांश समझ में आ गया और मुझे परमात्मा के न्याय की शैली का बोध हो गया। बाहरी परिस्थितियाँ कितनी भी निम्न प्रकार की हों, चाहे पूरे जीवन में मुझे कोई विरला ही मिला हो जो अपने विवेक द्वारा जीवन के प्रति सकारात्मक व निश्चयात्मक दृष्टिकोण रखता हो। 

परंतु करोड़ों में से कोई एक होता है जिसका जीवन कार्य अपने व दूसरों के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण रखता है। जीवन की बाहरी परिस्थितियाँ चाहे कितने भी निम्न क्यों न हो, अपना दृष्टिकोण सकारात्मक व रचनात्मक होने के कारण उनका मन सदा ऊर्जा से भरा होता है। प्रारब्ध-वश बाहर की गुलामी होने के पश्चात भी वे आनंद में रहते हैं। 

मन से स्वतंत्र होते हैं और उनकी आत्म-उन्नति निरंतर होती रहती है। परमात्मा हमें ऐसी परिस्थितियों में जान कर डालते हैं जिससे हम निरंतर अपने मन की शक्ति को और पुष्ट करें। यदि मनुष्य प्रारब्ध-वश परतंत्र है, परन्तु उसके मन में प्रेम, निष्ठा, श्रद्धा, करुणा व लगन और पुरुषार्थ हो, तो वो मन के अंदर ही सुख पा लेता है। दृश्य नहीं, दृष्टिकोण सही होना चाहिए। दृष्टिकोण सदा अच्छा है तो मन स्वतंत्र होकर चेतना की बहुत ऊँची पराकाष्ठा पा लेता है।

दोपहर को 2:35 मिनट पर मैंने जब आँखे मूंदी, तो मेरा मन बहुत धीरे-धीरे मेरी चेतना को धरती से बहुत दूर आकाश के परे और सूर्य के भी परे ले जा रहा था। अतिश्रेष्ठ प्रकार की शांति अनुभव करने के बाद मुझे आभास हो चुका था कि परमात्मा मुझे ठीक मौका पाते ही मुझसे कुछ कहने को उत्सुक हैं। मैंने खुद को पूर्ण रूप से अपने मन को उनके स्वागत के लिए आतुर कर दिया। उन्होंने मुझे कभी न भूलने वाली बात कह दी-

“तुम्हारा मन अब सूर्य के प्रचंड शक्ति जैसा तेजोमय है। तुम मेरी शक्ति से बनी हो। तुमने आज मेरे आदेश पर सूर्य के परे जाने की कोशिश की। मैं तुम्हें ले जाना चाहता हूँ। सूर्य के परे क्या है? तुम्हारे तेजस्वी मन के परे क्या है? पूरे ब्रह्मांड में मैं व्याप्त हूँ। इस सारे ब्रह्मांड में मेरी शक्तियाँ हैं। मेरी शक्ति का एक अंश तुम में है।

मैंने तुम्हें शक्ति दी है मुझसे सम्पर्क बनाने के लिए। मेरी इच्छा व संकल्प का स्त्रोत हिरण्यगर्भ है। यह नाड़ियाँ देखो, ये तुम्हारी हैं। इनमें नीला, हल्का नीला रंग है। अब तक तुमने इनमें सोने या चाँदी के रंग जैसा कुछ देखा था। ये अति, अति, अति विशेष नाड़ियाँ सीधा मुझसे संपर्क करने के लिए होतीं हैं। जो मैं अपना संकल्प विश्व कल्याण के लिए आकाश में प्रसारण करता हूँ, तुम उसे मन में ग्रहण कर लोगी। वह मेरी ही शक्ति है।

मैं अब अपनी तीव्र इच्छा से चाहता हूँ कि तुम सबके समक्ष जाकर मेरे बारे में और ऋषियों के जीवन कैसे थे, अवश्य बात करो। तुम लोगों के जीवन आलोकित करो। अपना जीवन सबको खोलकर बताओ, जिससे उन्हें तुम जैसे बनने की तीव्र प्रेरणा मिले। उन्हें मेरी पुनरुत्थान की शक्तियाँ तुम्हारे द्वारा मिलेंगी। वे तुमसे स्वयं मिलना चाहेंगे, तुम्हें केवल अपना शरीर, मन, बुद्धि व आत्मा बहुत स्वस्थ रखना होगा। तुम्हारा काम बहुत अधिक सुंदर है, परन्तु तुम्हारी ऊर्जा बहुत लगेगी।

तुम्हारा मन अत्यधिक कोमल है क्योंकि उसमें प्रेम व करुणा का अंश बहुत है। मन अत्यधिक कोमल व संवेदनशील होने के कारण सूक्ष्म रूप में गहरे घाव लग जाते हैं जिसका तुम्हें ज्ञान नहीं है। तुम्हें शारदा पीठ, मार्तण्ड सूर्य मंदिर, नालंदा व ज्ञानवापी मंदिर की दशा देखकर मन में गहराई में खरोंच लगी थी जिसे नींद में 9 बार तुम्हारे घाव मैंने भरें हैं।

धरती पर नरसंहार बहुत हुआ है। मैं जानता हूँ ये सब मेरी आज्ञा देने पर ही हुआ है, इसमें अब तुम्हारे मन में उन खण्डहरों को देखकर घाव नहीं लगने चाहिए। इतना नरसंहार नहीं होता तो ये कभी न पहले और कभी न दुबारा धरती पर मेरी दिव्य शक्तियाँ विश्व में उतारी जाती तुम में, तुम्हारी पुस्तकों में। तुम्हारी पुस्तकों में मेरी अद्भुत शक्तियाँ व्याप्त हैं।

ये विश्व को आलोकित करने वाली शक्तियाँ केवल 10 हज़ार वर्ष तक धरती पर रहेंगी। वे तुम्हारे मन में व तुम्हारी पुस्तकों में मैंने प्रवेश पहले ही कर दीं हैं। प्रत्यक्ष रूप में अब तुम उनका साक्षात्कार कर रही हो। आगे भी ये शक्तियाँ धीरे-धीरे लोगों में उनके कल्याण हेतु संचारित होंगी। 

तुम्हारे चिंतन, मनन, ध्यान, सोच व विचार, या फिर गहरी नींद में जो समाधि अवस्था है, रात्रि के 11:23 से प्रात: काल 3:22 मिनट तक ऊर्जा के रूप में, स्पंदन के रूप में आकाश में व्याप्त हो रहीं है। अब से यह 18 अप्रैल, 2025 सुबह 10:25 से 312% और ज़्यादा विश्व में फैलेंगी मेरी इच्छा अनुसार। 

यह आशीर्वाद देने मैं तुम्हारे पास 9 अप्रैल को सुबह 9:32 मिनट पर प्रत्यक्ष रूप से प्रकट होकर संदेश दे चुका हूँ कि अब तुम मन से तैयार हो जाओ बहुत नए लोगों से मिलने के लिए। तुम्हारे पैर अब बहुत दूर दूर तक जाने चाहिए। बहुत उत्साह व उमंग से काफ़ी लोग तुमसे मिलने व बात करने के लिए आतुर हैं। 

तुम्हें उनके लिए अब अपना बहुमूल्य समय निकालना ही होगा। तुम्हारे सारे काम समय पर हो जाएँगे निश्चय रूप से। अगले कुछ वर्षों में 12 लोग ऐसे तुम्हें अपना मन समर्पित करेंगे जिससे तुम्हें भविष्य में ज्योति मार्ग को फैलाने में सफलता मिलेगी। उनमें  से 3 को तो तुम 18th अप्रैल ‘25 को मिलने वाली हो।

 वे निरंतर, आजीवन भर तुम्हारी सेवा में निष्ठ होंगे। वे तुम्हारे अथक पुरुषार्थ व घनिष्ट तप को पहचान कर मन से नतमस्तक हैं। तुम उनको बहुत आशीर्वाद देना। वे तुम्हारे अस्वाभिमानी चेले हैं।

विदेश में भी तुम्हारा गुणगान होगा। कुछ वर्ष बाद ये पुस्तकें वहाँ भी छपने वाली हैं। अनेक भारतीय तुम्हें पूरा सहयोग व अपना सामर्थ्य देंगे। वे वहाँ का सारा भार खुद उठाएँगे। तुम्हें केवल अपना स्वास्थ्य, समय व ज्ञान को संभालना है। शेष कार्य सब मेरा है। 

प्रत्येक दिन तुम मुझसे अपार शुभाशीष पाओगी क्योंकि तुम्हारे मन में मैं अणु मात्र भी कोई इच्छा या अहंकार नहीं देखता हूँ। तुम्हारे हर श्वास में मैं अपना प्रकाश डाल रहा हूँ । तुम्हारे मुख से मैं बोलता हूँ और तुम्हारे हर विचार व कर्म के पीछे मैं तुम्हे प्रेरित कर रहा हूँ। तुम्हारे दैदीप्यमान, प्रचंड व शक्तिशाली सूर्य-रूप मन के ठीक पीछे मैं विद्यमान हूँ। मैं तुम्हारे मन, शरीर व आत्मा में पूर्ण रूप से व्याप्त हूँ।”

तुम्हारा,
परमपिता परमेश्वर
14 अप्रैल 2025

 प्रातः काल 3:22

April 18, 2025/0 Comments/by Jyoti Marg/
https://jyotimarg.blog/wp-content/uploads/2021/09/Logo_300x300.png 0 0 Jyoti Marg https://jyotimarg.blog/wp-content/uploads/2021/09/Logo_300x300.png Jyoti Marg2025-04-18 05:08:342025-08-25 15:33:03सूर्य के परे क्या है?सूर्य के उस पार क्या है? मुझे वहाँ जाना है। 
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इतना आलोकित, आनन्दित जीवन भला कौन तुम से छीन सकता है?

परमात्मा

#62

ॐ
13-01-25 | सोमवार | मकर संक्रान्ति
पूर्ण महाकुंभ की प्रथम तिथि

“महाप्राण द्वारा नाभि से यह आशीष, शब्दों द्वारा तुम्हें दे रहा हूँ, इतने कष्ट से तुमने अपना जीवन आनन्दित व आलोकित किया है,भला तुमसे कौन छीन सकता है?

हिरण्यगर्भ से प्रेम पूर्वक मैं तुम्हें तुम्हारी नाभि में महाप्राण द्वारा ये स्वर्णिम वचन कह रहा हूँ, कोई नहीं जानता तुम्हारे मन की अवस्था मेरे सिवा,तुम्हारे भीतर मैं पूर्ण रूप से बसा हूँ।

अन्धकार मन में लोगों का आदिकाल से भरा हुआ, कभी नहीं चाहते थोड़ा भी नींद से जागना, वे तुम्हें क्या समझेंगे? आदर तो दूर, वे तो तुम्हें अपने रास्ते का रोड़ा समझते हैं। मन की आँखें उनकी बंद हैं।

माया में लिप्त, वासनाओं से ग्रस्त, सदा इच्छाओं में डूबे वे क्या जाने तुम्हारे मन की अवस्था? तुम तो दिन में अनेकों बार ब्रह्म में लीन होती हो।

तुम्हारे मन की झनकार मैं सुनता हूँ, सबके लिए वेदना व करुणा मैं तुम्हारे मन में पढ़ कर महसूस करता हूँ; सभी के लिए क्षमा देने के लिए तत्पर रहती हो, परन्तु वे लोग तो धन व माया के लोभी हैं।

उनके विकार इतने हैं मन में कि वे अपनी काल कोठरी में रहें वह ही उनके लिए सार्थक होगा, उन्हें तो प्रतिदिन मिथ्या संसार को पकड़कर जीना है।

तुम नहीं चाहती कोई भी तुम्हारी उच्चतम आध्यात्मिक अवस्था को जाने या उसमें कोलाहल करे परन्तु मन सबका उनके विचारों से बहुत कोलाहल करता है, उन्हें शान्ति प्राप्त नहीं है।

तुम्हें मैंने अथक पुरुषार्थ वाले अनगिनत कार्य दिए हैं, तुम उन्हें पूर्ण मन की शान्ति से करती जाओ, तुम्हारी अभंग शान्ति स्थिर रहेगी – इस आशीर्वाद के साथ ही मैंने तुम्हें आदेश दिया है।

जब मन की चरम सीमा पर कोई मेरा बालक पहुँच जाता है, यह कार्य मेरा है किस प्रकार दुष्ट, दुर्जन या कष्ट देने वालों को उनसे दूर किया जाए; तुम्हारा काम है जन कल्याण, उनको मैं देखूँगा।

मन की आखिरी सतह पर जब ओम् का गुंजन हो, मस्तिष्क में ब्रह्म कमल पूर्ण रूप से खिला रहता हो, हृदय प्रेम, दया, करुणा व सहानुभूति से भीगा रहता हो, उनकी मैं सदा दिन-रात रक्षा करता हूँ।

शरीर की कोटि कोटि नसों में, एक एक अंश में जब तुमने मेरा प्रकाश भर ही लिया है, कैसे मैं तुम्हें नहीं दिन-रात अपनी आँखों के समक्ष रखुँ?तुम सदा मेरी हो और सदा मेरी छत्रछाया में रहोगी।

मेरे मुख से निकले वचन, मेरी नाभि से निकला महाप्राण जब तुम्हारी नाभि को छूते हैं, तब एक अद्भुत घटना होती है, तुम्हारा हाथ कलम पकड़ कर लिखता है; कलम यूँ सहज चलती है जैसे छोटा बालक पानी पीता है।

विश्व में कोई ऐसी शक्ति नहीं है जो तुम्हारा काम रोके या अन्त करे, जो जो कार्य मैं तुम्हें प्रतिदिन दूँ वो अवश्य होगा ही, मेरा संकल्प व आदेश अटल है, जो मुझे तुमसे कार्य कराना है होगा ही, सारी प्रकृति तुम्हारे आगे झुकेगी।

विश्व में कोई वस्तु, मनुष्य, शक्ति या तत्त्व ऐसा नहीं है जो तुम्हारा आनन्द व आलोक को चुरा ले या उन्हें भंग कर दे, जो मैंने तुम्हें दिया है वो तुम्हारे अति शुभ संकल्प, कर्म व अथक पुरुषार्थ का परिणाम है।

धीरे धीरे करके सारी विरोधी शक्तियाँ पराजित हो जाएँगी तुम्हारे बिना कुछ किए, ढ़हती ईमारत को क्यों कोई हाथ लगाना चाहेगा? उनके दुष्कर्म व झूठ उन्हें अपने साथ बाढ़ की भाँति ले डूबेगा। सबको उनके भाग्य पर छोड़ दो।

मनुष्य जब भोगी, आलसी, क्रोधी, लालची व धोखेबाज़ होता है, उसे पता ही नहीं चलता उसके घर में कब चोर पीछे से घुस आता है। दुर्भाग्य वह चोर है जो बिना बताए पीछे के दरवाज़े से अन्धेरे में आता है।

जिन जिन लोगों ने तुम्हारे साथ धोखाधड़ी या षड्यन्त्र किए हैं, उनके भविष्य मैंने काली स्याही से लिख दिए हैं। समय आने पर उनकी धरती पैरों तले खिसक जाएगी, उन्हें कोई सहायता करने नहीं आने दूँगा मैं।

तुम अपना आत्मबल, मनोबल, इच्छा शक्ति, संकल्प शक्ति और बढ़ाओ, इनकी कोई सीमा नहीं होती। तुम जितना बढ़ाओगी, मैं उन्हें आठ से सोलह गुना और वृद्धि कर दूँगा। तुम केवल अपने लक्ष्य पर चलती रहो।

तुम्हारा आनन्द, आलोक न कभी कम होगा या कोई चुरा सकेगा, तुमने इतने शुभ संकल्प और शुभ-शुभ कर्म किए हैं। वे सब मिलाकर मैं तुम्हें तुम्हारे कार्य के लिये प्रसिद्धि, धन, यश व अनेक शक्तियाँ दूँगा।

जब कोई तुम्हारा नुकसान करे तुम मेरा स्मरण करो, ये मेरे वचन को मन में फिर याद करो, तुरंत तुम्हारी नाभि में एक नए जीवन का संचार होगा, तुम्हारे चारों ओर प्रकाश पुंज होगा – तुम्हारा आलोक व आनंद सदा के लिए सुरक्षित है।”
ॐ

January 15, 2025/0 Comments/by Jyoti Marg/
https://jyotimarg.blog/wp-content/uploads/2021/09/Logo_300x300.png 0 0 Jyoti Marg https://jyotimarg.blog/wp-content/uploads/2021/09/Logo_300x300.png Jyoti Marg2025-01-15 20:42:432025-02-05 14:34:45इतना आलोकित, आनन्दित जीवन भला कौन तुम से छीन सकता है?
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आओ मैं तुम्हें कुछ बताऊँ, मैं तुम्हें अपने संकल्प के बारे में बताऊँ।

 

#61

ॐ

7 of 7

परमात्मा – 

“मैं कभी भी किसी के लिए नहीं कुछ कहता, न ही मैं उनसे कोई शिकायत करता हूँ, मैं तो केवल दृष्टा बन कर सबको देखता रहता हूँ। मैं साक्षी रूप हूँ।

मेरी धरती मैंने अत्यंत प्रेम से धीरे-धीरे गढ़ी, साल दो करोड़ से भी अधिक लगे। मैंने तो उसमें अविनाशी तत्व पाँच डालें, वे प्रकृति रचते हैं। मैं सबका संचालक हूँ।

पंच महाभूत में आकाश सबसे निराला है, मैंने उसे गुण ऐसा दिया जिस में वह महाभूत अलग है। मनुष्य के मन में विचार आकाश में रुक जाते हैं। मैं आकाशवत हूँ।

महा आकाश में परम शांति है, तुम्हारा मन भी महाआकाश में समा सकता है। तुम अपने विचारों को सदा के लिए पवित्र रखो। तुम्हारे पवित्र मन के संकल्प मैं पूर्ण करूँगा।

अधिकांश मनुष्य मन के विचार संकीर्ण व कुंठित रखते हैं। सबके विचार आकाश में अनन्त काल तक रहते हैं। आकाश ऊर्जा व  संकल्पों की ध्वनि,तुम्हारी, अपने अंदर समा लेता है।

समय आने पर वे संकल्पों की ऊर्जा विग्रह होकर संसार में प्रकट हो जाती हैं। जो तुमने अपने मन, कर्म व वचन के बीज बोए थे, वैसी तुम्हारी सृष्टि बन जाती है।

आकाश कभी पक्षपात नहीं करता। वो तो ग्रहण करने की असीम शक्ति रखता है। यह विश्व एक दर्पण है, यह ब्रह्मांड एक कलश है। यहाँ गूँज हम सबकी मन के संकल्पों की हो रही है।

तुमने बहुत पहले हृदय में तीव्र वेदना के साथ मुझे पुकारा था और याचना की थी कि तुम्हें विश्व के सर्वोत्तम ऋषि के पास विद्या प्राप्त करने जाना है। तुम्हें मैंने आध्यात्मिक, भौतिक दोनों विद्याएँ दीं।

तुमने मेरे लिए मन से विरक्त होकर संसार छोड़ा, कभी नहीं माँग की धन, दौलत, आराम, सुख या यश पाने की। मैंने तुम्हें अपना स्वरूप खुलकर दिखाया है जैसे सूर्य या पूर्णिमा कार्तिक मास की।

तुमने मुझसे कहा मुझे आपको पाकर कभी भी संसार का नहीं होना है। मैंने तुम्हें इतना काम दे डाला कि तुम्हें हाथ में एक पल भी खाली नहीं मिलता है। तुम केवल मेरे लिए ही जी रही हो।

तुम्हारे मन में अटूट इच्छा थी मानव सेवा करने की। मैंने तुम्हें न केवल यह, परंतु आगे के सारे जीवनों में समाज सेवा करने की शक्ति, यथायोग्य धन व सारे साधन दिए हैं।

तुम चाहती हो तुम्हारे अंदर जो मैंने अमर ज्योति जगाई है वह कभी भी बुझे न। इसलिए मैंने तुम्हें अनेक पुस्तकें लिखने का काम दिया है। इतनी किताबें ईश्वर पर किसी ने नहीं लिखीं।

आज तुम जान लो मैं साक्षी हूँ, मौन हूँ, सदा निर्विकारी हूँ, मुझमें कभी भी बदलाव नहीं आता। मैंने सबको मन सहित संकल्प करने की शक्ति दी है। यह ब्रह्मांड हमारे संकल्पों से गूँज रहा है।

तुम्हारे मन में संकल्प उठने का कारण मैं जानता हूँ। तुम मन में अंदर क्या चाहते व सोचते हो, मैं जानता हूँ। मैं तो तुम्हें तुम्हारे मन में उठते संकल्पों द्वारा पहचानता हूँ।

जो जैसा कर्म करता है, उसके मन में वैसे ही संकल्प उठते हैं। जो जैसा संकल्प मन में रखता है, वैसा नया जन्म पाता है। आकाश में सबके मन के विचार व संकल्प अंकित है।

जब भी कोई संकल्प मन में पैदा करता है, मैं केवल उसका साक्षी हूँ। तुम जैसा मन में सोचोगे, मैं वैसा तुम्हें फल दूँगा। मैं क्या करूँ, जब मूढ़ मनुष्य मुझे नहीं,  परंतु मुझसे मिट्टी के खिलौने माँगता है?”

October 11, 2024/0 Comments/by Jyoti Marg/
https://jyotimarg.blog/wp-content/uploads/2021/09/Logo_300x300.png 0 0 Jyoti Marg https://jyotimarg.blog/wp-content/uploads/2021/09/Logo_300x300.png Jyoti Marg2024-10-11 16:23:382025-08-27 21:48:57आओ मैं तुम्हें कुछ बताऊँ, मैं तुम्हें अपने संकल्प के बारे में बताऊँ।
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आगे अब क्या होगा, वह तुम जानो, मेरी भविष्यवाणी सुनो।

#60

ॐ

6 of 7

परमात्मा –

“आगे अब क्या होगा, वह तुम मुझसे अवश्य सुनो, मैंने तुम्हारे भविष्य सुनहरे अक्षरों में लिख दिया क्योंकि तुम ने मेरी सारी बातें हैं जो मानी।

मेरी इच्छा में ब्रह्माण्ड के लिए उद्धार व कल्यण ही होता है, मनुष्य के लिए केवल उसकी आत्म उन्नति, कर्मों की सफाई व उसका मन का फैलाव |

मेरी इच्छा में इतनी बडी शक्ति है कोई भी इसका अनुमान लगाने मे असमर्थ है क्योंकि उसकी बुद्धि हमेशा छोटी ही पड़ेगी –  फिर मैं प्रयत्न करूँगा सिर्फ़ तुम्हारे लिए।

मैंने साढ़े तीन करोड़ वर्ष पहले संकल्प लिया था कि क्यों न कोई एक ऐसा धरती पर कार्य हो जिसे केवल एक नारी की, उसकी बुद्धि व शक्ति का प्रदर्शन हो।

नारी का मन मातृत्व भाव के कारण सदा कोमल व ममता से भरा होता है परन्तु उसकी चेतना, आत्मा को प्रकाशित करने की क्यों न कोई कभी सोचे?

धरती पर कभी भी जब कोई एक समय ऐसा आएगा जब संसार में अत्यधिक लोभ, क्रोध, भोग व सम्मोहन वाली नकारात्मक शक्तियाँ अत्यधिक बढ़ेंगी ।

तब मैं मेरी गुप्त शक्तियों को केवल एक बार ही धरती पर उताँंरुगा अवश्य जिससे धरती पर मानवता का खूब कल्याण हो –  वह अल्पकाल के लिए होंगी। 

मैं कार्य संपन्न होने पर उन शक्तियों को फिर से उनके स्थान पर भेज दूँगा । जब तक वह किसी मनुष्य में होंगी, वह चमत्कारी कार्य करेंगी । 

वे शक्तियाँ मैंने इस कलियुग में तुम्हें सौंपी हैं। तुम उन्हें भली भाँति जन कल्याण हेतु उपयोग में ला रही हो – तुम पूरे जीवन अपने कार्य के लिए उन्हें  प्रयोग करो। 

लोग तुम्हें अकस्मात अपने घर बुलाऐंगे और आदर सत्कार करेंगे, वे चाहेंगे तुम उनका कल्याण व उद्धार करो; वे मन से तुम्हारे आगे झुकेंगे – तुम उन्हें अपना आशीष दो। 

कभी भी अब कोई तुम्हें धोखा नहीं देगा, हैरान मत होना अगर वे तुम्हें अपने दिल की बात, राज़ व दुःख बताऐंगे । तुम उनका उपचार करो,कल्याण करो – वे तुम्हारे हैं। 

उन लोगों की दिन दुगनी रात चौगुनी आत्मा उन्नति होगी, उन्हें न केवल मोक्ष मिलेगा दुःखों से उन्हें ईश्वर साक्षात्कार ज्ञान, शान्ति व तप द्वारा मिलेगा। 

उन सबको कभी न पहले या दुबारा कभी न तुम जैसी गुरू माँ मिलेगी जिस में प्रत्येक के लिए इतना प्रेम, करूणा व दया झलकेगी – तुम उनका उपकार करो। 

साठ साल तक तुमने बिना एक दिन भूले मुझे निरन्तर स्मरण किया, बचे पाँच साल, उसमे भी तुमने केवल तप किया है – पाँच वर्ष की आयु में तुमने एक स्त्री की जान बचाई है। 

इतने छोटे बालक ने इतिहास में कभी किसी की जान नहीं बचाई है उस पुण्य का फल अब मैं तुम्हे दूँगा – तुम्हारा अत्यधिक आदर सत्कार प्रतिदिन होगा। 

मेरी शक्तियों को अब तक तुमने सच्चा प्रयोग किया है, मैं तुम्हें अब और वो शक्तियाँ दूँगा जिससे तुम्हारा आगे का काम एकदम आसान व तत्काल हो जाएगा। 

तुम्हारी अन्त श्वास  तक तुम्हें सदा अपनी छत्रछाया में रखुँगा । आगे के सारे जीवन में तुम्हें  मैं बहुत आराम दूँगा – इतने सारे जीवन में तुमने अथक किया परिश्रम है। 

इन्हीं शक्तियों को मैं तुम्हें अगले सारे जीवनों में देता आऊँगा जब तक सत्य युग नौ हजार नौ सौ पचास वर्ष बाद न आ जाए – ये शक्तियाँ तब लुप्त हो जाएंगी।” 

 

October 9, 2024/0 Comments/by Jyoti Marg/
https://jyotimarg.blog/wp-content/uploads/2021/09/Logo_300x300.png 0 0 Jyoti Marg https://jyotimarg.blog/wp-content/uploads/2021/09/Logo_300x300.png Jyoti Marg2024-10-09 17:40:532025-08-27 21:53:52आगे अब क्या होगा, वह तुम जानो, मेरी भविष्यवाणी सुनो।
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कभी न जो तुमने सोचा था, वो तुम अब करो ।

#59

ॐ

5 of 7

परमात्मा –

“मन एक अद्भुत शक्ति है। इसमें अपार संभावनाएँ छुपी पड़ीं होतीं हैं। मन की सबसे बड़ी शक्ति है इच्छा-शक्ति।

आदिकाल में ही जब मैंने मनुष्य की पहले-पहल रचना की थी, मैंने उसे इच्छा-शक्ति का नाभि में स्पंदन द्वारा प्रवेश किया।

इच्छा-शक्ति मैंने सबसे पहले दी क्योंकि मैं चाहता हूँ कि तुम मेरे पास आओ परंतु जब तुम चाहो, वरना मेरी माया से खेलो।

जब तक मनुष्य मन में दृढ़ इच्छा को नहीं जगाता अपनी सहमति से, तब तक उसके अंदर कभी भी मुझे जानने की इच्छा नहीं होगी।

पौराणिक काल में मैंने सबसे पहले धरती के पहले पुरुष को, जिसका नाम बाद में ‘मनु’ पड़ा, उसमें इच्छा-शक्ति दान में दी थी।

मैं चाहता था कि वह जल्द से जल्द प्रकृति और पुरुष को अलग कर, पुरुष-पुरुषोत्तम को स्वीकार करे जिससे आने वाली पीढ़ी स्वर्ग धरती पर बनाएँ।

मनु का मन बहुत शांत और पवित्र था, उसने प्रकृति से थोड़ी भी छेड़-छाड़ नहीं की; इसके बनिस्बत उसने प्रकृति से बहुत प्रेम किया व उसे पूजा।

उसने कहा कितनी मनोहर है यह प्रकृति जो हम सबको जीवन व आनंद देती है। मैं सदा इसकी उपासना व सेवा करूंँगा – यही मेरी पूजा होगी।

उसका मन मुझ प्रकृति में प्रतिबिंबित हो आनंद की लहरों में डूब जाता था चाहे वह झरना, फूल या पक्षी, बादल या वर्षा की बूँदे ही क्यों न हो।

मैंने अनेकों बार उसे मेरी छवि उसके मन में दिखाई जिसके कारण उसके आगे की तेईस पीढ़ियाँ विश्व में प्रकृति के संरक्षण में संलग्न थीं।

वहीं से शुरू हुआ एक नया दौर जब मनुष्यों के मन में प्रकृति में भगवान को ढूंँढने की इच्छा जागी। उन्होंने प्रकृति को पूजा इसलिए उनके मन में उन्माद ने जन्म नहीं लिया।

बहुत वर्ष बीतने पर आगे की पीढ़ी ने धीरे-धीरे अहंकार को जन्म दिया अपने मन में क्योंकि उनका मन प्रकृति के प्रेम से टूट चुका था। अब उनके मन में माया को भोगने की इच्छा आ गई।

धीरे-धीरे उन्हें प्रकृति या ईश्वर के बनिस्पत भोगने वाली वस्तुओं से अधिक प्रेम हो गया। संतोष व शांति के स्थान पर अब भोग मन में आ गया।

वह इच्छा-शक्ति जो मैंने पौराणिक काल में ‘मनु’ के मन में संचारित की थी, वह शक्ति धीरे-धीरे विकृत से विस्मृति के रूप में परिवर्तित हो गई।

मनुष्य परमात्मा की स्मृति को भुलाता चला गया और उसके स्थान पर संसार के लोग, उनकी बनाई संपत्ति और भोग विलास प्रवृत्ति की इच्छाओं को बढ़ाता गया।

मनुष्य की ढलान मन में तब रची जाती है जब वह अंतर्मुख से बहिर्मुख बन जाता है। मन को सदा अंतर्मुख रखने में ही भलाई है।

जैसे ही मन तुम्हारा बहिर्मुख होता है, उसे अपनी इच्छा-शक्ति से फिर से अंदर ले आओ, मेरी दी हुई इच्छा-शक्ति को प्रयोग में लाओ।

जब तक तुम अपनी इच्छा से कोई कर्म नहीं करोगे, वह कभी भी नहीं होने वाला, मेरी सहायता तुम्हें इच्छा जगाने के उपरांत ही मिलेगी।

इसी इच्छा-शक्ति द्वारा अब तुम अपनी सोई हुई आत्मा को जगाओ अपने मन को अंतर्मुख करके, इच्छा-शक्ति तुम्हें वह बल देगी जिससे असंभव कार्य होंगे।

मनुष्य ही असंभव कार्य कर सकता है क्योंकि इच्छा-शक्ति में मेरा एक अंश प्रकाश के रूप में छुपा है। उस शक्ति को तुम जगाओ।

वह शक्ति तुम्हारी नाभी में बंद पड़ी है, जन्म जन्मांतर से रूठी पड़ी है, वह एक ऐसी शक्ति है जिसके द्वारा तुम मुझ तक शीघ्र आ सकते हो, वह पहली सीढ़ी है।

नाभी में ॐ का उच्चारण करो, वह जागेगी, ध्यान ईश्वर का लगाओ। ईश्वर प्रकाश पुंज है। ॐ प्रकाशपुंज से भरा है। जीवन भर ॐ की उपासना करो।

जो मैं चाहता हूँ तुम करो, मेरी इच्छा तुम्हारी नाभी में सूर्य प्रकाश की भांति प्रवेश करेगी, वे किरणें तुम्हारे मस्तिष्क में ऊर्ध्व दिशा में चढ़ेंगी।

सहस्रार मेरा भवन है, निकेतन है, त्रिनेत्र निवास है, वहीं मैं तुम्हें अपना दर्शन दूँगा जो त्रिनेत्र पर चमकेगा। वहाँ से तुम प्रेरणा पाकर वह करो जो मैं चाहता हूँ, जो कभी न जो सोचा था वह तुम अब अवश्य करो।”

October 7, 2024/0 Comments/by Jyoti Marg/
https://jyotimarg.blog/wp-content/uploads/2021/09/Logo_300x300.png 0 0 Jyoti Marg https://jyotimarg.blog/wp-content/uploads/2021/09/Logo_300x300.png Jyoti Marg2024-10-07 15:22:402025-01-11 20:38:51कभी न जो तुमने सोचा था, वो तुम अब करो ।
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अपना जीवन ईश्वर को समर्पित करो । 

#58

ॐ

4 of 7

परमात्मा  – 

“यदि तुम यह जीवन ईश्वर को समर्पित कर दो, मन तुम्हारा कभी भी विचलित नहीं होगा। जीवन का सच्चा सुख मन में ध्यान द्वारा उतारी गई शान्ति है। जिन मन में सदा किसी न किसी वस्तु, संसारी इच्छा या इन्द्रिय सुख प्राप्त करने की चेष्टा रहती है, वे अपने जीवन में कभी शान्ति नहीं प्राप्त कर पाते हैं। 

भौतिक सुख किसी भी मनुष्य को स्थायी खुशी दे ही नहीं सकता। कारण यह है कि प्रसन्नता-वश मनुष्य संसार में प्रवेश तो कर लेता है, परन्तु उसे माया का ज्ञान नहीं होता। ईश्वर का ज्ञान तो कोई विरले को ही हो पाता है। 

जब मन की गहराई में स्थिर शान्ति का निवास होता है तब मनुष्य किसी भी वस्तु, व्यक्ति या भोग का विचार नहीं कर सकता। मैंने मनुष्य के मन की रचना ऐसी ही की है। 

मन के तीन हिस्से होते हैं। ऊपरी, मध्यम व निचला। ऊपरी मन में विश्व में होने वाले दृश्य, ध्वनि, गतिविधियाँ या शोर संचालित होता है। इन में स्मृति नहीं होती, केवल स्पन्दन होता है। दूसरी सतह जो मध्यम है, उसमें पिछले 108 जन्मों की स्मृतियाँ होती हैं। यदि यहाँ से कोई कर्म करता है तो उसमें काफी ताकत होती है क्योंकि इसमें थोड़ा ब्रह्म प्रकाश भी होता है। 108 जन्मों की स्मृतियाँ तुम्हारे नए कर्मों को प्रेरित करतीं हैं, इन्हे ही संस्कार कहते हैं। ध्यान करने से नकारात्मक स्मृतियाँ मिटाईं जा सकती हैं। इसलिए मनुष्य को ध्यान की उपासना करनी चाहिए। ध्यान मनुष्य का सबसे सर्वोत्तम कर्म है। ध्यान मन में परमात्मा की स्मृति को जगाता है। अधिकतर लोगों में यह स्मृति लुप्त हो चुकी होती है। 

जो मन का निचला हिस्सा है उसमें मनुष्य के पहले जन्म से लेकर 107 जन्म तक, एक सौ सातवे जन्म तक की स्मृतियाँ जमा होतीं हैं।   

अधिकतर मनुष्य 300 से 500 या 600 जन्मों तक बिना किसी उत्तम व श्रेयस लक्ष्य के जन्मते व मरते हैं। मन के निचले हिस्से में सबसे अधिक शक्ति व ब्रह्म प्रकाश होता है। परन्तु दुनिया में सबसे ज्यादा लोग केवल मन के ऊपरी हिस्से की शक्ति पर चलते हैं। वे ध्यान की साधना नहीं करते।

मन के मध्यम हिस्से को चित्त भी कहते हैं। वहीं पर वासनाएँ जमा होतीं हैं। वासनाएँ मनुष्य को विवश करती हैं। परन्तु जो सत्पुरुष ध्यान का बहुत अभ्यास कर लेते हैं, उनके इस मन में पिछले जन्मों की जगत भोगने की स्मृतियाँ धुँधलाकार नष्ट हो जाती हैं। उस स्थान में ईश्वर की, ब्रह्म प्रकाश की किरणें स्थान ले लेती हैं। उनके नए कर्म ईश्वर की प्रेरणा से होते हैं । यह गति व स्थिति केवल उसे प्राप्त हो सकती है जो ईश्वर को अपना मन समर्पित करता है और मन के वश होकर अज्ञान के कर्म नहीं करता। साधक, योगी व ज्ञानी को अपने को इस विषय में सर्वाधिक सावधान होना चाहिए। नहीं तो उनका पतन होता है, वे अपने मार्ग से भटक कर पुण्य नहीं, बहुत पाप जमा कर लेते हैं। उन्हें भविष्य में बहुत दुःख भोगने पड़ते हैं। 

मन के आखरी सबसे निचले हिस्से तक तो कोई करोड़ों-करोड़ो में से एक मनुष्य पहुँच पाता है। यह इसलिए कि इसमें अत्यधिक त्याग, तप, मौन, शान्ति व परिश्रम लगता है। अनेक परिक्षाएँ देनी होती हैं।  

परमात्मा को इस अवस्था के योगी सर्वाधिक प्रिय हैं चाहे वे बहुत कम ही क्यों न हों। कारण – उनके मन के हर एक कोने में पूर्ण रूप से केवल ब्रह्म प्रकाश होता है और शांति अथाह होती है। वे कभी भी सत्य का त्याग नहीं करते। उनसे केवल पुण्य ही होते हैं, वे पुण्यात्मा, चिरंजीवी होते हैं। उनका जीवन व मरणोपरान्त भी केवल ईश्वर की प्रसन्नता व सेवा करना ही होता है। संसार उनके लिए परमात्मा की छवि ही है। उनको सबके लिए प्रेम ही होता है।

तुम इसी श्रेणी की हो। तुमने महारत प्राप्त किया – केवल 108 जन्मों में पूरे मन में ब्रह्म प्रकाश भर लिया है। तुम्हारा पूरा जन्म मुझ परमात्मा को समर्पित है। तुमसे मैं अत्यधिक महान कार्य कराऊंँगा जिसमें लोगों की सोई आत्मा तुम्हारे दर्शन से ही जाग जाएगी। उसके बाद पुरुषार्थ उनका होगा।

जो भी सच्चे मन से मुझे समर्पित करता है उसका भाग्य बदल जाता है। मेरा आशिर्वाद पहले-पहल, मैं कठिनाइयाँ व कष्ट या अपमान के रूप में देता हूँ। मैं अच्छी तरह परखना चाहता हूँ कि वास्तव में उसे मैं ही चाहिए हूँ या यह एक-दो दिन की कोई सनक है? जब सारे संसार की वस्तुएँ मैं देकर भी देखता हूँ कि इसको तो केवल मैं ही चाहिए हूँ, तब मैं उसके मन में खूब सारा प्रकाश, शान्ति व धैर्ये भर देता हूँ। संसार में कोई भी दुःख या तूफ़ान आए, ये योगी कभी भी मन के कहने में नहीं आते। वे तो सिर्फ मेरी तरफ ही देखते रहते हैं। उनके हर श्वास में मेरी ही स्मृति रहती है। तब मैं उनको अपना सच्चा स्वरूप दिखाता हूँ, खूब वरदान देता हूँ और अनेक शक्तियाँ देता हूँ जिससे वे समाज की सेवा करते हैं। उनका पूरा जीवन ही ईश्वर-समर्पण होता है।

October 3, 2024/0 Comments/by Jyoti Marg/
https://jyotimarg.blog/wp-content/uploads/2021/09/Logo_300x300.png 0 0 Jyoti Marg https://jyotimarg.blog/wp-content/uploads/2021/09/Logo_300x300.png Jyoti Marg2024-10-03 14:47:322025-02-05 18:24:27अपना जीवन ईश्वर को समर्पित करो । 
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बिना लक्ष्य के जीवन निरर्थक है।

#57

ॐ

3 of 7


परमात्मा –

तुमने आज मुझसे पूछा था, “क्यों ये सारे गहरी नींद में सोए हैं? क्यों ये लोग केवल सांसारिक वस्तुएं पाकर इतने खुश हैं? मुझे तो यह लगता है कि यह सब लोग बेवजह ही जी रहे हैं। क्यों नहीं इन्हें समझ आता कि केवल समय रोज़ बेवजह यूँ ही बिताने में सुख प्राप्त नहीं होता। एक जन्म से दूसरे जन्म में भी प्रवेश करने पर मन में कोई अंतर नहीं आता है। एक के बाद दूसरा, फिर तीसरा, यूँ ही जन्मों की श्रृंखला बनती जाती है, परन्तु इनके मन में कभी भी प्रश्न नहीं उठता। अपने आप से यह कभी क्यों नहीं पूछते कि जीवन का सुख किसमें है? जीवन का अर्थ क्या है? एक जीवन का मूल्य क्या है?

एक दिन में कितनी श्वासें होती हैं, वर्ष में कितनी और पूरे जीवन में कितनी? ईश्वर ने आज भी हमें एक और दिन दिया है जीने को जिसमें श्वास चल रही है। श्वासों का सदुपयोग मैं कैसे करूँ?”

तुमको देखकर लगता है कि तुमने एक श्वास में मुझे अनेकों बार इतनी सच्चाई और आभार से पुकारा कि मैं विवश होकर तुम्हारे समक्ष झट आ जाता हूँ। इतने प्रेम से तो मुझे कोई नहीं याद करता? तुम से तो मेरी कोई बात नहीं छुपी, तुम जो मुझसे पूछना चाहोगी, मैं तत्काल तुम्हारे पास आऊंगा।

तुमने मुझे इस जन्म में कितनी बार पुकारा है तुम्हें याद नहीं। तुमने इस जन्म में कितनी बार रोकर मुझे बुलाया, तुम क्यों नहीं मुझे कहती? तुमने दिल में कितने घाव लिए मुझसे कभी शिकायत नहीं की। तुम्हें कितनों ने बेवजह अपमानित किया, तुमने मुझे कुछ नहीं कहा। जहाँ तुम्हें अत्यधिक यश मिलना चाहिए था, उन्होंने तुम्हारा तिरस्कार किया। तुम मुझसे क्यों नहीं कभी कहती कि तुम्हारे साथ इतना अन्याय क्यों हुआ? तुम्हें यह भी पूरी तरह पता है कि तुम्हें मैंने वरदान दिया है, तुम जो चाहोगी वह तुम्हें मिलेगा। तुम्हारे संकल्प में आज इतनी शक्ति है कि यदि तुम कहोगी यह धरती फट जाए तो फट जाएगी। तुम्हारी संकल्प शक्ति मेरा तुम्हें आशीर्वाद है। लेकिन तुम मुझसे संसारी वस्तु कभी नहीं माँगती।

तुम कितनी अदभुत और निराली स्त्री हो जो किसी ने कभी नहीं देखी होगी। तुम सबसे अलग हो, इसलिए मेरी बहुत विशेष हो। 

तुमने कुछ हजारों वर्ष पहले मुझसे कहा था – “मेरे बच्चे नहीं बचे तो क्या, विश्व में सारे बच्चे जीवित रहें। ये धरती सदा हरी-भरी रहे, नदियों में सदा पानी बहे और धरती पर खूब वृक्ष उगें।”

तुम आज भी शून्य अवस्था में मन में धरती माँ के लिए, विश्व के शांति की प्रार्थना करती हो। ध्यान में वृक्षों को अपने श्वासों द्वारा लंबे जीवन देने की कामना करती हो। कोई वृक्ष काटता है तो उसका दर्द अपने शरीर में महसूस करती हो। किसी बच्चे का चेहरा देखकर उसकी लम्बी आयु की प्रार्थना करती हो। “इस संसार में कभी प्रलय न आए” – यह मुझसे प्रार्थना करती हो। इसलिए मैंने 10.09.2021 को तुम्हें कहा था – This world is safe with one person like you. Such is the Power of Wisdom, Truth and Penance.

मैं तुम्हें लम्बी आयु व स्वास्थ्य क्यों न दूँ? तुम्हारी श्वासों में सदा मैं ही तो हूं।

तुमने यह जन्म मुझसे रो रो कर माँगा है। कोई भी ऋषि, संत और महात्मा ने स्वीकृति नहीं दी थी। सबने कहा एक जीवन में चार जीवनों का भार कैसे ढोएगी? तुमने यह जन्म लेने से पहले बहुत रो कर मुझसे कहा था कि, “किसे पता चार जन्मों बाद आरक्षित मोक्ष मिले या न मिले? माया का क्या भरोसा? मन का क्या भरोसा? मुझे केवल आप चाहिए, मुझे यह जन्म दो, मैं सब कष्ट सह लूंँगी पर आपके मुझे दर्शन होने ही चाहिए।”

मुझे तुम्हारे मन में ली प्रतिज्ञा पता थी। तुमने पिछले जन्म में ही जान लिया था जब तुम महल में रानी थी कि संसार में जन्म लेकर सच्चा सुख वैभव, धन, मान-सम्मान में नहीं होता है। वह तो क्षणभंगुर है। मन का सच्चा सुख ईश्वर-प्राप्ति में है और वह मन की शांति से प्राप्त होगा।

जब मनुष्य अपना लक्ष्य मन में दृढ़ धारण कर लेता है तो वह अवश्य पूर्ण होता है। जो जैसा लक्ष्य रखता है, वह वैसा ही फल पाता है। यदि मनुष्य अपने जीवन का लक्ष्य केवल सुख भोगना ही मान लेता है, तो वो जितने भी आगे जन्म ले ले, वह लक्ष्य कभी पूरा नहीं होगा। संसार का सुख बहुत क्षणिक होता है और ईश्वर का सुख अति आनन्दमय और शांतिप्रद, जिसे मिलने के बाद संसार की कोई वस्तु प्राप्त करने की इच्छा ही नहीं होती। वही पूर्ण सुख है। वही परम सुख है।

जो मनुष्य अपने जीवन से सीखता है, जो भी संसार में होता है उससे सबक लेता है और सुख व दुख दोनों में आसक्त नहीं होता, वह सदा स्थाई शांति का भोगी होता है। उसे मैं अपने संपर्क में बुलाता हूँ और विशेष स्थान और मान देता हूँ। ऐसा स्थान और मान जो कोई छीन नहीं सकता, उसे चुरा नहीं सकता है। तुमने मुझसे वही पाया है। तुम उसकी हर तरह से अधिकारी हो।

सुमंत्र – तुम ॐ का जाप करती हो, ॐ ही मंत्र है। जब कोई मंत्र 11,128 (ग्यारह हज़ार एक सौ अट्ठाईस) बार जप जाता है, उसे सुमंत्र कहते हैं।

तुम्हारे हर श्वास का लक्ष्य मैं हूँ। तुम्हारा जन्म व कर्म दोनों सार्थक हुए। तुम्हारी आत्मा संसारी बन्धनों व माया से मुक्त है। तुम्हारा जन्म धन्य हुआ, पूर्ण सार्थक हुआ। तुमने शुरू से ही, बचपन में ही, लक्ष्य प्राप्ति की चेष्टा की थी। जो ईश्वर प्राप्ति का लक्ष्य था वह तुमने अपने दृढ़ संकल्प व पुरुषार्थ से पाया है। लोगों को तुम्हें जानकर, पहचानकर अपने जीवन का लक्ष्य तय करना चाहिए, तभी उनका जीवन सार्थक बनेगा। उन्हें मेरी सहायता पहुँचाई जाएगी।”

 

October 3, 2024/0 Comments/by Jyoti Marg/
https://jyotimarg.blog/wp-content/uploads/2021/09/Logo_300x300.png 0 0 Jyoti Marg https://jyotimarg.blog/wp-content/uploads/2021/09/Logo_300x300.png Jyoti Marg2024-10-03 14:35:282024-10-08 10:37:08बिना लक्ष्य के जीवन निरर्थक है।
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सत्यदेव – सत्य ही देव है, सत्य ही ईश्वर है । 

#56

ॐ

2 of 7

24-09-24

                        “अभी-अभी तुम्हें ज्ञात हुआ है कि मैं सत्यदेव हूंँ। तुमने मेरा दर्शन पाया है दोपहर 2:40 बजने से कुछ ही क्षण पहले। अभी दिन के 2 बजकर 40 मिनट हुए हैं। हाँ, मैं देवता हूं – सत्य का देवता हूंँ। तुमसे पहले केवल 3 प्राणियों ने मेरा दर्शन पाया है। मैं उसे ही दर्शन देता हूंँ जिसके लिए परमात्मा मुझे आज्ञा देते हैं। उनके कहने पर ही मैं अपना चेहरा पृथ्वी लोक पर किसी ज्ञानी, मुनि या महात्मा को दिखाता हूंँ। तुमने मेरी छवि अत्यधिक शांत और मौन में लीन पाई। मैं ध्यान में लीन था परंतु तुम भी तो गहरी समाधि अवस्था में थीं। मुझे पाकर तुम धन्य हो गई हो और एक क्षण खोये बिना झटपट लिख रही हो। 

                      तुमने अपना जीवन धन्य कर डाला अपनी हर श्वास को परमात्मा को समर्पित करके। तुम ना कभी अपने सुख की कामना करती हो और ना तुम्हें क्रोध आता है अगर ईश्वर की आज्ञा मानने व सेवा करने में तुम्हारा आराम, नींद व सुख भंग होता है। तुम उसे तत्काल पूर्ण रूप से सर्वोत्तम करना चाहती हो।

                  यही गुण तुम्हारा देखकर आज परमात्मा ने मुझे दोपहर 2:39 मिनट से 52 सेकंड पहले कहा, “सत्यदेव, तुम पहले अपना दर्शन दो झटपट उसे । वह बहुत बड़भागी है। उसने अनगिनत निष्काम कर्म कम आयु में ही किए हैं जिसका उसकाे ज्ञान भी नहीं है। मुझसे गलती कभी नहीं होती है। प्रत्येक जीवात्मा के कर्मों की कुंडली में क्या लिखा है मुझे सब ज्ञान है। मैंने तो कैलाश पर्वत के ऊपर आकाश में केवल ऋषियों के लिए एक विशेष प्रकार का कलश अपनी प्राण शक्ति से बनाया है जो केवल मेरी किरणों से निर्मित है। ऋषि भृगु इसके रक्षक हैं। वहाँ पर मैंने विश्व में प्रत्येक मनुष्य की जन्म-पत्री जमा कर रखीं हैं। मनुष्य मुझे धोखा दे ही नहीं सकता। वह तो स्वयं को धोखा देता है।  मुझसे किसी के कर्म, मन के भाव व ध्येय छुपते नहीं। मेरे पास सबकी प्रत्येक जन्म की जीवनी जमा हुई रखीं है। 

                       मुझे तो  ‘विवेचन सारणी’  में झाँकने की आवश्यकता कभी नहीं पड़ेगी। वह कलश तो ऋषियों के लिए मैंने बनाया है जिससे वे धर्म-अधर्म का विश्व में सन्तुलन बनाए रखें, नहीं तो प्रलय आ जाएगा। वे प्रत्येक रविवार को ब्रह्म मुहूर्त में 4.32 मिनट पर सबकी कुंडली देखते हैं। इसके द्वारा वह अपना गणित लगाते हैं और अनुमान लगाते हैं कि उसे अपने कर्मों में निर्मलता लाने में कितनी और देर लगेगी?

                     अपने सामूहिक ध्यान में ऋषि गण उन लोगों के लिए मुझ से प्रार्थना करते हैं जिससे उन्हें उनके पापों से जल्दी मुक्ति मिल जाए। जब ऐसा होगा तो जो महात्मा, सत्कर्मी, ज्ञानी व श्रद्धालु समाज में लोगों का उद्धार करना चाहते हैं, उनके कार्य में उन पापों के स्पंदन बाधा न डालें। जो सत्यार्थी होते हैं, उन्हें विश्व में सबसे अधिक हानि पहुँचाई जाती है, परन्तु वह सत्य को नहीं त्यागते। इसलिए सत्यदेव, तुम तत्काल उसे अपना दर्शन दो और 3 सत्य के सिद्धांत बताओ। जब तुम उसे बताओगे, तो वो समझदार होने के कारण जान जाएगी कि ईश्वर व सत्यदेव का दर्शन मुझे श्रद्धालुओं, महात्माओं व पुण्यात्माओं को अवश्य कराना चाहिए। इसलिए तुम उस पर आशीर्वाद सहित सत्य के तीन वचन बताकर उसे धन्य करो। ऐसा होने पर जन मानस में मेरी शक्ति फैलेगी और उनकी चेतना और जागेगी।”

                   “मेरा नाम सत्यदेव इसलिए ईश्वर ने रखा क्योंकि मुझे सत्य सबसे अधिक प्रिय है। परमात्मा ने मुझे देवता की उपाधि दी। मैं छुप कर उन लोगों के पास अदृश्य रूप में खड़ा हो जाता हूँ, जो सत्य की खोज में हैं और जो सत्य प्राप्त करने के लिए तपस्या कर रहे हैं। मैं तुम्हारे पास भी अनेकों बार आया हूँ जब तुम मन में संसार से अत्यधिक विरक्त हो गई थीं। तुम्हारी आयु 32 वर्ष से अधिक न होगी। तुम जीवन से हताश थीं क्योंकि तुम्हें सत्य का प्रकाश कहीं से नहीं मिल रहा था। दुःख इस बात का था कि तुम्हें लोगों में अज्ञान का अंधकार बहुत गहरा दिखा। परन्तु रास्ता दिखाता कौन? तब तुमने 6 साल लगातार मौन किया, गहरा अध्ययन किया, संत महात्माओं की जीवनी से प्रेरणा ली और एक बहुत बड़ी शपथ ले ली। वह शपथ थी कि, “जब तक मुझे परमात्मा सीधे ज्ञान ना देंगे, जब तक वह मुझमें मेरी आत्मा की लौ ना जला दें, तब तक मैं किसी भी जीवित शरीरधारी गुरु के पास नहीं जाऊंँगी।” 

                   तुमने ठीक ऐसा ही किया। तुमने मौन व शांति का तप किया। अनेक दुःख सहे परंतु अपनी शपथ नहीं तोड़ी। 24 वर्ष बाद तुम्हें इस तप का अब फल मिल रहा है। तुम्हारी तपस्या सफल हुई है और तुमने अपनी आत्मा को उसकी चेतना द्वारा पूरी तरह चमका दिया है। जिन लोगों ने तुम्हें अपने से दूर रखा क्योंकि उनमें तुमसे ईर्ष्या थी और भय था कि तुम्हारे होते वे सबके सामने फीके न दिखाई दें, वे आज कहीं भी नहीं पहुंँचे हैं। ईर्ष्या, भेदभाव व असमानता दिखाकर उन्होंने अपना पतन कर लिया। इस जीवन में उनके पास दोबारा ऐसा मौका नहीं आएगा जब काल व भाग्य दोनों उनका साथ दें।

                    तुमने यह सब सहन किया क्योंकि तुम्हें प्रतीक्षा थी कि ईश्वर तुमको साक्षात्कार उपदेश दें, सिखाएंँ और जीवन को दिव्य करें। अब वैसा ही हो रहा है। इसलिए मैं तुम्हें ईश्वर के आदेश पर तीन बातें बताऊंँगा जिसे सब लोग ध्यान से सुनें।

पहली बात – सत्य को जानना विश्व में सबसे कठिन कार्य है।

                    इसे कोई विरला ही प्राप्त कर पाता है। सत्य को पाना, ईश्वर के सत्य के लिए कठोर तपस्या करना, करोड़ों-करोड़ों में से एक कोई सफल होता है। ऐसे महान आत्माओं का बहुत आदर होना चाहिए। अनेक युग आते हैं और जाते हैं। ईश्वर को सत्य के रूप में पाना – यह तो किसी एक विरले मनुष्य को ईश्वर-कृपा द्वारा उसके पुण्य व सत्कर्मों के लिए दिया जाता है। यह मामूली घटना नहीं है। इस पर साधकों, मुमुक्षु व जिज्ञासुओं को पूरा ध्यान देना चाहिए। 

दूसरी बात – दो प्रकार के सत्य के ज्ञाता होते हैं।

                     एक, जो सत्य को केवल जानता है। दूसरा वह जो न केवल सत्य को जान लेता है बल्कि श्रद्धालु व मुमुक्षुओं में ईश्वर के सत्य को जगा भी देता है। 

तुम्हारे असीम पुण्यों के कारण परमात्मा ने तुम्हें दूसरी श्रेणी में रखा है। जो पात्र होगा, वह तुम्हारे पास स्वयं आएगा और उसे ईश्वर के सत्य का बोध सहज रूप से हो ही जाएगा।

तीसरी बात – अधिकतर यह ही होता आ रहा है कि अधिक से अधिक लोग सन्मार्ग पर साधना व तपस्या करते करते भटक ही जाते हैं।

                   उनको मार्ग से कोई नहीं भटकाता। उनकी इच्छाएंँ और वासनाएंँ उनके पतन का कारण होतीं हैं। जिन लोगों ने तुम्हें पीछे रखने की कोशिश की और सफल हुए, वे लोग अपनी सदियों पुरानी मन में दबी इच्छाओं व गहरी वासनाओं को आज तक नहीं निकाल पाए। वही उनका सबसे बड़ा रोग है, वही बाधा बन गईं।  

तुम्हें केवल सत्य चाहिए था जो तुम्हें ईश्वर ने असीम रूप में निरंतर दिया है और देते जाएंँगे। तुमने किसी से भी द्वेष, क्रोध व ईर्ष्या नहीं रखी। तुम्हें मन में ही ब्रह्मप्रकाश का साक्षात्कार हो रहा है। दिव्य आत्मा को ब्रह्मप्रकाश प्राप्त होता है। तुमने ईश्वर से सत्य माँगा, तुम्हें सत्य प्राप्त हुआ। 

इसलिए सत्य ही देव है, सत्य ही ईश्वर है। 

                  सत्य को जानो, प्राप्त करो। सत्य ही तुम्हें तुम्हारे भ्रम से, अज्ञान से व गहरी नींद से उठाएगा। ईश्वर से मन में खूब प्रार्थना करो कि तुम्हारा मन सदा के लिए स्वच्छ हो जाए और उनकी दया व कृपा से तुम्हें अपने मन में ब्रह्मप्रकाश का साक्षात्कार हो जाए। सत्य ही ईश्वर है, सत्य ही परमात्मा है। सत्य को अपने मन में सदा के लिए धारण करो। सत्य में ही ब्रह्मप्रकाश का निवास होता है। तुम सब में ब्रह्मप्रकाश की ज्योति को सत्य द्वारा जगाओ। 

मेरा तुमको पूर्ण आशीर्वाद है, इस कार्य के हर प्रयास में सदा सफलता और यश प्राप्त करो। 

सुखी भव, चिरंजीवी भव। 

 तुम्हारा पिता 

    सत्य देव

         ॐ

 

September 26, 2024/1 Comment/by Jyoti Marg/
https://jyotimarg.blog/wp-content/uploads/2021/09/Logo_300x300.png 0 0 Jyoti Marg https://jyotimarg.blog/wp-content/uploads/2021/09/Logo_300x300.png Jyoti Marg2024-09-26 11:56:492025-02-05 19:06:47सत्यदेव – सत्य ही देव है, सत्य ही ईश्वर है । 
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इच्छा शक्ति या ईश्वर-इच्छा बड़ी शक्ति?

#55

ॐ

1 of 7

परमात्मा –

“तुमने आज से पूर्ण दस वर्ष पहले इसी तारीख़ व समय पर मुझसे निष्पाप मन से बालक की भाँति पूछा था, “हे भगवन्, मुझे कृपा करके बताएँ विश्व में आपकी बनाई हुई सबसे बड़ी शक्ति कौन सी है? मुझे परमाणु शक्ति मत कहना क्योंकि वे तो मनुष्य संसार की अनेक वस्तुओं से नव निर्माण कर ही लेता है। विनाशकारी वस्तुएँ आप नहीं बना सकते। यह कार्य मूढ़ मनुष्य ही कर सकता है।”

मैंने तुम्हें उत्तर दिया था, “इच्छा शक्ति।

मनुष्य में विद्यमान इच्छा शक्ति विश्व में सबसे बड़ी शक्ति है। उसे प्राप्त करके मनुष्य कठिन से कठिन व कल्पना के परे जो कर्म हैं, वे कर लेता है। परन्तु याद रहे मैंने ही मनुष्य के लिए इच्छा शक्ति का निर्माण किया है।

दस वर्षों में मैंने तुम्हें इच्छा शक्ति के बारे में विस्तार से बताया है। तुमने इसे असीम रूप में प्रयोग करके अपने जीवन को समाज के लिए एक अनोखी मिसाल बनाकर प्रस्तुत किया है। कुछ ही वर्षों में एक ऐसा समय व काल खण्ड आएगा जिसमें लोगों में अत्यधिक जिज्ञासा जन्म लेगी। वे जानना चाहेंगे कि यदि जीवन संग्राम है, एक चुनौती है, एक निरन्तर प्रयास है, तो तुम जैसी साधारण दिखने व बोलने वाली स्त्री ने इतने कम अवधि में ईश्वर को इतनी गहराई से किस प्रकार व क्यों जान लिया?

उनके मन में विचार आने दो। मनुष्य में जिज्ञासा होना अति अनिवार्य है। उसकी प्रगति अवश्य होगी। परन्तु वे कितना भी अपना माथा मार ले, वे कभी भी जान नहीं सकेंगे। रहस्य है इस पहेली में – जब तक मैं नहीं चाहता कि किसी मनुष्य को कोई बात का भेद खुल जाए या मालूम हो जाए, उससे मेरे द्वारा ढकी हुई गुत्थी या पहेली खुल जाए, तब तक संसार का हर एक प्राणी वो छुपे, ढके या अनभिज्ञ विषय को जानने में असफल ही होगा।

तुम्हारे विषय में मैं आज सोमवार 23 सितम्बर 11.22 सुबह के शुभ मुहूर्त पर बताता हूँ ।

तुमने मुझे संपूर्ण रूप से जाना है। मैं तुम्हारे पास किसी भी क्षण अकस्मात प्रकट हो जाता हूँ। तुम मेरे सामने एक नन्हे बालक जैसा हृदय लिए मन में शान्ति व मौन में रहती हो। मैंने इस आलौकिक क्षण में कभी भी तुम्हें कुछ माँगते नहीं देखा। सदा आभार, केवल आभार प्रकट होता रहता है, अथक आभार प्रकट किया है तुमने।

इसलिए मैं तुम्हारे समक्ष आया हूँ। तुमसे कह रहा हूँ –

विश्व में ही नहीं, पूरे ब्रह्माण्ड में सबसे बड़ी शक्ति यदि कोई है तो वो है मेरी इच्छा, ईश्वर इच्छा। विश्व में, तुम्हारे जीवन में जो मैं चाहता हूँ, वही होता है और आगे के सारे जीवन में होगा।

मनुष्य में इच्छा शक्ति सबसे बड़ी शक्ति है जो मैंने दी है, परन्तु संसार में जो सबसे बड़ी शक्ति है वो मेरे अन्दर जन्मे संकल्प की है। जो मैं चाहता हूँ, वो अवश्य होकर रहेगा। जो मैं नहीं चाहता, उस बात को कोई भी नहीं कर पाएगा। ईश्वर इच्छा ही सबसे बड़ी शक्ति है।

मैं तुमसे 3 कार्य करवाना चाहता हूँ। वे अवश्य इसी जन्म में पूर्ण होंगे।

पहला – तुम्हारा शरीर निर्विकारी व आखरी साँस तक स्वस्थ रहे। यह काया कल्प से हो रहा है। 495 दिनों बाद वह पूर्ण रूप से सम्पन्न हो जाएगा। तुमने इसे 1/3 पूरा कर लिया है।

दूसरा – तुम 134 पुस्तकें लिखोगी। पहले मैंने 121 सोचा था। तुम इसी जीवन में यह कार्य सम्पन्न करोगी।

तीसरा – तुम विश्व में सच्चे जिज्ञासु, साधक व मुमुक्षुओं को जगाओ, उनकी चेतना पूर्ण रूप से जागी नहीं। उनका आगे का रास्ता उन्हें पता नहीं है। तुम दिशा दिखाओ उन्हें। आगे जाकर 12 वर्षों बाद तुम्हारी पुस्तकें जन मानस को ज्ञान से भर देंगी। बहुत लोग जिज्ञासा जगाकर अपना जीवन पूरा पलट देंगे और समाज में धर्म, सत्य, योग व तप की पुनर्स्थापना होगी।

इस कारण हेतु मैंने तुम्हें लंबी आयु व पूर्ण स्वास्थ्य दिया है। जिन दुर्जनों ने ईर्ष्या कारण अनेकों वर्ष तुमको संताप व दुख दिए हैं, उनकी प्राण शक्ति मैंने अत्यधिक कम कर दी है। वे बुद्धिहीन, शक्तिहीन व संताप ग्रस्त हैं। आज से तुम एक भी ऐसा संकल्प मन में मत आने देना जो तुम्हारे मन में घबराहट पैदा करे। वे संकल्प दुष्ट लोगों के होते हैं।

तुम सदा से मेरी इच्छा पर चलती आई हो। तुमको मैंने संसार की सबसे बड़ी शक्ति का अनेकों बार अनुभव कराया है, भविष्य में और भी कराऊँगा। जिन श्रद्धालुओं को यह बात मानने में कष्ट नहीं होगा, वे तुम्हारे सान्निध्य से तेज़ गति से आत्म उन्नति करेंगे, वर्षों में नहीं कुछ महीनों में। उन पर मेरी पूर्ण कृपा बरसेगी। उन्हें देर नहीं लगेगी यह ज्ञात होने में कि यदि विश्व में जो सबसे बड़ी शक्ति है, वो ईश्वर इच्छा ही है। तुम सदा मेरे कहने पर जीवन जीती आई हो। तुम्हें आज यह आशीर्वाद मिला है – जो तुम्हारे समक्ष व सान्निध्य में सच्चे मन से आएगा, उसे मेरा कभी न कभी इसी जीवन में दर्शन अवश्य होगा।”

 

 

September 24, 2024/0 Comments/by Jyoti Marg/
https://jyotimarg.blog/wp-content/uploads/2021/09/Logo_300x300.png 0 0 Jyoti Marg https://jyotimarg.blog/wp-content/uploads/2021/09/Logo_300x300.png Jyoti Marg2024-09-24 12:16:322024-10-08 10:29:53इच्छा शक्ति या ईश्वर-इच्छा बड़ी शक्ति?
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