#34
ॐ
ईश्वर का सान्निध्य प्रेम से शुरू होता है। अपनी आस्था को निर्मल, निर्मोही व स्वार्थहीन रखो । (१)
प्रेम से उत्पन्न भाव जब ईश्वर तक पहुँचते हैं तो ईश्वर द्रवित होते हैं, स्वार्थ प्रेम को मैला करता है। (२)
ईश्वर का सान्निध्य प्राप्त करने के लिए तत्पर रहना होता है, उनका आगमन अकस्मात व सरल भाव से होता है । (३)
सान्निध्य प्राप्ति के लिए मन की पूरी तैयारी आवश्यक होती है, मन को कुंठा रहित व शान्त रखो । (४ )
मन के भाव पढ़ने में ईश्वर निपुण हैं, अपने भाव व मनोवृत्ति को सदा सरल व निर्मल बनाए रखो । (५ )
किसी भी प्रकार का भय मन में संशय पैदा करता है, अपने विश्वास, आस्था व प्रेम को संचित रखो । (६)
किसी ने भी जो कल्पना नहीं की हो, वह ईश्वर तुम्हारे जीवन में घटित करने में सक्षम हैं, तुम धैर्य रखो । (७)
जिसका तुम्हें अनुमान भी नहीं है, वह जीवन विकसित करने की शक्ति ईश्वर में विद्यमान है, तुम केवल विश्वास रखो । (८)
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