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Jyoti Marg | ज्योति मार्ग
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ध्यान मन को सशक्त करने का अति उत्तम साधन है, ध्यान बिना सद्गति नहीं।

#52

ॐ

(2 of 4)

ध्यान

  1.   ध्यान जीवन का मूल आधार है जिससे जीवन ईश्वर इच्छा पर जिया जाए।
  2.   ईश्वर इच्छा क्या है ? यह बोध केवल ध्यान द्वारा ज्ञात किया जा सकता है। ईश्वर की कृपा ध्यान में परम शान्ति के रूप में प्राप्त होती है।
  3.  ध्यान से सन्मार्ग व सत्य प्राप्त होता है।
  4.  सत्य प्राप्त करने की अभिलाषा भी ध्यान द्वारा जगाई जा सकती है।
  5.  ध्यान किए बिना ईश्वर प्राप्त करना असम्भव है।
  6.  ध्यान अन्दर की ज्योति को जगाकर मन को प्रज्ज्वलित करता है।
  7.  ध्यान वह शक्ति है जिससे सम्पूर्ण विश्व, प्रकृति, ब्रह्माण्ड व परमात्मा को जाना जा सकता है
  8. अति पवित्र आत्मा, सर्व व्यापक परमात्मा का दर्शन सम्पूर्ण रूप से ध्यान से ही होता है।
September 21, 2024/0 Comments/by Jyoti Marg/
https://jyotimarg.blog/wp-content/uploads/2021/09/Logo_300x300.png 0 0 Jyoti Marg https://jyotimarg.blog/wp-content/uploads/2021/09/Logo_300x300.png Jyoti Marg2024-09-21 15:45:292025-02-06 22:06:35ध्यान मन को सशक्त करने का अति उत्तम साधन है, ध्यान बिना सद्गति नहीं।
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प्राणायाम साधना की बुनियाद है। शान्ति की खोज के लिए पहली सीढ़ी है।

#51

ॐ

(1 of 4)

प्राणायाम

  1.  प्राणायाम पूजा है।
  2.  प्राणायाम समाधि का मार्ग है।
  3.  प्राणायाम अंतर्मुख होने के लिए अति आवश्यक है।
  4.  प्राणायाम जीवन को सुगम बनाता है क्योंकि उस से हमारी श्वासों की गति तीव्र से मध्यम हो जाती हैं।
  5.  किसी भी समस्या का समाधान प्राणायाम करने के बाद निकाला जा सकता है।
  6.  प्राणों की शक्ति को नियोजित करने के लिए प्राणायाम है। बिखरे मन को सँभालने के लिए प्राणायाम बना है।
  7.  प्राणायाम इच्छाओं व वासनाओं का गतिरोधक है।
  8.  अतिशयोक्ति नहीं होगी अगर यह कहा जाए कि बिना प्राणायाम किए ईश्वर-साक्षात्कार केवल एक कल्पना है।

September 21, 2024/1 Comment/by Jyoti Marg/
https://jyotimarg.blog/wp-content/uploads/2021/09/Logo_300x300.png 0 0 Jyoti Marg https://jyotimarg.blog/wp-content/uploads/2021/09/Logo_300x300.png Jyoti Marg2024-09-21 15:41:462025-02-06 22:05:15प्राणायाम साधना की बुनियाद है। शान्ति की खोज के लिए पहली सीढ़ी है।
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कल किसने देखा है?

#50

ॐ

आने वाला कल एक रहस्य की चादर से ढ़का है, किसे पता उसमें क्या-क्या छिपा है? 

सुनहरे अक्षरों से भविष्य लिखा है या ढ़ेर सारी समस्याओं का हमको सामना करना पड़ेगा? 

जो बीज अतीत में हमने इधर उधर डाले हैं, वे ही तो साकार होकर सामने आएँगे। 

जो कभी न सोचा था वह भी घटित हो सकता है या फिर मनचाही बातें पूरी होंगी? 

यह तो केवल परमात्मा जाने आगे क्या होने वाला है; अपना कर्म करते जाओ, सोचो मत। 

मन में भविष्य के लिए उत्थान व प्रगति का सोचो और प्रभु से माँगो सबका केवल कल्याण। 

मन में अपने विचारों को सदा प्रेम व शान्ति से ओत-प्रोत करो; अपनी जिम्मेदारी लगन से करो।

जो जैसा करता है, वो वैसा ही भविष्य अपना रचता है; कल किसने देखा है, कल कैसा होगा? 

जब-जब हम अपने सुनहरे सपनों को साकार करने की चेष्टा करते हैं, तब-तब मन में नए विचार आते हैं। 

अपने विचारों की धारा को ईश्वर की मर्ज़ी से मिला लो, किसे पता हमसे कुछ असम्भव हो जाए?

कर्म क्या है? कर्म फल क्या होता है? ऐसा क्यों होता है? वैसा क्यों होता है ? यह एक जटिल समस्या है। 

ईश्वर के रहस्य व भविष्य को पढ़ना और जानना कोई बिड़ला ही कर पाता है, जो जानता है वो मौन है। 

हमें अपनी कठिनाइयों को पूरी क्षमता से सामना करना होता है, तभी जाकर भविष्य अच्छा निर्माण होता है। 

ईश्वर की लीला अपरम्पार है, उसे कौन जानता या स्वीकार करता है? परन्तु जान लो होगा वही, जो होना है। 

 

जब भी किसी स्थान पर, सभ्यता या मनुष्य में अत्यधिक प्रगति व समृद्धि अकस्मात होती है, वहाँ का काल-चक्र बदलता है। 

सौम्यता, शालीनता व सभ्यता प्रगति व समृद्धि के साथ-साथ यदि नहीं अपनाई गईं, तो विनाश अटल है। 

समय सबको अपनी शक्ति अवश्य दिखाता है, जो कभी किसी ने नहीं सोचा, वह वहाँ उस स्थान पर होता है। 

एक समय के बाद उस उल्टे पहिये को न कोई बदल सकता है न उसकी चाल सही कर सकेगा, समय शक्ति है।

 

अपनी प्रभुता, शक्ति, धन, समय, बल व बुद्धि का जो भी ईश्वर से पाकर दुरुपयोग करता है, समय उससे छल करता है। 

एक बार बिगड़ी समय की सुगम चक्रधारा स्वार्थी मनुष्यों को ईश्वर का संकेत अवश्य देती हैं, परन्तु विनम्रता न दिखाई तो विनाश अवश्य है। 

जो-जो मनुष्य केवल अपना स्वार्थ पूरा करने के लिए प्रतिदिन जीते हैं, समय और भाग्य दोनों उन्हें अपनी पीठ दिखाते हैं। 

यदि चाहते हो तुम कि तुम्हारा भविष्य प्रतिदिन सुन्दर व गौरवशाली होता जाए, तो स्मरण रहे स्वार्थ व  लोभ को इसी क्षण सदा के लिए त्याग दो। 

जो किसे भी नहीं ज्ञात, वो सब परमात्मा को बोध है, कब तक अपने गुप्त व रोगी विचारों को संसार से  छिपाते यहाँ-वहाँ भटकोगे? 

तुम्हारा समय, तुम्हारा भविष्य व आज का प्रारब्ध जो कुछ भी रचा या उगने वाला है, वो सब स्वयं का ही तो निर्माण किया है।

सत्य अटल है, समय अटल है, भाग्य अटल है, भविष्य तुम्हारा अटल है; ईश्वर से मिला न्याय भी संसार में अटल है। 

ईश्वर परम सत्य है, ईश्वर का न्याय अचूक है, समय पर ईश्वर से मिला न्याय को भी मनुष्य पलटने में असफल है। 

कभी भी अपना धीरज मत त्यागो, मन में शान्ति स्थिर रखो, ईश्वर को तुम्हारे सत्य को प्रकट करने का एक अवसर दो। 

कभी न सोचा था तुमने वो तुम्हारा भविष्य होगा यदि तुम सदैव अपने मन को हर परिस्थिति में शान्ति व मौन में रखोगे। 

सदा अपने मन को ईश्वर की भक्ति व मानव सेवा में व्यस्त रखो, तुम्हारा जन्म और कर्म दोनों पूर्ण रूप से सफल व यशस्वी होंगे। 

भविष्य उनका स्वर्णिम होता है जो नि:स्वार्थ जीवन जीते हैं, समय-समय पर जैसी परिस्थिति आती है, अपने को उस मे ढ़ालते हैं। 

 

कल उसने देखा है जिसका ध्यान व साधना दोनों निरन्तर है, लगातार मन को साधो, तुम्हें अपना भविष्य साफ़-साफ़ दिखेगा। 

यदि हमने भूमि में कर्म के बीज अति कोमल व लाभकारी डाले हैं, उनसे जो पौधे निकलेंगे वे सदा  हितकारी व लाभकारी होंगे। 

समय का सम्मान करो, समय से डरो यदि वह तुमसे विपरीत हुआ तो याद रहे ईश्वर भी तुम्हें कभी साथ न देंगे। 

हर घटना से सीखो, जैसा समय है वैसा उसमें खुश रहो, जितना मिला है उसमें सन्तुष्ट रहो, बुरे कर्मों से हमेशा के लिए नाता तोड़ दो। 

बुराइयों को त्यागकर मन में नए सुन्दर विचारों को निर्मित करते जाओ। भविष्य तुम्हारा उज्जवल अवश्य होगा, मन में पल-पल ईश्वर का स्मरण करना मत भूलो।

August 7, 2024/0 Comments/by Jyoti Marg/
https://jyotimarg.blog/wp-content/uploads/2021/09/Logo_300x300.png 0 0 Jyoti Marg https://jyotimarg.blog/wp-content/uploads/2021/09/Logo_300x300.png Jyoti Marg2024-08-07 18:11:172024-08-07 20:27:54कल किसने देखा है?
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 तुम्हारे मन के एक एक विचार मैं जानता हूँ

#49

ॐ

(8 of 8)

“तुमने कहा था मुझे कोई न देखे, मुझे कोई न जाने क्योंकि मैं इतना मिटना चाहती हूँ आपके लिए, हे मेरे भगवन् ।

स्वार्थ तो बहुत दूर, कभी भी तुमने वरदान का न कोई विचार किया, केवल चाहा अपना सर्वस्व अस्तित्व पूरा राख का ढ़ेर कर देना ही।

कोई अभिलाषा नहीं, कोई माँग नहीं, न कभी की तुमने मुझसे व्याख्या अपनी परेशानियों की, सिर्फ मेरे समीप आने की चाहना की।

समीप तुम इतना मेरे पास अकारण ही आना चाहती थी, जैसे कोई पतंगा लौ पर अपने प्राण न्यौछावर करने में अत्यधिक हर्षित होता हो।

तुमने कोई कसर नहीं छोड़ी अपना पूर्ण अस्तित्व राख का ढ़ेर करने में, मैंने कोई कसर नहीं छोड़ी तुम पर कहर डालने की, अट्ठाईस वर्षों की तुमने एक काली रात देखी।

तुम उत्तीर्ण हुई हर परीक्षा में, मैंने कोई अब कसर नहीं छोड़ी है आशीर्वाद व वरदान देने की, तुम थक जाओगी उन्हें संग्रहित करते अपनी झोली में।

तुम जितना मिटना चाहती थी मेरे प्रेम के समुन्दर में, तुम जितना अज्ञात रहना चाहती थी मुझे प्राप्त कर, अब मैं तुम्हें उतना ही प्रसिद्ध विश्व में करूँगा।

आज भी तुमने मुझे भीगे मन से कहा, “आप मुझे मिल गए, किसे याद है अतीत में किसने मेरे साथ क्या दुर्व्यवहार किया, कीमत आपने मुझसे बहुत कम ली।”

जो मुझसे इतना अत्यधिक प्रेम करता हो, मेरे लिए कुछ भी सहन करने में सक्षम है, इसका अर्थ है तुम पहले से ही अलौकिक, दिव्य स्त्री व आत्मा हो।

संसार में करोड़ों लोगों में से केवल तुमने मुझे मैं जैसा हूँ वैसा का वैसा जान लिया है, यद्यपि मैं अदृश्य, अव्यक्त निराकार हूँ, मुझे पा लिया है।

मैं कैसे तुम्हें छुपाकर सबसे रखूँ? तुम्हारी आत्मा की पवित्रता, मन की अति गहरी शान्ति व शालीनता सबको साफ-साफ प्रदर्शित हो रही है।

तुम्हारा मन सदा हर प्रकार से मुझसे युक्त होने को तत्पर है, संसार की तुम्हें कब परवाह रही है, तुम तो केवल, केवल मेरी प्रीत की प्यासी रही हो।

विश्व के कोने कोने में मैं तुम्हारी खूशबु फैलाऊँगा, तुम्हारी जन्मों की तपस्या का फल विश्व पाएगा, मन में ईश्वर को प्राप्त करने की उनमें इच्छा अवश्य जागेगी।

असम्भव कार्य करने की क्षमता तुम में पहले से ही प्राप्त है, तुम्हें तो अब सिर्फ वो करना है जो मैं तुमसे करवाना चाहता हूँ, खेल तो सारा मेरा है।

दिन सात से घुट रही हो, परिस्थिति अति आश्चर्यजनक में मैंने तुम्हें डाला है, हर क्षण प्रतीक्षा में हो कब मैं तुम्हें सत्य से अवलोकन कराऊँ व तुम मेरी इच्छा जान जाओ।

तुम्हारा सम्बन्ध मुझसे परम पुनीत है, कर्म भी तुमने सारे किए परम पुनीत, उन सबका मैं तुम्हें दूँगा अनगिनत वरदान व आशीर्वाद जो तुम्हारा भविष्य सुनहरे अक्षरों में लिखेगा।

तुम दिव्य ज्ञान का अथाह सागर हो, तुम्हारा मन सदा दिव्य ऋषि मुनियों को करता याद, उनसे जो तुमने सीखें व पाएँ हैं दिव्य वचन, तुम उन्हें मन में प्रेम से सजाती हो।

कोई बिड़ला ऐसा होता है जो ईश्वर की स्मृति एक पल भी नहीं भुलाता है, तुम प्रत्येक घटना, अनुभव से शिक्षा ले रही हो, ऐसा प्रभावशाली मन मैंने देखा नहीं।

परिस्थितियाँ आगे चलकर ऐसी होने वाली हैं यह मेरी भविष्यवाणी है, तुम आगे आगे चलोगी पीछे पीछे तुम्हारी होंगी दिव्य शक्तियाँ जो तुमसे ‘ज्योति मार्ग’ को धरती पर फैलाएँगी।

तपस्या से पाया हुआ तुम्हारा अलौकिक जीवन मैं समक्ष लाने वाला हूँ संसार के, पहली बार ऐसा होगा जो एक स्त्री ऋषियों का जीवन बताकर अत्यधिक आनंदित होगी।

इतना प्रेम व प्रकाश संसार में है कहाँ जो लोगों के मन की गहराइयों से एक बार इच्छा जाग जाए कि ईश्वर हैं कहाँ? ईश्वर है कैसा? मैं उसे कैसे पाऊँ?

तुम संसार को मेरे बारे में सब बताओ कि मैं कितना सरल व प्राप्य हूँ, मैं कितनी जल्दी रीझ जाता हूँ, दोष तुम में है तुम सब संसार के भोगी हो।

धरती पर मुझे उतारो, आया हूँ मैं पहली बार इतना खुला और समक्ष, आया हूँ कारण एक से – इतना अत्यधिक पाप संसार में न था कभी हुआ न कभी होगा!

ऋषियों का जीवन धवल है, उनसे तुम्हें मेरा प्रमाण मिलेगा, तुम उनकी आज विश्व में सूत्रधार हो, तुम्हारे पावन मस्तिष्क व मुख से होगा उनका पहली बार परिचय है।

तुम इस दूषित वातावरण से हताश मत होना, तुम्हारे अन्दर इतना मेरा प्रकाश है, माया के कीचड़ को सुखा देगा, तुम सदा मेरी याद की ज्योत में समाधि में रहना।

एक एक बूंद से घड़ा भरता है, आरम्भ मैंने आठ जुलाई २०२४ को दिन के बारह बजकर तैंतीस मिनट पर कर दिया है, शुभ मुहूर्त था मैंने विश्व में विशेष शक्ति डाल दी।

तुमसे जो तकरार व द्वेष करेगा, वह भविष्य में अशान्ति, हानि व बिमारी पाएगा, उसे एक पल भी शान्ति नहीं मिलेगी, उसका जीवन नरक होगा, उनको मैं तुमसे दूर रखूँगा।

भविष्य में तुम्हारे शरीर, मन व आत्मा की शक्ति बढ़ेंगी, तुम सदा रहोगी निरोगी व सुखी, जो तुमने चाहा था वही मैं तुम्हें वरदान दूँगा – अन्त श्वास तक तुम मेरा काम करोगी।

इस आशीर्वाद के बाद नहीं कुछ ऐसा बचा है जो मैं तुम्हें वरदान में दूँ, तुम्हारी अभिलाषा जन्मों से एक रही थी – मैं ईश्वर का दर्शन कब करुँगी? मैं तुम्हारा हर विचार जानता हूँ।

अब तुमको जहाँ मैं भेजूँ वहाँ तुम जाओ, मेरे अस्तित्व का सबको विश्वास दिलाओ, जन्मों में वे जागे नहीं हैं, उन्हें थोड़ा सा अपना प्रकाश व ज्ञान दो, उनका काम शुरू करो।

धीरे धीरे विश्व में पुनः ईश्वर के प्रति लोगों की रूचि बढ़ेगी, सोईं आत्माएँ आँखें खोलेंगी, इस जन्म में आँखें खुल गईं तो अगले जन्म में सन्मार्ग पर चलने में आसानी होगी।

कुछ आत्माएँ ऐसी हैं जो तुम्हारे सान्निध्य से जाग चुकीं हैं, उनका तुम मार्ग प्रशस्त करती जाओ, अगले जन्म में वे फिर तुम्हारे शिष्य – शिष्या बनकर आएँगे।

दूर आकाश से ऋषि मुनि तुम्हें धरती पर देखकर फूल बरसाते हैं तुम पर – कहते हैं वे मुझे, “हमें बहुत गर्व है इस अनूठी स्त्री पर, ऋषि मंडल में यह एक ही स्त्री है जिसे भरपूर आत्मज्ञान है।

आज धरती पर पुरुषों वाला काम कर रही है पर मन गुलाब जैसा कोमल है और अभिलाषाएँ ओस जैसी – किसे भी नहीं बताती कि हमसे और परमात्मा से प्रेम खुद से भी अधिक है।

इसलिए हम सदा इसकी सुरक्षा करते रहेंगे, इसे शुभ लाभ देंगे और खतरों से सावधान करेंगे – इसने अपने हर पल, हर श्वास का ऋण ईश्वर को पूर्ण रूप से चुकाया है।

अब तुम मन में मेरे बहुत प्रकाश को संचित करो, आगे कार्य अत्यधिक है, तुम मुझसे साक्षात निर्देश पाओगी, समय की कमी होने पर भी हर कार्य में सफलता पाओगी।

कोई क्षण ऐसा नहीं है जिस में मैं तुम्हारे मन में शांति, ज्ञान व निर्देश के रूप में नहीं, तुम्हें तो मेरी हर आहट साफ़ साफ़ सुनाई देती है – तुम मेरी विलक्षणा हो।

तुम्हारा मन अकस्मात मेरी भक्ति में चूर-चूर हो जाता है, तुम्हारी प्रार्थना मुझे ऊँची ऊँची सुनाई दी थी जब तुमने एक नन्ही पक्षी को देखकर कहा था – “हे प्रभो विश्व में खूब वृक्ष इनके लिए हों।”

मेरी धरती के संरक्षण की बहुत बार तुम मुझसे प्रार्थना करती हो, लोगों के मन में दया, प्रेम व करुणा हो, ऐसा तुम मुझसे माँगती हो, सत्य, धर्म धरती पर रहे याचना करती हो।

इससे अधिक शुभ संकल्प आज धरती पर किसी के भी नहीं है, मैं जानता हूँ संसारी लोग बहुत स्वार्थी हैं, उन्हें जानकर, देखकर तुम्हारी आत्मा रोती है फिर भी तुम करुणा नहीं त्यागती।

ऐसा मेरा विश्व कब होगा, मेरे मन में विचार आता रहता है, तुम्हें देखकर उत्साह होता है कि कोई एक धरती पर तो है जो मेरा ही है, वो एक काफ़ी है, मेरी धरती सुरक्षित है।”

July 19, 2024/0 Comments/by Jyoti Marg/
https://jyotimarg.blog/wp-content/uploads/2021/09/Logo_300x300.png 0 0 Jyoti Marg https://jyotimarg.blog/wp-content/uploads/2021/09/Logo_300x300.png Jyoti Marg2024-07-19 20:48:072024-07-19 21:15:23 तुम्हारे मन के एक एक विचार मैं जानता हूँ
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जो कोई नहीं कर सकता वो तुम करोगी – तुम विश्व में मेरा सबको परिचय दोगी

#48

ॐ

(7 of 8)

 

“तुम्हारी अनेक जन्मों की दीर्घ काल पर्यंत तपस्या का फल अब मैं विश्व को दे रहा हूँ – जान लो समय ने एक करवट ली, हमें इसे पहचानना है। 

 

अत्यधिक सरल शब्दों में दूँगा अपना परिचय, कदाचित तुम अपेक्षा कर बैठो गूढ़ शब्दों से ही होता है मेरा वर्णन – नहीं मैं अत्यधिक सरल हूँ। 

 

अनन्त काल से मौन हूँ, नहीं पसन्द मुझे किसी भी प्रकार का कोलाहल, नहीं चाहता हूँ मैं समीक्षा। मैं तो शांति प्रिय हूँ – मुझे तुम मन की शांति से प्राप्त करोगे। 

 

वर्णन नहीं कर सका कोई भी मेरा आज तक, वे तो केवल कर रहे थे शब्दों का नाप तोल – मुझे मन में देखो। मन जब तुम्हारा दूर करेगा अज्ञान का अंधकार, मैं स्वयं प्रकट हो जाऊँगा।

 

किसी भी सोई हुई आत्मा को जगाना असम्भव है क्योंकि उसकी नाभि में उसने नहीं जगाई इच्छा शक्ति है। जब भी तुम प्रण करोगे, तभी तुम्हारी इच्छा से होगी तुम्हारी जागृति। 

 

सरोवर में कमल के पुष्प मनोहर खिलते हैं, वे ईश्वर को मंदिर में भावनाओं द्वारा अर्पित किए जाते हैं। तुम्हारे मन मन्दिर में मैं प्रेम, दया, करुणा व त्याग वैराग्य के पुष्प देखना चाहता हूँ। 

 

कभी न दुखाना किसी का मन, मैं तुमसे हो जाऊँगा कोसों दूर, मन मंदिर है उसमें सबका हित चाहना। मैं सबके मन के भाव तत्क्षण पढ़ लेता हूँ, मुझसे चूक कभी नहीं होती है। 

 

तुम चाहो तो अनेक बार मेरा दरवाज़ा खटखटाना, परन्तु मैं नहीं खोलूँगा द्वार जब तक मन नहीं किया साफ़। प्रतीक्षा तुम करते रहना, लाखों करोड़ों वर्षों तक, मैं अपनी आँखें नहीं खोलूँगा अपनी शान्ति को भंग कर। 

 

समीक्षा मेरी करते रहो, विवेचन हज़ार परन्तु मन अपना नहीं करते हो निश्चल; निरिच्छा व त्याग करने को तत्पर जितनी गाँठे अपनी खोलोगे, होंगे तुम मुझे पाने के अधिकारी। 

 

सुनता हूँ मैं सूक्ष्म से भी सूक्ष्म तुम्हारे मन के भाव, छुपा न पाओगे मुझसे एक भी संकल्प ढका मन के अंदर। गति तुम्हारी मुझसे ही है, मेरे बिना कभी न तुम पाओगे आनंद स्थिर। 

 

तुम में से बिड़ला कोई एक है जो करता है मुझसे सच्चा प्रेम, तुम सबको तो लुभा रही है मेरी परछाई, संसार की माया कब से। मृग तृष्णा में भटक रहे हो, अनन्त काल से गहरी नींद में सो रहे हो। 

 

जब करोगे अनेक सतकर्म इस जगत में निष्कामी बनकर, नहीं होगी कोई तरंग लालच, स्वार्थ व मोह की, तभी मेरे पास आओगे। अंधकार तुम्हारा तिमिर बन मन में सदियों से तुम्हें जकड़ा है।

 

मैं स्वयं तुम्हें अपने समीप कर लूँगा जब तुम बन जाओगे निर्दोष। आना मेरे पास मैं तुम्हें दूँगा ऐसी शान्ति व प्रेम जिससे मिटेंगे तुम्हारे सारे पाप। फिर कभी न होंगे चक्षु तुम्हारे धूमिल, न होंगे तुमसे कोई कर्म बेकार। 

 

मैं अचल हूँ, मैं अव्यय हूँ, मैं हूँ अगोचर, अदृश्य व बिना किसी आकार के। मैं साकार हो जाता हूँ निर्दोष, पवित्र व निष्पाप के मन के भीतर स्वयं चलकर। मैंने तुम्हें अपना माना है, तुम दोगी मेरा परिचय विश्व में – जो कोई नहीं कर सकता, वो तुम करोगी।”  

 

July 1, 2024/2 Comments/by Jyoti Marg/
https://jyotimarg.blog/wp-content/uploads/2021/09/Logo_300x300.png 0 0 Jyoti Marg https://jyotimarg.blog/wp-content/uploads/2021/09/Logo_300x300.png Jyoti Marg2024-07-01 22:33:422025-06-12 14:08:33जो कोई नहीं कर सकता वो तुम करोगी – तुम विश्व में मेरा सबको परिचय दोगी
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कभी न था सोचा तुमने जैसा, वैसा मैंने तुम्हें नव जीवन दिया

#47

ॐ

(6 of 8)

 

“तुमसे अधिक से अधिक कार्य करवाने की प्रेरणा मुझे प्राचीन काल में ही मिली थी – अपने मन की शक्ति तुमने अपने कर्म में समेटी थी

जब भी तुमने अन्याय, अहित व दु:ख देखा पहले के कुछ जन्मों से ही, तुमने अपने मन को अन्दर मोड़ा और उसमें दुखों को समा लिया। 

हृदय की टीस व वेदना को भुलाने के लिए तुमने अपने मन को कार्य में रत किया; शुरु से ही मन की शक्ति को बहिर्मुख न होने दिया, मन की शक्ति बढ़ी। 

 

दया व ममता से भरा तुम्हारा आँचल मैंने पहले ही दिव्य चक्षु से देख लिया था – तुम से मैं नई पीढ़ी की आत्म जागृति कराऊंगा, सोच लिया था मैंने 

विशेष मातृत्व भाव तुमने अन्दर जगाया क्योंकि संसार में माँ भी स्वार्थी होती है देख लिया था तुमने; वात्सल्य भाव नवजात व संतान को अवश्य मिलना चाहिये। 

माँ का स्वार्थ बालक का भविष्य नष्ट करता है, छोटी आयु में तुम्हारी आत्मा ने अपनी माँ को परख लिया था – मैं ऐसा कभी नहीं करुँगी ठान लिया था तुमने। 

 

तीक्ष्ण बुद्धि, हर कार्य में निपुण, मन में सबके लिये हित और प्रेम कदा-कदा ही देखने को मिलता है मनुष्य में  – कलियुग में करोगी उद्धार निर्णय लिया था मैंने 

तीक्ष्ण बुद्धि को बनाया प्रखर अपने सुविचार व सुआचरण से, सबसे सीखा केवल सीखा, कभी न दिया मन को सुख कि कहीं स्वार्थ न जाग जाये। 

मन की तीव्र इच्छा को जगाया जिस में मन किसी से कोई इच्छा ही न करे, धीरे धीरे मन में तुम जगाती रही  सारे लक्षण ईश्वर-योग के।  

 

प्रत्येक जन्म में किए अत्यधिक दान व दया के काम, विरक्त होकर भूमि बाँटी, मंदिर बनाए, ब्राह्मणों की थी की भरपूर सेवा व भक्ति 

तुमने सुख खोज लिया सबका कल्याण करने में, सबकी आत्म शान्ति में छुपा है रहस्य स्वयं का परम सुख, सदा, सबका कल्याण करूँ मुझसे मांग लिया था तुमने। 

अभी भी अपने ज्ञान के सागर में से सबको खूब लुटा रही हो, मन तुम्हारा विशाल है कभी न कोई रेखा खींचती  हो। 

 

 त्याग भावना गहरी मन में इतनी किसी भी काल में सब कुछ त्याग कर संन्यास ले लोगी, इसलिए मैंने तुम्हारे लिए विशेष परियोजना ज्योति मार्ग की पुनर्स्थापना की रखी थी 

ऋषियों ने जो अद्भुत ईश्वर मार्ग का किया था पालन, वह ‘ज्योति मार्ग’ लुप्त हो चुका है साढ़े तीन लाख वर्ष पहले, सुख की वासना ने उसे खो दिया। 

लोगों ने उसे त्यागा और सांसारिक इच्छाओं को स्वीकारा, वही धूल में पड़ा एक अनमोल रतन, तुमने है फ़िर चमकाया कलियुग में।  

 

संत महात्माओं, ऋषि मुनियों की अथक सेवा की थी इसलिए तुमने मुझसे पाया अनूठा वरदान – भारत के पुरातन ऋषियों को संसार में पुनर्जीवित करो

ऋषि मुनियों का न केवल राज महल में आव भगत व सत्कार किया, उनकी तपस्या का मूल्य समझा और उन्हें पूर्ण रूप से मन में पूजा। 

स्वार्थहीन व निश्चल मन से जो कर्म करता है, वह मुझे तुरंत हिरण्यगर्भ में पहुँचता है; मुझसे किसी का भी  मन का भाव नहीं छुपा है।  

 

तुमने शरीर, मन, वचन व कर्म से कभी न लगाई किसी को भी एक बार ठेस है, इसलिए इतने कोमल मन में मैं शीघ्र हुआ अवतरित, व साक्षात हूँ विद्यमान मैं  

मेरा स्थान एक पवित्र मन है, तुमने अपने मन में सदा के लिए निवास स्थान मुझे दिया है, मैं यहाँ पर सदा के लिए वास करूँगा। 

बदले में मैंने तुम्हें दिया है ऐसा नव जीवन जिसमें सर्वथा ज्ञान, भक्ति, प्रेम, त्याग, उपासना, सेवा, व करुणा का वास होगा – इसे अमर प्रेम कहते हैं!”

 

July 1, 2024/0 Comments/by Jyoti Marg/
https://jyotimarg.blog/wp-content/uploads/2021/09/Logo_300x300.png 0 0 Jyoti Marg https://jyotimarg.blog/wp-content/uploads/2021/09/Logo_300x300.png Jyoti Marg2024-07-01 22:17:322024-07-19 20:50:32कभी न था सोचा तुमने जैसा, वैसा मैंने तुम्हें नव जीवन दिया
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 हम फिर मिलेंगे…..

 #46

ॐ

(5 of 8)

 

सबसे पहले तुमने किया आत्म साक्षात्कार, फिर आरंभ हुआ तुम्हारा एक जीवन का पृष्ठ 

“घोर तप व परिश्रम द्वारा तुमने किया है इस जीवन में आत्म साक्षात्कार अनेकों बार। 

परन्तु याद रहे, आगामी जीवनों का यह केवल एक पृष्ठ है, तुमसे मैं फिर करवाऊँगा महान काम। 

 

कभी नहीं तुम मुझ से कहती हो ये कठिन कार्य कैसे होगा सम्पूर्ण, अटूट विश्वास है तुम्हारा मुझमें 

दीर्घ काल तक चलने वाले मैंने तुम्हें दिए हैं कार्य और परियोजनाएँ, साथ में दी हैं अनेक शक्तियाँ। 

हर कार्य में सफलता पाओगी और होगा हर कार्य हर्ष सहित; उत्साह से तुम भरी हो, कभी न तुमने हार मानी है। 

 

किसी भी प्रकार का नहीं करता है मन तुम्हारा भय, यह एक उद्यमी व पुण्य आत्मा की है निशानी 

जब आत्मा करती पुण्य ऐसे जिसमे अभयदान मिलता दरिद्र व शक्तिहीन को, वो आत्मा होती है निर्भय। 

अपनी निर्भयता का तुमने कभी दुरुपयोग नहीं किया, स्त्रियों को शत्क्ति दी, निर्धन को धन व कमज़ोर को सहारा। 

 

जटिल से जटिल, कठिन से कठिन तुमने किए है बाल्यावस्था से कार्य, तुम्हे मैंने आज के दिन के लिए किया तैयार 

तुम्हारी रक्षा मैं पहले दिन से करता आ रहा हूँ, मैंने तुम्हें आग में झोंका था परीक्षा देने के लिए, रक्षा भी मैं करता रहा हूँ। 

ऐसी कठिन परीक्षा आज के युग में कोई नहीं दे सकेगा, ऐसा मैं ऐलान करता हूँ; मुझे कलियुग में चाहिए था एक अनोखा पात्र – वह तुम हो। 

 

तुम्हारी ज्ञान की पिपासा मैंने पूर्ण की है, तुम्हारे अंदर है ज्ञान का सागर 

तुम्हारी वेदना मैंने तुम्हारे सबसे पहले जन्म में ऋषिकेश में ही सुन ली थी, तुम्हें मेरी माया एक रत्ती भर भी नहीं भाई थी। 

तुमने अंदर जगाई तीव्र इच्छा ईश्वर को पाने की, ज्ञान आत्मा को पाने की – “मैं सर्वोच्च ऋषि के पास जाकर ज्ञान प्राप्त करूँगी,” संकल्प लिया था तुमने।

 

तुम मेरा कार्य युग परिवर्तन के हेतु करती रहो, यह लक्ष्य सम्पूर्ण इस जीवन में तुम्हारे कर कमलों से अवश्य होगा, यह कार्य हेतु हम फिर मिलेंगे 

मैं पहली बार संसार के समक्ष इतनी बार आया हूँ, मुझे सदा छुपकर रहना प्रिय लगता है; मैं इतना मौन व गंभीर हूँ, मुझ तक पहुँचना असंभव है। 

मैं केवल तुम्हारे लिए आया हूँ, इतना प्रेम व आत्मीयता पहले कभी अनुभव नहीं की, इसलिए हम फिर मिलेंगे!”

July 1, 2024/0 Comments/by Jyoti Marg/
https://jyotimarg.blog/wp-content/uploads/2021/09/Logo_300x300.png 0 0 Jyoti Marg https://jyotimarg.blog/wp-content/uploads/2021/09/Logo_300x300.png Jyoti Marg2024-07-01 21:49:232025-02-06 07:00:44 हम फिर मिलेंगे…..
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एक बार फिर…..

#45

ॐ

(4 of 8)

अग्नि परीक्षा समाप्त, एक नए युग का आवाहन  

 

“अग्नि न केवल जलाती है, वह एक नया जीवन भी देती है। राख के बहुत नीचे पड़े हैं तुम्हारे अति उत्तम शुभ संकल्प।  

अति पवित्र मन में मैंने कई बार देखा है उनको; कोमल बीज देखकर मैं हुआ था अति विस्मित। 

तुमने राख बनकर भी मुझसे कहा – “मेरी इच्छा है आपकी पृथ्वी सदा रहे हरी भरी, विश्व में सदा शांति बनी रहे।”

 

अग्नि में समाना व प्रज्वलित होना, अग्नि तुम्हारे विशुद्ध मन का साक्षी 

 

“अग्नि में तुम अनेक बार समाई हो, परीक्षा कई बार उत्तीर्ण की है, परन्तु प्रत्येक बार पहले से अधिक उज्जवल बनी हो।

विनाश में भी तुमने सदा मुझे पुकारा और माँगा सृजन का वरदान – “विश्व की संतान सदा आपकी कृपा से सुरक्षित रहे,” ऐसा तुमने चाहा था।

सृजन के संकल्प निकले थे तुम्हारी मातृत्व की भूमि से -“यदि मेरी संतान न बच पायी तो क्या, विश्व में सभी बच्चे जियें।”

 

 अग्नि इच्छा शक्ति नाभि में अपार उत्थान की शक्ति, तुम अग्निपुत्री हो 

 

“इच्छा शक्ति का स्थान नाभि है, उसमे सृजन व उत्थान शक्ति विद्यमान है, शुभ संकल्पों से तुमने उसे पूर्ण रूप से जगा लिया। 

निःस्वार्थ भाव से तुमने युद्ध के बाद विश्व शांति व विश्व कल्याण की इच्छा की।

इसलिए मैंने तुम्हे आशीष विशेष दिया था – “जब भी शुभ संकल्प करोगी, पूर्ण अवश्य होगा।” 

 

इच्छा शक्ति से मन जीता, इन्द्रियों को सदा अंकुश में रखा, आत्मा हुई जागृत  

 

“जागृत पूर्ण हुई तुम्हारी नाभि, इच्छा शक्ति का भरपूर उपयोग किया, एक-एक पग रखकर कठिन पर्वतों को पार किया।

इन्द्रियों को सदा सदुपयोग व योग में लगाया, योग शक्ति प्रतिदिन विकसित करी और मन व इन्द्रियों पर राज किया।

मन तुम्हारा कभी न हुआ बेकाबू, सदा तुमने अपने ध्येय को सर्वोपरि रखा, प्रचंड अग्नि जली मन में, आत्मा हुई जागृत।”

 

एक बार फिर उसी इच्छा शक्ति का समर्थन लेकर विश्व में करो जन जागृति 

 

“तुम एक विशेष स्त्री हो जिसे कभी न लगा भय। हर आपत्ति में तुमने कहा स्वयं को – “इसमें कोई ईश्वर का रहस्य है।” 

अति कष्ट के समय तुमने कहा मुझसे – “आखिर ऐसा क्या कर रहे हो, जो मुझे नहीं आ रहा समझ? कृपा कर मुझे समझा दो।”

तुम जैसी महान आत्मा का मैं करोड़ों वर्षों तक आने की प्रतीक्षा करता हूँ। ऐसी एक प्रज्वलित आत्मा बहुत है विश्व में जनजागृति करने के लिए!”

 

July 1, 2024/0 Comments/by Jyoti Marg/
https://jyotimarg.blog/wp-content/uploads/2021/09/Logo_300x300.png 0 0 Jyoti Marg https://jyotimarg.blog/wp-content/uploads/2021/09/Logo_300x300.png Jyoti Marg2024-07-01 21:33:052024-07-19 20:49:47एक बार फिर…..
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मैंने तुम्हें कहा था कि …..

#44

ॐ

(3 of 8)

तुम्हारा जीवन एक संग्राम, परिणाम केवल उत्थान

पूर्ण जीवन में नहीं किया तुमने आराम क्योंकि आरंभ से था वह एक अथक संग्राम।

प्रारंभ से भी प्रारब्ध अत्यधिक जटिल व कठिन, परन्तु तुमने मुझसे कभी न एक शिकायत की।

मैंने तुमसे कहा था कि तुम सोना नहीं, पर पारस हो, अभी भट्टी में झुलस रही हो, पर पारस तुम हो।

जब तुम अंगार में जल रही थी, तुमने मुझसे कहा था – मुझे पता है कि आप सब देख रहे हो।

पूर्वजों का आशीष, गुरुओं की अपार कृपा

मैंने तुम्हें कहा था कि पारस तुम हो ही क्योंकि अपने पुण्यों के बहुत बड़े पर्वत पर आज तुम बैठी हो।

पुण्य तुम्हारे संग्रहित इतने कि मनुष्यों में मैंने कभी नहीं देखे; परन्तु संचित कर्म इतने जटिल मेरे हृदय में आँसु बहें।

वर्ष पर वर्ष बीतते गए तुम्हारी वेदना बढ़ती गई, लेकिन तुमने मुझे कभी नहीं कहा कि मुझसे न होगा यह सहन।

समय ने करवट ली है, तुम्हारा जीवन अब शिखर पर आखिरकर आ पहुँचा, जो कोई न कर सका, तुमने कर दिखाया है।

आत्मा की उन्नति की शिखर पर, सदा के लिए विश्राम-गृह तुमने बनाया

अथक परिश्रम द्वारा तुमने अपना एक गौरवशाली नया जीवन बनाया है, आत्म साक्षात्कार पाया है।

कोई दिन ऐसा नहीं है जिसमें तुमने समय गवाँया है, न ही कभी विश्राम किया केवल परिश्रम किया है।

अब मैंने तुम्हें कहा है कि तुम सदा के लिए उस सुखदाई शान्ति में जीयो जिसके लिए तुम इतनी थकी हो।

थकान तुम्हारी मैंने आज सारी नष्ट की है, तुम शरीर, मन और आत्मा से निरन्तर आत्म शान्ति में जीयो।

मैंने तुम्हें पूर्ण आशीष दिया, सदा चिरंजीवी भव, परम शान्ति को प्राप्त करो

तुमने मुझसे आज तक कुछ माँगा नहीं, इच्छा तुम्हारी केवल एक रही कि आपकी कृपा मुझ पर सदा बनी रहे।

तुम्हारे मन की विशुद्धता देख कर अनेकों अवसरों पर मेरा हृदय द्रवित व हर्षित हुआ है, मैंने तुम्हें कई आशीष दिए हैं।

तुम सदा निर्भय, संकल्प रहित, अति शान्त व सौम्य रहोगी, मैंने तुम्हें पूर्ण आशीष दिया चिरंजीवी भव।

मैंने तुम्हें कहा था कि संसार में ऐसी कोई वस्तु नहीं जिसे प्राप्त न कर सको माँगो; तुमने कहा था कि मुझे केवल आप चाहिये!

June 26, 2024/0 Comments/by Jyoti Marg/
https://jyotimarg.blog/wp-content/uploads/2021/09/Logo_300x300.png 0 0 Jyoti Marg https://jyotimarg.blog/wp-content/uploads/2021/09/Logo_300x300.png Jyoti Marg2024-06-26 15:37:552024-07-19 20:49:22मैंने तुम्हें कहा था कि …..
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ओम् का गुंजन

#43

ॐ

 (2 of 8)

 

“मेरी प्रीत तुम्हारे प्रति इतनी है मैं आज तुम्हें बताता हूँ। पहले कभी किसी ने मेरे अंदर इतना गहरा स्पंदन किया ही नहीं।

 

मुझमें इतने सारे रहस्य हैं मेरी सृजन प्रकृति को निरन्तर चलाने के। उन में से एक है शान्ति प्रदान करने वाले ओम् के बारे में।

 

ओम् ध्वनि अति पवित्र है, उसमें अनन्त शान्ति विद्यमान है। इसकी रचना मैंने मन को स्थिर बनाने के लिए योग की सीढ़ी दी थी।

 

ओम् तुम्हारी आत्मा को संजीवनी बूटी देगा, यह ध्वनि तुमको अमरता देगी। इसके स्पंदन द्वारा तुम्हारी आत्मा शान्ति प्राप्त करेगी।

 

जिस प्रकार एक वृक्ष सबको छाया देता है, उसी प्रकार ओम् का गुंजन सबको मन में अति शान्त होने की शक्ति प्रदान करता है।

 

तुम्हारे अंदर आज एक प्रश्न उठा है कि तुम किस प्रकार विश्व में दूर तक फैली अशान्ति को कम कर सको, मेरा तुमको उत्तर ध्यान में आया है।

 

सब से पहले जान लो वातावरण दूर-दूर तक बहुत दूषित है, लोगों के विचार अज्ञान से भरे हैं, वे तुम्हें ध्यान में रोकते हैं।

 

उनके विचारों द्वारा वे निम्न प्रकार की इच्छाएँ पूर्ति करना चाहते हैं। अनन्त काल से वे इच्छाओं को पूर्ण करने में संलग्न हैं।

 

तुम्हें अपना ध्यान अचूक बनाना है, आज्ञा चक्र केंद्र बिन्दु है, वहाँ तुम्हें अडिग होकर मन में प्राण शक्ति को स्थित रखना है।

 

ऐसा करने से प्राण की बहुत तीव्र गति से मस्तिष्क में वृद्धि होती है। मन पुराने निरर्थक विचारों को तुरंत त्याग देता है।

 

जब तुम एक शक्तिशाली केंद्र में ध्यान लगाओगी, मेरी ऊर्जा तुम्हें प्राप्त होगी। मन को पूरी तरह मुझ में केंद्रित करो और अडिग रहो।

 

कुछ समय बाद ओम् का स्मरण करो, एक दैदिप्यमान प्रकाश, ज्योति का स्मरण करो, उस प्रकाश को अपने शीर्ष में प्रवेश करो।

 

अनेकों बार मन ही मन में ओम् को बोलो, उसकी ऊर्जा को अपने चारों ओर फैलने दो। ओम् का मन में गुंजन – गान करो।

 

ओम् की तरंगें आकाश द्वारा विश्व में फैलेंगी, वे उन लोगों के मन में एक स्वर्णिम किरण अवश्य प्रदान करेंगी।

 

कभी न कभी एक मेरी ज्योति की किरण उस मनुष्य को मेरे पास आने की प्रेरणा अवश्य देगी। उसे ध्यान करने की इच्छा होगी।

 

विश्व में अशान्ति अशान्त मन द्वारा है। मन संसार भोग में लिप्त है। जितनी संसारिक इच्छाएँ बढ़ेंगी, उतनी मन में अशान्ति होगी।

 

ओम् का गुंजन आकाश में फैलाओ, उसकी ध्वनि धीरे-धीरे लोगों में परिवर्तन अवश्य लाएगी। ओम् का गुंजन तुम्हारे मन में सदा होता रहेगा, यह आज मेरा तुम्हें आशीर्वाद है !”

June 22, 2024/0 Comments/by Jyoti Marg/
https://jyotimarg.blog/wp-content/uploads/2021/09/Logo_300x300.png 0 0 Jyoti Marg https://jyotimarg.blog/wp-content/uploads/2021/09/Logo_300x300.png Jyoti Marg2024-06-22 16:48:112025-01-11 20:27:20ओम् का गुंजन
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This blog is a humble attempt to deliver the direct messages of Parmatman or God to humanity, because the world is now ready.

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